नागार्जुन ने किसान, राजनीति, प्रकृति और ऐसे अनेक विषयों पर कविताएं लिखीं, जिन्हें पहले कविता का विषय नहीं माना जाता था। जनसंघर्ष के कवि नागार्जुन का जन्म बिहार में हुआ। उन्होंने किसान आंदोलन, संपूर्ण क्रांति और दलित प्रतिरोध का दौर देखा था। इन समयों को उन्होंने अपनी कविताओं में उतारा। उनकी कविताओं में समाज की छवि दिखाई देती है।
यात्री उपनाम
प्रगतिवादी विचारधारा के लेखक और कवि नागार्जुन का असली नाम वैद्यनाथ मिश्र था। उन्हें बाबा और यात्री उपनाम से भी जाना जाता है। उन्होंने 1945 के आसपास साहित्य लिखना शुरू किया। हिंदी साहित्य में उन्होंने ‘नागार्जुन’ और मैथिली में ‘यात्री’ उपनाम से सृजन किया। उनकी मूल शिक्षा संस्कृत में हुई थी। उन्होंने संस्कृत, बंगाली, मैथिली और हिंदी में साहित्य रचा। अपराजिता देवी से उनकी शादी हुई थी।
वामपंथी विचारधारा के कवि
नागार्जुन शोषित जनता के कवि थे। उनकी विचारधारा वामपंथी थी। लेकिन जहां उन्हें महसूस हुआ, वहां वे वामपंथ पर व्यंग्य करने से भी नहीं चूके। जब 1962 के चीनी आक्रमण के समय भारत की कम्युनिस्ट पार्टी चुप थी, तब भी नागार्जुन ने चीनी आक्रमण के विरोध में लिखा। नागार्जुन कवि के अलावा उपन्यासकार भी थे। उन्होंने वामपंथ को किताबों से कम, शोषित जनता से अधिक सीखा था। उनकी कविताओं में भारतीय जनजीवन की विभिन्न छवियां हैं।
व्यंग्य थी प्रमुख शैली
भारतीय वर्ग संघर्ष के कवि नागार्जुन ने अनेक काव्य पुस्तकें लिखीं। उनकी संवाद शैली ठेठ और सीधी चोट करने वाली थी। उन्होंने समकालीन सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर भी खूब लिखा। नागार्जुन व्यंग्य के कवि कहे जाते हैं। उनकी कविता ‘आओ रानी हम ढोएंगे पालकी’ ब्रिटिश महारानी एलिजाबेथ के भारत आगमन पर भारत सरकार द्वारा भव्य स्वागत करने पर तंज कसती है। ‘अकाल और उसके बाद’ कविता ने उन्हें खूब प्रसिद्धि दिलाई। उनका उपन्यास ‘रतिनाथ की चाची’ आत्मकथात्मक, यथार्थवादी और नारीवादी हिंदी उपन्यासों में गिना जाता है।
राजनेताओं की आलोचना
‘इंदुजी, इंदुजी क्या हुआ आपको/ तार दिया बेटे को, बोर दिया बाप को…’ कविता नागार्जुन ने इंदिरा गांधी के आपातकाल लगाने पर लिखी थी। इस कविता में उन्होंने नेहरू की विचारधारा से अलग इंदिरा के काम करने पर व्यंग्य किया था। वामपंथी नागार्जुन केवल राजनेताओं की आलोचना नहीं करते थे, बल्कि उन्हें जब कोई बात अच्छी लगती तो उसकी सराहना भी अपनी कविता के माध्यम से करते थे।
प्रयोगशीलता
भारतीय साहित्य में नागार्जुन एक ऐसे कवि थे, जिन्होंने पारंपरिक काव्य रूपों को नए कथ्य रूप में बदला। इसलिए उन्हें प्रयोगशील कवि भी माना जाता है। निराला के बाद नागार्जुन अकेले ऐसे कवि हैं, जिन्होंने इतने छंद, इतनी शैलियां और इतने काव्य रूपों का इस्तेमाल किया। उनका काव्य शिल्प अद्भुत था।
प्रमुख रचनाएं
कविता संग्रह : ओम मंत्र, अपने खेत में, युगधारा, सतरंगे पंखों वाली, तालाब की मछलियां, आखिर ऐसा क्या कह दिया मैंने, खिचड़ी विपल्व देखा हमने, भूल जाओ पुराने सपने, हजार-हजार बाहों वाली, तुमने कहा था, इस गुबार की छाया में, रत्नगर्भ, पुरानी जूतियों का कोरस उनके प्रमुख काव्य संग्रह हैं।
उपन्यास : बलचनमा, नई पौध, बाबा बटेसरनाथ, दुखमोचन, वरुण के बेटे, उग्रतारा, पारो, आसमान में चांद तारे, कुंभीपाक।
निबंध संग्रह : अन्न हीनम क्रियानाम्
बाल साहित्य : कथा मंजरी भाग-1, कथा मंजरी भाग-2, विद्यापति की कहानियां, मर्यादा पुरुषोत्तम।
सम्मान
नागार्जुन को 1969 में उनकी किताब ‘पत्रहीन नग्न गाछ’ के लिए साहित्य अकादेमी सम्मान से सम्मानित किया गया। सन 1994 में उन्हें साहित्य अकादेमी फेलोशिप से भी सम्मानित किया गया। निधन : 5 नवंबर, 1998 को नागार्जुन हमारे बीच नहीं रहे।

