अजित दुबे

हाल में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा कि ‘भारत की राष्ट्रीयता किसी एक भाषा और एक धर्म पर आधारित नहीं है। यह 1.3 अरब लोगों का ‘शाश्वत सर्वहितवाद’ है, जो हर रोज एक सौ बाईस भाषाओं और सोलह सौ बोलियां बोलते हैं।’ उनका यह कथन कई मायनों में ऐतिहासिक है। इससे भी ज्यादा इसे प्रासंगिक और पथप्रदर्शक प्रवाह के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि संस्कृति, आस्था और भाषा की बहुलता ही भारत को विशेष बनाती है। यहां पूर्व राष्ट्रपति के इस कथन की चर्चा का मकसद इसमें उनके द्वारा गिनाई गई भारत की एक सौ बाईस भाषाओं के साथ-साथ सोलह सौ उन बोलियों में से सर्वाधिक बोली जाने वाली भोजपुरी की अस्मिता को लेकर है। इस क्रम में केंद्र सरकार की चिंता भी बार-बार सामने आती रही है। प्रधानमंत्री जब भी बिहार या पूर्वी उत्तर प्रदेश में किसी जनसभा को संबोधित करने गए, तो शुरुआत भोजपुरी से ही करते रहे हैं। दरअसल, वर्तमान सरकार शुरू से इस बात की पक्षधर रही है कि राज्यों की स्थानीय भाषाओं और विशेषकर हर राज्य की मातृभाषा को पूरा सम्मान मिलना चाहिए। मातृभाषाओं के प्रति केंद्र का यह दृष्टिकोण बहुत अर्थ रखता है। लोक और स्थानीय भाषा के मरते जाने के इस समय में अगर सरकार इस प्रकार की सोच रखती है, तो इससे शुभ भला क्या हो सकता है।

भाषाविद गणेश देवी ने कहा है कि वर्तमान में भोजपुरी दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली भाषा है। बावजूद इसके, अपने मूल परिवेश में ही यह सरकारी उपेक्षा की शिकार है। अगर ऐसा नहीं तो फिर पिछले साल बिहार सरकार द्वारा भोजपुरी को संवैधानिक हक देने के लिए भेजे गए प्रस्ताव पर केंद्र सरकार द्वारा किसी भी तरह की पहल करने की कोई सूचना क्यों नहीं है। अभी हाल ही में झारखंड सरकार ने भोजपुरी सहित कुछ अन्य लोकभाषाओं को द्वितीय भाषा का दर्जा दिया है। कहना न होगा कि किसी भी राष्ट्र की तरक्की और उसके विकास में सबसे बड़ा योगदान होता है संकल्प शक्ति का और संकल्प शक्ति मातृभाषा से ही आ सकती है। विदेशी भाषाओं में संकल्प नहीं लिए जाते और विदेशी भाषाओं के संकल्प कभी पूरे नहीं हो पाते।

गौरतलब है कि 2 मार्च, 2017 को बिहार सरकार ने भोजपुरी को द्वितीय भाषा का दर्जा दिया। झारखंड सरकार ने भी भोजपुरी को द्वितीय भाषा का दर्जा देने का संकल्प जाहिर किया। वहीं मॉरीशस सरकार ने वर्ष 2011 में भोजपुरी को संवैधानिक मान्यता दी और अभी मॉरीशस के सभी ढाई सौ सरकारी हाई स्कूलों में भोजपुरी के पठन-पाठन की व्यवस्था की गई है। मॉरीशस सरकार की पहल पर ही यूनेस्को ने भोजपुरी ‘गीत-गवनई’ को विश्व सांस्कृतिक विरासत की सूची में शामिल किया है। मॉरीशस सरकार के इस प्रस्ताव को विश्व के तकरीबन एक सौ साठ देशों ने अनुमोदित किया।

दूसरी ओर, भारत सरकार भोजपुरी को संवैधानिक मान्यता तो नहीं दे रही है, पर उसके कलाकारों/ साहित्यकारों को पद्म पुरस्कारों से सम्मानित कर भोजपुरी के प्रति अपनी सदिच्छा जाहिर कर रही है। अभी हाल में भोजपुरी-कोकिला कही जाने वाली शारदा सिन्हा को पद्म-भूषण सम्मान से सम्मानित किया गया। बीते वर्ष लोक गायिका मालिनी अवस्थी को पद्मश्री का सम्मान प्रदान किया गया। वयोवृद्ध भोजपुरी-हिंदी साहित्यकार कृष्ण बिहारी मिश्र को भी इस वर्ष पद्मश्री से सम्मानित किया गया। बीते साल केंद्र सरकार की ही पहल पर दिल्ली में भोजपुरी फिल्म समारोह का आयोजन संस्कृति मंत्रालय द्वारा किया गया। केंद्र सरकार के इन कदमों से यह जाहिर होता है कि वह भोजपुरी कला का सम्मान तो कर रही है, लेकिन भोजपुरी भाषा को लेकर उसने कोई ठोस पहल नहीं की है। केवल सरकारी मान्यता न होने की वजह से भोजपुरी भाषी करोड़ों बच्चे अपनी मातृभाषा में ‘भारत वाणी पोर्टल और एप्प’ जैसे नवाचारों का लाभ उठाने से वंचित हैं। गौरतलब है कि भारतवाणी पोर्टल और एप्प के माध्यम से संविधान की आठवीं अनूसुची में शामिल बाईस भाषाओं में शिक्षण सामग्री और दृश्य-श्रव्य पाठ उपलब्ध कराया जा रहा है।

अप्रैल, 2017 में किए गए एक अध्ययन में यह सामने आया कि 2021 तक देश में पचहत्तर फीसद लोग अपनी मातृभाषाओं में इंटरनेट का उपयोग कर रहे होंगे और अगले पांच वर्षों में इंटरनेट पर आने वाले दस में से नौ लोग अपनी भारतीय भाषा में इंटरनेट का उपयोग करना चाहेंगे। यह सर्वविदित है कि मातृभाषा में प्राप्त ज्ञान सुगम्य होता है। इसकी स्मृतियां लंबे समय तक हमारे मस्तिष्क में मौजूद रहती हैं। यूनेस्को ने इस संबंध में एक रिपोर्ट प्रकाशित की है। उसमें उल्लेख है कि ‘मातृभाषा के माध्यम से प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करना प्रत्येक बच्चे का मूलभूत अधिकार है।’ बावजूद हिंदी के बाद देश और विदेश में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा भोजपुरी को इस ‘भारतवाणी’ कार्यक्रम में शामिल नहीं किया गया है। नतीजतन, करीब बीस करोड़ भोजपुरी भाषी लोगों के लिए उनकी मातृभाषा में कोई पाठ्य सामग्री मौजूद नहीं है। ऐसा कर हमारी सरकार यूएन चार्टर के दिशा-निर्देशों का पालन नहीं कर रही है।

अभी हाल में उपराष्ट्रपति महोदय ने कहा कि ‘चूंकि देश की अधिकांश आबादी हिंदीभाषी है, इसलिए हिंदी सीखना जरूरी है, लेकिन उससे पहले हमें अपनी मातृभाषा सीखने की जरूरत है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हर कोई अंग्रेजी सीखने की तरफ रुख कर रहा है, क्योंकि यह रोजगार की गारंटी देती है। इसलिए मैं देश को अपनी मातृभाषा को सीखने और बढ़ावा देने की बात कहना चाहता हूं।’ ऐसे में सवाल है कि भोजपुरी भाषियों के साथ ऐसी हकमारी क्यों की जा रही है? वह भी एक ऐसे दौर में, जब केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी हमेशा से भारतीय भाषाओं की पैरोकार रही है। कहना न होगा कि इससे पहले मैथिली, संथाली, बोडो और कोंकणी को आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया। यह भी सर्वविदित है कि बोलियां भाषाशास्त्र की दृष्टि से भाषाएं ही हैं, पर राजनीतिक नजरिए से उन्हें बोलियां साबित करने का प्रयास होता रहा है। भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग न तो किसी भाषा विशेष का विरोध है और न ही उसे कमजोर करने की कोशिश या फिर उसे बांटने का प्रयास है। यह तो सिर्फ भोजपुरी के लिए उसकी अस्मिता, पहचान और सुविधाओं की मांग है।