महावीर राजी
उधर कहां चली रे…’ मृणालजी का फनफनाता स्वर उभरा।
‘जी आंटीजी, टॉयलेट…’ हीरामणि ने होंठों ही होंठों में खी-खी करते हुए दांई कनिष्ठा को खड़ी करके रूम के साथ लगे बाथरूम की ओर इशारा कर दिया।
‘लो कर लो बात, आए अभी आधा घंटा भी नहीं हुआ और पैंतरा शुरू, हंह!’ होंठों पर वक्र मुस्कान उभर आया। हीरामणि भी मन ही मन हंसी। बेशक काम ज्वाइनकिए आधा घंटा ही हुआ है, पर पेशाब की हाजत क्या काम का ज्वाइनिंग समय या शुभ मुहूर्त देख कर आएगी? उसको आना था, सो आ गई। आंटीजी की हंसी पर नन्ही गौरैया की चीं-चीं जैसी खिलंदड़ी हंसी का पैबंद जड़ती हिनहिनाई- ‘सच आंटीजी, जोर से लगा है। झूठ नहीं कह रहे हम…।’
‘अच्छा ठीक है, ठीक है! जा…।’ मृणालजी का स्वर नरम हो गया- ‘पर इस बाथरूम में नहीं। तू लोग के लिए बंगले के पिछवाड़े में स्पेशल टॉयलेट बना हुआ है। समझी न, वहीं जाना है।’ हीरामणि एक क्षण को ठिठकी, फिर खरगोश सी फुदकती पिछवाड़े की ओर लपक गई।
दो दिन पहले जब अम्मा ने हीरामणि से कहा कि आज से तेरा स्कूल बंद… बहुत पढ़ लिया… छोरियों को इससे ज्यादा पढ़ने की जरूरत ना है… अब तेरे छोटे भाइयों की पढाई, घर खर्च और पिता की दवा-पानी के जुगाड़ में हाथ बंटा… तो वह बहुत खुश हुई। पढ़ने में उसका भी मन कहां लगता था! किताबें और होमवर्क के नाम से ही ऊब होती। इतिहास, भूगोल और विज्ञान-गणित के अष्टावक्री सूत्र और ब्योरे तो बहुत आतंकित करते। हां, कविता और कहानियां खूब लुभातीं उसे। ‘पंच परमेश्वर’ और ‘पूस की रात’ तो पांचवीं तक आते-आते पाठ्यक्रम में ही पढ़ लिया था। इसके बाद ढेरों कहानियां अन्य बड़ी कक्षाओं की सहेलियों की पुस्तकें लेकर पढ़ डाली थीं। कुछ कहानियां तो अभी भी जेहन में घुमेरे घालती रहती हैं।
स्कूल बस मध्याह्न भोजन के लालच में जाती। वहां एक टाइम का पेट भर जाने लायक खाना मिल जाता। भले ही बेस्वाद! अन्यथा घर में! पेट भरे चाहे न भरे, गिनती की पतली-पतली दो रोटी और आलू का वही एक रस साग! यह भी बड़ी मुश्किल से जुट पाता। कभी-कभी थोड़ी सी अन्य तरकारी बनती भी तो वह पिता और भाइयों के लिए अलग रख दी जाती। जिस दिन स्कूल बंद रहता उस दिन मारे भूख के हालत बुरी रहती। मां कुछ कह भले ही न पाती, पर समझ सब रही थी।
ग्यारह वर्ष की ही उम्र थी अभी उसकी। पिता लकवाग्रस्त होकर खाट पर पड़े थे। तीन छोटे भाई और थे उसके पीछे! छह जन के पेट के कुएं अकेले मां की तीन घरों की पिद्दी सी आमदनी से कैसे भर पाते! अंतत: उसे स्कूल से छुड़ा कर काम पर लगा देने का निर्णय ले लिया गया। घरेलू महरी का काम! मां की तरह! बर्तन, कपड़ा और झाड़ू-पोंछा!
शहर का पॉश इलाका था- हिल व्यू। हालांकि आसपास तो क्या, दूर-दूर तक किसी भी पहाड़ी या पठार का दृश्य रत्ती भर भी दृश्यमान नहीं था। फिर भी लोगों ने इसका नाम हिल व्यू रख छोड़ा था। कॉलोनी नई-नई बसी थी। इसी कॉलोनी के गिरिधर बाबू के बंगले में हीरामणि काम से लगी थी। खुले-खुले आंगन वाला बड़ा सा मार्बल सज्जित चमचमाता बंगला! हर रूम के साथ लगा बाथरूम-टॉयलेट! आधुनिक सोफा, कारपेट, झाड़-फानूस, फ्लावर पॉट, वाल शोपीस इत्यादि! इस कॉलोनी में मां की तरह बस्ती की ढेरों औरतें और लड़कियां काम कर रही थीं।
आज सुबह अम्मा खुद साथ आकर हीरामणि को मृणालजी के यहां छोड़ गई थी- ‘ये हमरी छोरी है मैम साब…! पांचवी तक पढ़ी! अंग्रेजी भी पढ़ लेवे है। कामकाज में बड़ी होशियार! शिकायत का मौका ना देगी!’ फिर हुलस कर उसकी और मुखातिब हुई थी- ‘छोरी, खूब मन लगा कर काम करियो, ठीक?’
अम्मा चली गई। मृणालजी उसे ऊपर से नीचे स्कूल की ‘हेड मिस’ की पोस्टमार्टमी नजरों से निहारने लगीं। मरगिल्ली सी लड़की! पतले से चेहरे पर हिरणी सी बड़ी-बड़ी बोलती हुई शरारती आंखें! महरी के काम के लिए अंग्रेजी जानना जैसे कोई विशेष योग्यता हो, कैसी गर्वीली खनक के साथ बता गई इसकी अम्मा, हंह! ढंग से काम कर ले तो बहुत है! मृणालजी की निहारने की भंगिमा पर हीरामणि की हंसी छूटने को हुई। मानो वह कोई सब्जी-भाजी हो, खरीदने के पहले जिसे खूब उलट-पुलट कर देखा जाता है। बड़ी मुश्किल से होंठ दबा कर हंसी रोक सकी।
‘नाम क्या है रे…’
‘हीरामणि…!’ नाम बताते हुए खिल-खिल करके हंसी, तो मृणालजी के चेहरे पर बल पड़ गए। कुछ पल के लिए मौन रह गर्इं। उनकी बेटी का नाम मणिका मोहिनी था। लगभग इसी के उम्र की थी। बड़े प्यार से काफी खोज बिन के बाद रखा था राजसी मिजाज का यह नाम। महरी का लगभग मिलता-जुलता सा नाम कैसे सुहाता? मन ही मन कुढ़ उठीं। ये कामवालियां भी न, ठीक से बोलना भले ही ना आए, पर रखेंगे ऊंची जात वालों जैसा संभ्रांत नाम! फिर फनफनाते हुए बोलीं- ‘लो, तू लोगों में इतना भारी-भरकम नाम भला कोई रखता है! मुनिया, छुनिया या गंगी, सुरसती जैसे छोटे नाम ही रखे जाते हैं कि नहीं? न.. न.., नहीं चलेगा। इसे छोटा और सरल करना होगा। ऐसा करते हैं कि इसे मुन्नी कर देते हैं। हम तुझे मुन्नी बुलाएंगे। ठीक?’ हीरामणि मन ही मन फनफना उठी। नाम भारी-भरकम है तो है, आपको क्या आपत्ति है! हम छोटी जात वालों की छोटी-छोटी खुशी भी आप लोगों को बर्दाश्त क्यों नहीं होती! पर कह नहीं सकी और चुपचाप काम से लग गई।
पेशाब की हाजत जोर से लगी थी, सो तेज कदमों से कोठी के पिछवाड़े दौड़ पड़ी। पहले कमरों की शृंखला, फिर बड़ा सा ड्राइंग रूम, उसके बाद दालान, छोटी सी फुलवारी! फुलवारी के बगल में गैराज! गैराज से सटा दाएं कोने में बना था टॉयलेट। उसकी बस्ती में जैसा था ठीक वैसी ही शक्ल सूरत वाला! साधारण, रंग उड़ा और काई जमा! ऊपर टिन की छत। उफ! एक सेकंड की भी और देर हुई होती तो पेशाब सलवार में ही निकल जाता। उसे बहुत कोफ्त हुई।
दुबारा फिर तलब लगी तो उसके कदम बेख्याली में रूम के साथ लगे टॉयलेट की ओर बढ़ गए। मृणालजी की तेज नजरों से उसकी हरकत छुपी न रही- ‘अरे, उधर कहां?’
‘पेशाब लगा आंटीजी… अभी आई…।’ कसमसाकर बोल पड़ी।
‘बार-बार समझाना पड़ेगा कि तुम लोगों के लिए टॉयलेट पिछवाड़े में बना हुआ है। एक बार में बात समझ में नहीं आती?’ मृणालजी के लहजे में आक्रोश घुला हुआ था।
‘बड़ी जोर से लगा आंटीजी। वो टॉयलेट बहुत दूर है।’
‘कोई बहाना नहीं! दौड़ कर जा। रूम वाले टॉयलेट तुम लोगों के लिए नहीं हैं, समझी।’
‘पर आंटीजी, टॉयलेट तो टॉयलेट ही ठहरा न! यूज दोनों का एक ही है। फिर हर्ज क्या है?’
‘चार जमात क्या पढ़ ली, तू तो जबान लड़ाने लगी रे! वो भी अंग्रेजी में, ऐंय…?’ मृणालजी उसके ‘यूज’ शब्द के व्यवहार से कुढ़ कर आंखे तरेरती हुई तल्ख स्वर में चीखीं। हीरामणि मन मसोस कर तेजी से पिछवाड़े की तरफ दौड़ पड़ी। हाजत खूब जोर से हो आई थी। वहां पहुंच कर सलवार खोलते-खोलते भी दो बूंद रिस ही गई और सलवार पर गीलेपन का छोटा सा वृत उभर आया। वह लज्जा से सिहर उठी। हाय राम! ये क्या हो गया! ड्राइंग रूम में अंकलजी और उनके मित्र बैठे थे। उनकी दुलारी बेटी भी स्कूल से लौट आई थी। किसी की भी नजर वृत पर पड़ सकती है! उफ! क्या सोचेंगे सब। वृत पर हथेली की आड़ देकर धीरे-धीरे भीतर लौटते हुए हीरामणि शर्म से पानी-पानी होती रही। लग रहा था मानो सभी की नजरें उस वृत पर ही टिक आई हों और सभी मन ही मन उसकी इस हरकत पर हंस रहे हों।
हीरामणि समझ नहीं पा रही थी कि जब सभी टॉयलेट होते एक ही काम के लिए हैं, चाहे वे मार्बल के बने हों या साधारण प्लास्टर के, तो आंटीजी उसे रूम से लगे टॉयलेट में जाने से मना क्यों करती हैं। मार्बल का चमचमाता हुआ नाजुक सा टॉयलेट है इसलिए? पर उन लोगों के पेशाब करने से वो गंदा नहीं होता तो इस बेचारी हीरामणि के पेशाब से क्यों गंदा होने लगा भला? या फिर मूत्र की भी जाति होती है? ऊंच और नीच जाति! यानी कि उनका मूत्र गंगाजल और हमारा गंदा पानी!
दो दिन और बीते। इस बीच जब-जब उसे पेशाब की हाजत लगी, बेख्याली में पांव अनायास ही रूम से लगे टॉयलेट की और बढ गए। मृणालजी की गिद्ध दृष्टि ने तपाक से इसको भांप कर तेज डांट का कोड़ा फटकार दिया। वह हर बार सहम कर पिछवाड़े की ओर दौड़ गई। लेकिन कल तो अति ही हो गई। काम करते-करते अचानक लघुशंका का वेग इस कदर जोर से आया कि वह खुद को रोक नहीं पाई और हड़बड़ा कर रूम के साथ संलग्न टॉयलेट में घुसने को हुई। पास ही सोफे पर बैठी मृणालजी त्वरित गति से उठीं, कंधे से पकड़ कर बाहर खींचा और गाल पर तड़ से तमाचा जड़ बैठीं- ‘बार-बार मना करने पर भी बाज नहीं आती! आने दे तेरी अम्मा को…।’ तमाचे से हीरामणि सन्न रह गई।
मन ही मन अपमान बोध से तिलमिला भी उठी। वह जानबूझ कर इन टॉयलेट में थोड़े ही जाना चाहती है! अब हाजत एकदम से इतनी तीव्र उतर जाए कि रोकना कठिन हो तो क्या करे भला? पर इस जरा सी बात के लिए थप्पड़ जड़ देना! उफ! फिर पिछवाड़े वाले टॉयलेट तक पहुंचते-पहुंचते कुछ बूंदें रीस कर सलवार पर गीलेपन का वृत बना ही गई थी।
अचानक जेहन में कभी की पढ़ी प्रेमचंद की कहानी ‘ठाकुर का कुंआ’ कौंध गई। स्कूल छोड़ने के कुछ दिन पहले ही पढ़ी थी। सातवीं में पढ़ने वाली लक्ष्मी के कोर्स में थी। उससे किताब लेकर! एक बार पढ़ने पर मन नहीं भरा। कई-कई बार पढ़ी। जोखू के गंदे पानी को पीने की मजबूरी पर और ठाकुरों की हेय वर्जना व तिरस्कार से गंगी के भीतर बर्फ की तरह जमे भय पर कलेजा मुंह को आ गया। आज से पचासों साल पहले की छुआछूत की स्थिति रूप बदल कर सामने नमूदार थी। रूम से लगा टॉयलेट मानो ठाकुर के कुएं की मानिंद हो गया था, जिसे उसकीजैसी छोटी जाति की कामवालियों को छूने और व्यवहार करने की सख्त मनाही थी। मानो यदि वे उसमें निपटान कर लेंगी तो वे टॉयलेट अपवित्र हो जाएंगे।
ये कामवाली बाइयां उनके बर्तन भांडे, पलंग बिछौने छुए तो कोई बात नहीं। यदि एक दिन भी काम पर न आए तो पूरा घर अस्त-व्यस्त होकर कबाड़ में तब्दील हो उठेगा। इन बड़े लोगों की जिंदगियों को व्यवस्थित रूप देने वालियों के प्रति मन में इतनी घृणा और तिरस्कार! वाह!!
तभी उसके भीतर जिद का स्फुलिंग सुलग गया। एक अजीब सी बाल सुलभ जिद! अब वह यहां काम नहीं करेगी। कतई नहीं! पर काम छोड़ने के पहले सेठानी से तमाचे का बदला जरूर लेगी। पर किस तरह…? उस जैसी छोटी लड़की के लिए बड़ा यक्ष प्रश्न! तीन दिन सोचने में निकल गए। चौथे दिन जेहन में अचानक एक युक्तिचिलक ही गई। उसके सूखे होंठों पर मासूम हंसी नन्हें चूजे सी चीं-चीं कर उठी।
दिन के ग्यारह बजे थे। मृणालजी पलंग पर बैठी टीवी देख रहीं थीं। हीरामणि कमरे में पोछा लगा रही थी कि अचानक मुंह पर बांई हथेली टिका कर ओक ओक करती किंकिया उठी- ‘मैडमजी, उल्टी आ रही…।’
‘अरे, तो जल्दी पिछवाड़े दौड़…।’ मृणालजी नाक-भौं सिकोड़ती हड़बड़ाईं।
‘ओक… ओक…’ हीरामणि ने पूरी कुशलता से अभिनय जारी रखा- ‘जोर से आ रही… रास्ते में ही हो सकती…।’ फिर अनुमति की प्रतीक्षा किए बिना ही रूम से लगे ‘ठाकुर के कुंए’ में जा घुसी। मृणालजी का मुंह खुला का खुला रह गया। हीरामणि ने भीतर आकार सबसे पहले टॉयलेट को लॉक किया। आंख फाड़ कर नजरों को ‘जूम’ करते हुए खूब नदीदी की तरह टॉयलेट के संगमरमरी फर्श और दीवारों का मुआयना करने लगी।
फिर आराम से पैन पर बैठ गई और पूरी तरह हुलस कर मूत्र के अपवित्र जल से उसको सिंचित किया। बांई और लगे आईने में अपना श्रीमुख निहारते हुए माथे की टिकुली ठीक की। बेसिन में कुल्ला-किल्लर किया। फर्श के बड़े से चिकने ‘रनवे’ पर अजंता की मूर्तियों की सी भंगिमा में ‘कलात्मकता’ से हवा में हाथ-पांव फटकारे। अपने तई टॉयलेट की जी भर कर ऐसी-तैसी कर लेने के बाद मन रुई की तरह हलका हो गया- ‘लो गंगी मौसी, मैंने तेरे अपमान का बदला ले लिया…! तुम तो जल मांगने गई थी, मैंने ठाकुर को ‘जल’ दान दिया है!’
चुन्नी से मुंह पोंछती बाहर आई तो खुशी के मारे कदम सीधे नहीं पड़ रहे थे। चेहरे पर विजयोल्लास की पुखराजी आभा खिली हुई थी। चोर नजरों से मृणालजी की ओर देखा… मेकअप पुता थोबड़ा मरे चूहे सा ढीला होकर लटका हुआ था।

