साक्ष्य
यह आजादी झूठी है। रेणु के उपन्यास में यह स्वर यों ही नहीं फूटता बल्कि यह उनकी बड़ी चिंता का स्वर है। यह उस खेद का स्वर है, जो गुलाम भारत से नए भारत में दाखिल होते हुए तमाम सपनों की लहूलुहान नियति देखकर रेणु जैसे संवदेनशील लेखक के मन में जब-तब टीस बनकर उभरती होगी। यह चिंता, यह टीस ही उन्हें बिहार आंदोलन के मुहाने तक ले आती है और वे पूरी तैयारी के साथ खड़े दिखते हैं लोकनायक जयप्रकाश नारायण के साथ।
चार नवंबर 1974 को पटना में प्रदर्शनकारियों और जेपी पर पुलिस की लाठियां बरसती हैं। रेणु खुद भी खाकी सख्ती के शिकार होते हैं। यह सब उन्हें सरकार के तानाशाह रवैये के खिलाफ आक्रोश से भर देता है। वे भीतर तक तिलमिला उठते हैं। क्षोभ और गुस्से की इसी मनोदशा में लेखकीय प्रतिकार की बड़ी मिसाल पेश करते हुए वे पद्मश्री के अलंकरण को न सिर्फ राष्ट्रपति को लिखे पत्र के साथ लौटा देते हैं बल्कि इसे वे ‘पद्मश्री’ की जगह ‘पापश्री’ करार देते हैं। वे यहीं नहीं रुकते। बिहार के राज्यपाल को अलग से एक पत्र लिखकर वे राज्य सरकार से हर महीने मिलने वाली 300 रुपए की वृत्ति को भी लौटाने का फैसला करते हैं।
राष्ट्रपति को लिखा पत्र
प्रिय राष्ट्रपति महोदय,
21 अप्रैल, 1970 को तत्कालीन राष्ट्रपति वाराह वेंकट गिरि ने व्यक्तिगत गुणों के लिए सम्मानार्थ मुझे पद्मश्री प्रदान किया था, तब से लेकर आज तक मैं संशय में रहा हूं कि भारत के राष्ट्रपति की दृष्टि में अर्थात भारत सरकार की दृष्टि में वह कौन सा व्यक्तिगत गुण है जिसके लिए मुझे पद्मश्री से अलंकृत किया गया। 1970 और 1974 के बीच देश में ढेर सारी घटनाएं घटित हुई हैं। उन घटनाओं में, मेरी समझ से बिहार का आंदोलन अभूतपूर्व है। चार नवंबर को पटना में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में लोक इच्छा के दमन के लिए लोक और लोकनायक के ऊपर नियोजित लाठी प्रहार, झूठ और दमन की पराकाष्ठा थी।
आप जिस सरकार के राष्ट्रपति हैं, वह कब तक लोक इच्छा को झूठ, दमन और राज्य की हिंसा के बल पर दबाने का प्रयास करती रहेगी? ऐसी स्थिति में मुझे लगता है कि पद्मश्री का सम्मान अब मेरे लिए ‘पापश्री’ बन गया है।
साभार मैं यह सम्मान वापस करता हूं।
सधन्यवाद
भवदीय
फणीश्वरनाथ रेणु
राज्यपाल को लिखा पत्र
प्रिय राज्यपाल महोदय,
बिहार सरकार द्वारा स्थापित एवं निदेशक, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना द्वारा संचालित साहित्यकार, कलाकार कल्याण कोष परिषद द्वारा मुझे आजीवन 300 रुपए प्रतिमाह आर्थिक वृत्ति दी जाती है, अप्रैल 1972 से अक्तूबर 1974 तक यह वृत्ति लेता रहा हूं।
परंतु अब उस सरकार से, जिसने जनता का विश्वास खो दिया है, जो जन आकांक्षा को राज्य की हिंसा के बल पर दबाने का प्रयास कर रही है, उससे किसी प्रकार की वृत्ति लेना अपना अपमान समझता हूं। कृपया इस वृत्ति को बंद कर दें।
सधन्यवाद
भवदीय
फणीश्वरनाथ रेणु
‘रेणु समय’
लेखक का मौन उसकी मुखरता से भी कैसे ज्यादा असरदार होता है, इसे आठ अप्रैल 1974 को बिहार आंदोलन को दिए गए जेपी के पहले कार्यक्रम से भलीभांति समझा जा सकता है। यह पहला कार्यक्रम एक मौन जुलूस था। ‘हमला चाहे जैसा होगा हाथ हमारा नहीं उठेगा’ जैसे लिखे नारों वाली तख्तियों को हाथों में उठाए और हाथों में पट्टी बांधे हुए सत्याग्रहियों की जो जमात पटना की सड़कों पर चल रही रही थी, उसमें संस्कृतिकमिर्यों की टोली भी शामिल थी। इस जुलूस में हिस्सा लेने वालों में रेणु का नाम सर्वप्रमुख था।
संपूर्ण क्रांति आंदोलन के लिए दर्जनों लोकप्रिय गीत रचने वाले गोपीवल्लभ सहाय ने तो समाज, रचना और आंदोलन को एक धरातल पर खड़ा करने वाले इस दौर को ‘रेणु समय’ तक कहा है। व्यंग्यकार रवींद्र राजहंस की उन्हीं दिनों की लिखी पंक्तियां हैं- ‘अनशन शिविर में कुछ लोग/ रेणु को हीराबाई के रचयिता समझ आंकने आए/ कुछ को पता लगा कि नागार्जुन नीलाम कर रहे हैं अपने को/ इसलिए उन्हें आंकने आए।’
