सुधा तैलंग

बहुत पुरानी बात है। चंपक वन में एक बंदर रहता था, टिंकू। टिंकू की मां सुंदरी उसको जन्म देते ही मर गई थी। सभी जानवरों के लाड़-प्यार के कारण टिंकू शरारती होता जा रहा था। वह कभी किसी की पूंछ खींच लेता,तो कभी किसी के कान मरोड़ कर भाग जाता। जंगल के बुजुर्ग हाथी दादा, लोमड़ी मौसी, भालू काका उसे समझाते पर टिंकू की शरारतें कम होने का नाम ही नहीं लेतीं। टिंकू की दोस्ती साथी बंदरों से नहीं थी, बल्कि कालिया कौआ, हीरामन तोता, मिक्की चूहा से थी। पहाड़ी के नीचे एक बगीचे में माली ने आम-अमरूद, पपीता और केले के पेड़ लगा रखे थे। टिंकू एक दिन उछल कूद करते-करते अकेले ही वहां जा पहुंचा। केले और अमरूद जी भर कर खाए। पेट भर गया तो कच्चे फल तोड़कर फेंक दिए। माली जब शाम को लौटा तो देखकर बेहद दुखी हुआ।

दूसरे दिन भी टिंकू बगीचे में जा पहुंचा। उसने फल खाए और बाद में डालियों पर लटक-लटक कर उन्हें तोड़ दिया। बूढ़ा माली यह सब छिप कर देख रहा था, वह जब तक डंडा लेकर दौड़ा तब तक टिंकू एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर छलांग लगाकर छूमंतर हो गया। बूढ़ा माली जान चुका था कि अब तो ये शैतान बंदर रोज यहां आएगा और उसके हरे-भरे बगीचे को उजाड़ेगा। माली गांव के एक मदारी के पास गया और उसे अपनी परेशानी बताई। मदारी को बूढ़े माली पर दया आ गई, वह उसकी मदद करने को तैयार हो गया। दूसरे दिन जब टिंकू बंदर सुबह-सुबह उछलते कूदते बगीचे में जा पहुंचा। अमरूद खाने के लिए पेड़ पर ज्यों ही छलांग लगाई। जाल के छेद में उसके पैर फंस गए। खों-खों करके उसने पहले अपना गुस्सा जतलाया फिर हाथ-पैर पटके पर तब तक मदारी और उसके साथी ने उसे जाल में लपेट कर बांध लिया और बस्ती में ले जाकर एक छोटे से कमरे में बंद कर दिया।

जंगल की खुली हवा में आजाद होकर उछल-कूद करने वाला टिंकू बंदर भला एक कमरे में बंद होकर कैसे रह सकता था। वह खूब चिल्लाया-रोया पर उसकी आवाज कौन सुनता। आज उसे अपने दोस्तों की बात याद आने लगी। अपनी गलती पर पश्चात्ताप होने लगा। काश! वह आज अकेला छिपकर नहीं आता। दोपहर में खिड़की से मदारी ने उसे केले खाने को दिए और एक बरतन में पानी भी, पर उसने केले छुए तक नहीं। जब देर रात तक टिंकू बंदर चंपक वन नहीं पहुंचा तो पूरे जंगल में हाहाकार मच गया। भालू काका, लोमड़ी मौसी, हाथी दादा बेहद चिंतित होने लगे। उधर टिंकू के दोस्त कालिया कौआ और भूरा चूहा परेशान थे।

सुबह हीरामन तोते ने कालिया को बताया कि कल मैंने गांव के मदारी से बूढ़े माली को किसी बंदर को पकड़ने के लिए बात करते सुना था। मदारी के पास एक जाल भी था। सभी दोस्तों ने मिलकर टिंकू को ढूढ़ने की ठान थी। कालिया कौए को ये काम सौंपा गया क्योंकि वह आसानी से उड़ कर कहीं भी पहुंच सकता था। रस्सी में बंधा टिंकू बंदर भी मदारी के डंडों की मार के आगे हार मान चुका था। दोपहर में डंडा लेकर मदारी आया और टिंकू को करतब सिखाने की कोशिश की। शाम को मदारी दरवाजे की कुंडी बंद कर चला गया। कालिया ने जंगल की बस्ती के घरों में बैठ कर और कांव-कांव की आवाज की। ठिंकू को अपने दोस्त कालिया कौए की आवाज सुनाई पड़ी, वह खुशी से चीख पड़ा। उसने खों-खों करके कालिया को बुला लिया। कालिया ने खिड़की से टिंकू को रस्सी से बंधा देखा। कुछ ही देर बाद भूरा चूहा अपने साथी चूहों के साथ खिड़की के छेद से अंदर आ गया। अपने तेज दांतों से टिंकू की रस्सी काट दी।

कालिया ने अपनी चोंच से बाहर दरवाजे की कुंडी धीरे-धीरे सरका दी। दरवाजा खुलते ही टिंकू अपने साथियों के साथ चंपक वन की ओर भाग निकला। टिंकू बंदर के वापस लौटने की खबर पूरे जंगल में फैल चुकी थी। टिंकू को हाथी दादा ने समझाया कि अगर उसके दोस्त मदद नहीं करते तो उसे मदारी की कैद में ही रहना पड़ता। उसने अपनी गलतियों के लिए सबसे माफी मांगी। टिंकू में अब बदलाव आ चुका था। अब टिंकू बंदर पहले जैसा शरारती, नटखट नहीं था। उसे सबक जो मिल गया था। जंगल के सभी पशु पक्षी बेहद खुश थे। पूरे चंपक वन में खुशी का माहौल था।