वाज़दा ख़ान
उद्दाम बीहड़ता की सघनता से
निकले शब्दों में खुलता आकाश
रात और भरापूरा मन
दूर तक पसरा शिखर पर अंटा
जीवंत सन्नाटा
नैतिकता और सभ्यताओं से भरा
समकालीन होती किसी कहानी के
पात्रों को विस्तार देता है
हरहराती हैं वहां पता नहीं कितनी
वर्जनाओं की तंग संकरी गलियां
इन्हीं तंग संकरी गलियों से गुजरना
विराटता का कोई द्वार
स्वयं को पूरी तरह जान पाने में
सक्षम है।
पैमाना
रुकना चलना दूरियां क्या मायने रखती हैं
जब डूबना है अवास्तविकताओं की
काली लंबी रातों में
कई बार रात-दिन की तरह
वास्तविक बन कर चमकती है
मेरे भीतर की सबसे गहरी सुरंग में
सुरंगें केवल पहाड़ों पगडंडियों में नहीं होतीं
समंदर और नदियों में भी होती हैं
उस पारंगत सुनहरे आकाश में भी
हमारे दिलों में भी बहुत गहरी और अंधेरी
अथाह गहराई का तमाम सच
रखती हैं हर शती में
निश्चित तौर पर वहां हैं
फिरंगी जन्नतें और
कई वर्जनाएं तो विलक्षण आत्मीय
अनिर्वचनीय चाहत में
सौरमंडल का चक्कर लगाती
सहज और असहज के बीच
लौ बन कर जलने लगती है
कुछ पारदर्शी आईनों में दिखाई देती है
कुछ इत्र की शीशियों में बंद अपारदर्शी
निर्विरोध संशयहीन उपस्थिति चुनती हुई
आखिर पैमाना बनने में बरसों लगते हैं।
और कुछ न हुआ
ख्वाहिशों का विलाप हुआ
कुफ्र हुआ
और कुछ न हुआ
बादल फटा पानी गिरा
दरक दरक कर
चट्टानें टकराती बिखरती रहीं
और कुछ न हुआ
उसने जेब से अपना हाथ
निकाला क्षितिज पर उगे
इंद्रधनुष को
अचानक छू लिया
एक मुट्ठी रंग उसकी हथेलियों में
आए और कुछ न हुआ
जिस्मों का धीरे-धीरे बुत में
तब्दील होते जाना
नब्जों का सुन्न होना
और कुछ न हुआ
सूखे पत्तों और तेज हवा से
भर गया दामन
आग लगी और कुछ न हुआ।
गुपचुप आहट
न तुम्हारे पास कोरा कैनवस है
न मेरे पास
जिंदगी की तमाम गुपचुप आहटों ने
कैनवस पर जो भी अंकित किया
वैसा ही रहेगा वह ताउम्र
रूबरू हों शायद हम उसके ऊपर
कुछ और रंग लगा कर
उसे और खूबसूरत कर सकते हैं
सुनहरे सिल्वरी रंग के दोने
मनफलक पर उलट कर
जिंदगी का कोई हिस्सा
रोशन कर सकते हैं
हो सकता है तब
अंधेरी खाइयों में डूबे
बुत बने तमाम मायने
मन की सतह पर तैरने लगें।

