नाज़ ख़ान
हाल में महाराष्ट्र बोर्ड की समाजशास्त्र की बारहवीं की किताब में उल्लेख था कि कम सुंदर और दिव्यांग लड़कियों के लिए दूल्हा ढूंढ़ने में काफी मशक्कत करनी पड़ती है और रिश्वत के तौर पर शादी के वक्त ज्यादा दहेज देना पड़ता है। किताब को लेकर हो-हल्ला मचा। मगर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि लड़कियों की महत्ता को उनकी सुंदरता से ही आंकने का चलन बढ़ता जा रहा है। आज के इस आधुनिक दौर में भी किसी लड़की को उसकी बौद्धिक क्षमता या दूसरे सद्गुणों के बजाय दैहिक सुंदरता के आधार पर ही पसंद करने का रिवाज ज्यादा है। इसी दबाव यह है कि अब खुद लड़कियों ने भी सुंदरता को मानक मानते हुए इसे बढ़ाने और बनाए रखने के उपाय शुरू कर दिए हैं। इसी बात का फायदा बाजार और सौंदर्य सामग्री बनाने वाली बड़ी-बड़ी कंपनिया उठा रही हैं। यहां तक कि प्लास्टिक सर्जरी कराने की प्रवृत्ति भी तेजी से पनप रही है। सौंदर्य प्रसाधन बनाने वाली बड़ी-बड़ी कंपनियों ने मौके की नजाकत को भांपते हुए एक से बढ़कर एक क्रीम, पाउडर, लोशन, फेसपैक आदि रोजाना बाजार में उतार रही हैं।
सुंदर बने रहने की भूख ने जहां इन सौंदर्य उत्पादों को जांचना-परखना जरूरी नहीं समझा, वहीं अपने उत्पाद बेचने और बाजार पर हावी रहने की चाह में कंपनियों ने भी नियम-कायदे ताक पर रखने शुरू कर दिए। इसमें ब्रांडेड उत्पादों की नकली सामग्रियों भी थोक के भाव बाजार में आ गई हैं। असली में नकली का घालमेल करके एक बड़े बाजार पर कब्जा कर लिया गया है। मगर इस सब के बीच उपभोक्ता को मुंहमांगी कीमत अदा करने के बावजूद कोई लाभ नहीं हो पा रहा है। कई सर्वेक्षणों से पता चलता है कि महिलाएं अक्सर अपने सौंदर्य उत्पाद टेलीविजन के विज्ञापनों से प्रभावित हो कर खरीदती हैं। और इसी का फायदा उठाती हैं इन उत्पादों को बनाने और बेचनेवाली कंपनियां। लोग आंखें मूंद कर उनका उत्पाद खरीदें, इसके लिए लोकप्रिय अभिनेताओं-अभिनेत्रियों से विज्ञापन कराए जाते हैं।
सुं दर बनने की चाह में लोग इन उत्पादों को बिना यह जाने खरीद लेते हैं कि इनमें खतरनाक रसायन तो नहीं मिले हैं ? कई बार तो लोगबाग इसकी एक्सपाइरी डेट तक की परवाह नहीं करते। उपभोक्ताओं की इस लापरवाही से खुद उन्हें ही भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। सुंदर और जवान दिखने की होड़ में महिलाओं का एक बड़ा वर्ग बिना कुछ सोचे-समझे नए-नए उत्पादों को आजमाता रहता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक चेतावनी में चेतावनी में कहा है कि क्रीम, लोशन, साबुन और आंख संबंधी सौंदर्य उत्पादों में मिला पारा उपयोगकर्ताओं के लिए हानिकारक है। ऐसे में स्वास्थ्य को लेकर कई परेशानियां पनप रही हैं। इन उत्पादों के इस्तेमाल से त्वचा पर चकत्ते, दाने पड़ना आम बात है। इनका असर आंखों सहित जिस्म के दूसरे कई हिस्सों पर भी पड़ रहा है और त्वचा कैंसर और एलर्जी जैसे दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं।
ज्यादातर साबुन और क्रीम में मौजूद हानिकारक तत्त्व त्वचा की प्रतिरोधक क्षमता को भी कमजोर करते हैं। ‘सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट’ ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि चेहरे पर निखार का दावा करने वाली कई बहुराष्ट्रीय और बड़े ब्रांडों की क्रीमों में पारा और लिपिस्टिक में क्रोमियम और निकिल जैसी स्वास्थ्य के लिए खतरनाक धातुएं होती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आज गोरा करने के नाम पर बेचे जाने वाले ज्यादातर उत्पादों के दावे खोखले हैं। त्वचा पर ज्यादा प्रभाव खान-पान और सकारात्मक सोच से ही पड़ता है। इन उत्पादों में पारा के अलावा स्टेरॉयड, हाइड्रॉक्यूनोन जैसे हानिकारक रसायन मिले होते हैं। इनके प्रभाव से त्वचा कमजोर, ढीली और खुरदुरी हो जाती है।
आज स्लिम-ट्रिम बनाने के दावे पेश करती कई दवाएं, लोशन, क्रीम आदि से बाजार पटे पड़े हैं। अगर इनका प्रभाव होता तो आज अमेरिका जैसा विकसित देश मोटापे से न जूझ रहा होता। मगर वास्तविकता से दूर और ख्याली दुनिया दिखाने वाले मनभावन विज्ञापनों का ही चमत्कार है कि उपभोक्ता कंपनियों के हथकंडों को बिना समझे उनके उत्पाद खरीदते जाते हैं। सांवले रंग और मोटापे को किसी कमी की तरह प्रस्तुत कर लोगों में नकारात्मक प्रभाव भरा जा रहा है। लोगों की बढ़ती महत्त्वाकांक्षा और खुद को सबसे अलग दिखाने की मानसिकता को भुनाने के लिए कंपनियां कई तरह के उत्पादों को बाजार में उतार रही हैं। यही वजह है कि अब हर्बल उत्पाद के नाम से भी सौंदर्य सामग्रियों का बाजार खड़ा किया जा रहा है। नकली उत्पादों की तो खैर बाढ़ ही आ गई है। उपभोक्ताओं के लिए भी समझना मुश्किल है कि क्या असली है और क्या नकली?
भारत जैसे परंपरावादी समाज में लड़की को सुंदरता, देहयष्टि और उसके रंग से आंके जाने की खोखली मानसिकता खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही है। यही वजह है कि शुरुआत से ही लड़कियों को गोरा बनाने के लिए तरह-तरह के लेप, उबटन जैसे फार्मूले अपनाए जाते रहे हैं। मगर आज जब इस ओर लोगों को गहराई से सोचना होगा। आज कम उम्र की लड़कियों से लेकर बढ़ती उम्र की महिलाओं तक को इन उत्पादों ने जैसे अपना कैदी बना लिया है।
बॉलीवुड की अभिनेत्रियों की बड़ी जमात गोरे रंग, रेशमी बालों के नाम पर क्रीम, साबुन, तेल, शैंपू का विज्ञापन कर लोगों को फुसलाने में सहायक बन रही है। मगर तारीफ की जानी चाहिए अभिनेत्री नंदिता दास की, जिन्होंने इस तरह के उत्पादों और सांवले रंग को हीन दर्शाने वाले विज्ञापनों के खिलाफ एक मुहिम छेड़ रखी है। कुछ शोधों में यह बात भी सामने आई है कि सांवले रंग पर सूरज की किरणों का प्रभाव गोरे रंग के मुकाबले कम ही पड़ता है। इसकी वजह है सांवली त्वचा में पाया जाने वाला तत्व मेलनिन। इस तरह की त्वचा में सनटैन की समस्या कम होती है। वहीं गोरी त्वचा में कैंसर का खतरा बना रहता है।
गोरा बनने और सुंदर बनने की अंधी दौड़ में शामिल होने का ही नतीजा है कि आज त्वचा संबंधित रोग बढ़ रहे हैं? लोग खान-पान पर ध्यान देने की बनिस्बत ऊपरी चमक पर ज्यादा फिदा हैं। खूबसूरत बनने की लोगों की इसी दीवानगी ने इस व्यापार को पंख लगा दिएं हैं और इसकी बढ़त ऊंचे पायदान पर है। मगर आप तक पहुंचने वाले सौंदर्य उत्पाद सिर्फ आपकी सेहत और विश्वास से खिलवाड़ कर रहे हों ऐसा नहीं है, बल्कि इसका खामियजा जानवरों को भी उठाना पड़ रहा है। पशुओं के हित में काम करने वाले अंतरराष्ट्रीय संगठन ‘पेटा’ ने कई बार इस ओर ध्यान दिलाया है कि सौंदर्य उत्पादों का परीक्षण खरगोश, बिल्ली,चूहे, चिड़िया और बंदरों पर किया जाता है। लिपस्टिक से लेकर क्रीम, शेंपू, टूथपेस्ट आदि सभी उत्पाद इन्हीं बेजुबानों पर परखे जाते हैं। परीक्षण की प्रक्रिया में कई बार जीव-जंतु अपनी जान गंवा बैठते हैं या फिर उनकी त्वचा इन उत्पादों के प्रभाव से जख्मी हो जाती हैं।
बाजार में चेहरा
प्राचीन समय की कई कथाएं और इतिहास की पोथियां बताती हैं कि सुंदरता को महिलाओं को उनका अनिवार्य गुण माना जाता रहा है। यही वजह है कि चाहे साहित्य की कोई महिला पात्र हो या किसी कवि, शायर की कल्पना, सबमें नारी रूप की सुंदरता का बखान मिलता है। फिल्मों में तो हिरोइन होने की पहली शर्त ही सुंदरता है। कहने को तो ये कल्पनिक पात्र हैं मगर इस बात का महिलाओं पर इतना दबाव रहा है कि सुंदर दिखने के लिए वे कोई भी उपाय, उपचार अपनाने को तैयार रहती हैं। यह सिर्फ किसी आम महिला की ही बात नहीं है बल्कि आज कई व्यावसायिक घरानों की महिलाओं सहित नामी अभिनेत्रियों तक ने गोरे रंग और जवां दिखने के लिए व्हाइटनिंग ट्रीटमेंट, बोटोक्स इंजेक्शन से लेकर सर्जरी तक के विकल्प को चुना है। इनमें काजोल, रेखा, श्रीदेवी, दीपिका पादुकोण, प्रियंका चोपड़ा, ऐश्वर्या राय, सुष्मिता सेन जैसी अभिनेत्रियां तक शामिल हैं। हालांकि, दर्शकों ने इन्हें इनके वास्तविक रूप में भी काफी पसंद किया है। दरअसल, सर्जरी उन लोगों के लिए वरदान रही है जिनकापैदाइशी या किसी दुर्घटना के तहत कोई अंग नष्ट हो जाता है या जिनका चेहरा खराब हो जाता है। पहले इसी तरह के लोग सर्जरी कराते थे पर आज किसी को किसी अभिनेत्री की तरह दिखना है या और सुंदर होना है। इस कारण० सर्जरी कराने वाले ऐसे लोगों की तादाद ज्यादा बढ़ गई है। इसका मतलब यही है कि आज भी महिलाएं सबसे सुंदर दिखने के दबाव के साथ न सिर्फ जी रही हैं बल्कि इस ओर नए-नए विकल्प भी अपना रही है।
सौंदर्य उत्पादों का बाजार किसी दूसरे बाजार से कहीं ज्यादा तरक्की पर है। यह लोगों में अपने रूप सौंदर्य को लेकर बढ़ती समझ है या सनक कि आज कोई भी कंपनी गोरे होने के दावे के साथ कुछ भी बाजार में परोसती है तो लोग उसके पीछे भागने लगते हैं।
यही वजह है कि सौंदर्य उत्पादों का बाजार दिन दूनी, रात चौगुनी रफ्तार से बढ़ रहा है। इसका मौजूदा व्यापार करीब छह अरब डॉलर से ज्यादा का है और इसके 2025 तक 20 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। उद्योग संगठन ऐसोचैम के एक अध्ययन में कहा गया है कि लोगों की क्रय शक्ति और निम्न तबके की बढ़ती महत्त्वाकांक्षा ने इस उद्योग को बढ़ावा दिया है। वहीं लोगों की जेब की पहुंच के तहत और आकर्षक उत्पाद बाजार में उतारने से भी इसके व्यापार में इजाफा हुआ है। गांवों तक सड़क और संचार की पहुंच ने भी गली-गली सौंदर्य उत्पाद पहुंचा दिए हैं। जागरूकता और अच्छा दिखने की चाहत ने युवाओं को भी अपनी चपेट में ले लिया है और कम उम्र के लड़के-लड़कियों में भी इन उत्पादों के प्रति आग्रही हो रहे हैं। यही वजह है कि 2005 से 2015 तक के दरमियान किशोर वर्ग ने बड़ी संख्या में इन उत्पादों को अपनाया। ऐसे में इन उत्पादों को आॅनलाइन खरीदने का भी चलन बढ़ा है। करीब 62 फीसद लोग इन उत्पाद की खरीदारी आॅनलाइन शॉपिंग साइट से ही करते हैं। इस बाजार के बढ़ने का एक कारण यह भी है कि अब कई कंपनियां हर्बल और स्वदेशी सौंदर्य उत्पाद के नाम पर उपभोक्ताओं को रासायनिक उत्पाद से भरपूर उत्पाद परोस रही हैं। लोगों को जल्दी सुंदर और गोरा बनना है तो कंपनियों को जल्दी माल बेचना है। इसी जल्दबाजी में न कोई जांच सही परीक्षण से गुजर रही है और न ही लोग इसके पड़ने वाले प्रभाव को ही गंभीरता से ले रहे हैं।

