सुरेश सेठ
बहुत पहले ही रोटी, कपड़ा और मकान देने का शास्त्र पढ़ाने वाले चिंतकों ने यह कह दिया था कि मात्र इच्छा रखने से ही तुष्टि नहीं हो जाती। तब एक शब्द चित्र का उपहार भी हमें इन विज्ञजनों ने दिया था कि अगर कहीं इच्छाएं घोड़े बन जातीं तो सब भिखारी उन पर चढ़ कर शहसवारी करते नजर आते। लेकिन हमारी विडंबना ही यह रही कि हमारी इच्छाएं कभी हमारे लिए एक उड़ने वाला घोड़ा तो क्या एक लकड़ी का घोड़ा भी न दे सकीं। देश के बड़े सेवकों ने जुमलों की सहायता से उड़ने वाले हवाई घोड़ों से मुफ्त लंगर बांटने का बहुत ताम-झाम किया। जब-जब किसी इलाके में चुनावी दुंदुभि बजती तो हवाई घोड़े बांटने वाले ये सौदागर हमारी गलियों में तशरीफ ले आते। हम बरसों से जिन बंद कपाटों पर दस्तक देते हुए अपने लिए सांसों की खैरात मांग रहे थे, उन कपाटों के खुलने का आभास होता। प्राचीरों की खिड़कियां चंद देर के लिए खुलतीं और वहां से सपनों की बरसात होने लगती। आइए, इन सपनों की खोज-तलाश करें। इन सपनों में रोटी की बात नहीं होती, मालपुओं की बात होती है। खिचड़ी की बात नहीं होती, हलवे की बात होती है।
बात ही करनी है तो क्यों न ऊंची उड़ान भरी जाए? जैसे यह कह दिया जाता है कि हम इस धरती के जीव कल को चंद्र ग्रह या मंगल ग्रह पर अपनी बस्तियां बसाएंगे। आइए, आज ही इनका आरक्षण करवा लें। कोई नहीं सोचता कि आसमां पर जो खुदा है, वह हम जमीं वासियों की ओर आजकल देखना बंद कर चुका है। सड़कें टूट गईं। लेकिन हम आज भी मंगल ग्रह पर बस्तियां बसाने की सोच रहे हैं। घर-बार का ठिकाना नहीं और अंतरिक्ष की सैर को निकल जाना चाहते हैं। अपनी खेती-बाड़ी में बाबा आदम के तरीकों से छुटकारा नहीं पा सके और इसरो-इसरो चिल्लाकर दुनियाभर को छका देना चाहते हैं और सपनों का भी कोई अंत होता है।
कभी हमें कहा जाता कि आप में से हर सड़क छाप आदमी का एक बैंक खाता होगा। इसमें सीधी सरकारी खैरात ही नहीं आएगी, बरसों से जो कालाधन करोड़ों और अरबों की तादाद में विदेशी बैंकों के गुप्त खानों में छिपाया जाता रहा, उसे वापस लाया जाएगा। खुल जा सिम-सिम के अंदाज में जब आप एक नई सुबह अपने बैंक खाते की पासबुक खोलेंगे, तो उसमें आपको लाखों रुपए जमा नजर आएंगे। बरस दर बरस बीत गए। कालाधन पहलू बदल कर एक देश के गुप्त विदेश खातों से छोटे, देशों के बैंकों के खाते में जा छिपा। टैक्स स्वर्ग के नाम से इन बैंकों के कुकरमुत्ते इन देशों में उग आए और अपने देश में तो एक छदाम भी वापस नहीं आ सका।
गरीब का खाता उसी तरह गरीब और वंचित रहा। जब खाता खाली और मृत तो उस पर घोषित जीवित बीमे का लालीपॉप उसे कैसे मिल जाता? न लालीपॉप मिला और न लैमनचूस। हालत यह कि गरीब के खाते बंद होने की नौबत आ गयी, जब धन ही नहीं तो कैसा जनधन। कभी जिन्हें खोलकर गरीबों के लिए बैंक क्रांति का भरोसा दिया गया था, वह भरोसा तो एक भ्रांति बन गया, और जनधन खाते एक भूली-बिसरी निष्क्रिय घोषणा। बिल्कुल उसी तरह जैसे यह समझ कि जुमले केवल लुभावने पारदर्शी सपनों का जाल रचते हैं। करोड़ों की संख्या में नई नौकरियां बांट देने का जुमला जो स्वचालित मशीनों की आमद के सामने दम तोड़ता हुआ नजर आया है।
उदारता से सस्ते कर्ज बांट देने का जुमला जो मुद्रा बैंक कहलाया था। अरे, वह तो आपको इतना भी न दे सका कि आप उसके साथ अपने लिए पकौड़े तलकर बेचने का कोई काम ही शुरू कर लेते। फिर भैया कितने लोग पकौड़े तलेंगे? गरीब के लिए तो रोटी पर प्याज रखकर खाना भी दुर्लभ हो गया और आप उसे पकौड़े तल कर बेचने और खाने का संदेश दे रहे हैं। क्या यह बेहतर न होता कि इस देश की सदियों पुरानी महानता का ढोल-नगाड़ा पीटने वाले, इस देश के दस्तकारों को नया जीवनदान दे देते। हमने तो कभी सुना था कि ढाका में ऐसे-ऐसे मलमल बनाने वाले बुनकर थे, जो मलमल के थान को एक डिबिया में बंद कर देते। अब तो न वे डिबियां रहीं और न ऐसे बुनकर।
आइए, उन कारीगरों की तलाश करें जिन्होंने कभी इस शाहजहां के लिए ताजमहल रच दिया था और बादशाह ने उनके अंगूठे कटवा दिए। उसकी रौ पर चले अंग्रेज हम पर शासन करने आए। तो अपनी लंकशायर और बकिंघम की मिलें चलाने के लिए हमारे हाथ काट गए। अब इन बड़ी-बड़ी स्वचालित मशीनों को चलाने वाले इन धनपतियों ने सरकारी छतरी की बदौलत अपनी बहुराष्ट्रीय इकाइयां बना लीं हैं और कल का दुनिया भर को चौंका देने वाला दस्तकार अपनी कला-कौशल के हाथ कटवा कर पकौड़े बनाने के लिए बेसन छानता नजर आया।
पकौड़े न बना पाओ, तो नाकों, चौराहों पर भिखारी की वर्दी पहन कर भीख मांगने का व्यवसाय अपना लो। सुना है, अब तो यह कुटीर उद्योग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विकसित हो गया है। बिल्कुल उसी तरह जैसे मादक द्रव्यों की तस्करी और नकली नोटों के प्रचलन का धंधा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विकसित हो गया है। हम ‘गरीबी भगाने, जीवन जगाने’ का संदेश तो विश्व क्या अपने देश को भी न दे सके, हां आतंकवाद ने ‘वसुधैव कुटम्बकम’ का मूलमंत्र हमें अवश्य उपहार में दे दिया। अब इसके तार विदेशों में हिलते हैं और दरो-दीवार हमारे देश में कांपने लगते हैं। लेकिन यह भी तो एक कुटीर उद्योग है। पढ़ा-लिखा नौजवान अपने शिक्षा के बोझ से आक्रांत हो, तो क्यों न एके सैंतालीस पकड़ कर फेसबुक पर तस्वीर डाल दे। यह भी एक वारे-न्यारे करने वाला धंधा बन जाएगा। बंधु।
