अमरेंद्र मिश्र
वही खत मिला मुझे एक मुद्दत बाद
जो लिखा न गया
लिफाफे पर नाम लिखा
जो था ही नहीं कभी मेरा
खोला तो मिला कोरा कागज
बस एक आदम गंध तैर गई
लगा यह तुम्हारे आने की दस्तक-सी
याद है, कभी हमने बदल लिए थे अपने नाम
और ऐसी ही भीनी खुशबू महसूसा था एकमेक होते
वह सब मिला तुम्हारे इस बंद लिफाफे में
सहेज कर रखा जिसे तुम्हारे आने तक…
वक्त के किनारे
शायद याद हो तुम्हें
गुनगुनी धूप वाला वह मुफलिस मौसम
मिले जब पहली बार
यहीं इसी जगह
बरसों बाद मिले फिर
न मिला वह मुफलिस
दिखती आंखें दूर तलक कि आए वह कहीं से
और पुकारे हमें।
तुम्हारे आने का न था कोई इंतजार
न कोई वादा
बस था एक मुकम्मल वक्त, जो
चल कर आया था, हमारे बीच।
किया कुछ नहीं बस बैठे रहे यों ही
छोड़ दिए गिले-शिकवे
जोड़ दिए
वक्त के जमा खाते में।
फोटो में लड़की
शाम यहीं खेल रही थी लड़की
हुआ था अपहरण इसी गली से
रोशनी गुल थी महीनों से…
यहीं खेल रही थी लड़की
जहां रोज खेलती थी बच्चों संग
लड़ती थी, झगड़ती थी, रूठती थी, मनती मनाती थी।
सब जानते थे उसे…
हुई थी शिनाख्त उसके खोने की
सवाल पूछे गए थे उसके कहीं, होने के;
कोई कुछ न बोला
अखबार में लड़की की फोटो छपी है।
अब लोग शिनाख्त करने लगे हैं
हां, यही है गुमशुदा लड़की! ०

