दिविक रमेश
नहीं रहता जो
नहीं रहता जो
आता है वह भी हममें
सपने के सच-सा।
अभिभूत भी करता है
और विचलित भी
सपने के टूटने-सा।
देर तक हम रहते हैं उत्सुक
बांधे इच्छाओं की गठरी
कि आ जुड़े टूटा हुआ सपना फिर एक बार।
फिर एक बार
अपने पूर्वजों को कर-कर याद
हम कितना प्यार कर लेते हैं खुद को
शायद अथाह।
वह भी नहीं रहा अपना
धक्का तब लगता है, जब लगता है
खुद का था जो निखालिश
वह भी नहीं रहा अपना।
नए जमाने से लेकर कहूं उदाहरण तो
जैसे अपना ही दांत-दांत में पकड़ जोड़ा
रुपैया।
बहुत पुराना हो गया वह उदाहरण
जो वास करता है बिदेसिया में।
आशंका
कहानियां तो बहुत सुनी हैं
रूप धर कर आते रहे भले-भले जिनमें
कितनी ही चुड़ैलें, राक्षस कितने ही।
पोल खुलते, सुनते
लूटी है कितनी ही राहत की सांसें भी।
और उछले-कूदे भी हैं हम
उन पर चलते विजय के हंटर, सुन कर।
शक होता है (नहीं जानता क्यों संप्रति)
कहीं आज अच्छे-भले दिनों की भोली-सी मूरत धर
एक क्रूर समय तो
नहीं दे रहा है दस्तक
हमारे दरवाजे पर
प्रहार-सी। ०

