कहा तो घास खोद रहा हूं। अंग्रेजी में इसे ही रिसर्च कहते हैं।’ यह वाक्य श्रीलाल शुक्ल द्वारा लिखे गए उपन्यास राग दरबारी के हैं। इस उपन्यास के लिए शुक्ल को साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। कहते हैं पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं। उन्हीं होनहारों में से एक थे श्रीलाल शुक्ल। मात्र 13 बरस की उम्र में उन्होंने संस्कृत और हिंदी में कविता व कहानियों का लेखन शुरू कर दिया था। बाद में उन्होंने हिंदी साहित्य को कालजयी रचनाओं से परिपूर्ण किया। श्रीलाल शुक्ल का जन्म लखनऊ के अतरौली गांव में हुआ था। आज भी नई पीढ़ी के सबसे चहेते वरिष्ठ साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल हैं। उन्हें 2008 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।

प्रारंभिक जीवन
श्रीलाल शुक्ल का प्रारंभिक जीवन संघर्षों में बीता लेकिन उनकी गरीबी, उनका विलाप कभी उनके लेखन में नहीं झलका। उनका व्यक्तित्व बहुत सरल और विनोदी था। वे जिससे भी मिलते थे उससे मुस्कुरा कर बात करते थे। शुक्ल को नई पीढ़ी को समझना पसंद था। आज यही वजह है कि नई पीढ़ी हो या पुरानी सभी को शुक्ल द्वारा लिखा गया साहित्य खूब रास आता है। विभिन्न विश्वविद्यालयों में उनकी किताब राग दरबारी को सिलेबस का हिस्सा भी बनाया गया है।

शिक्षा और पाठ्यक्रम
श्रीलाल शुक्ल बचपन से ही मेधावी छात्र थे। उन्हें परिवार में भी पढ़ाई-लिखाई का माहौल मिला। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई की। इसके बाद 1948 में लखनऊ विश्वविद्यालय से एमए किया और कानून की पढ़ाई के लिए दाखिला लिया। इसी बीच श्रीलाल शुक्ल का विवाह गिरिजा से हो गया और उनकी कानून की पढ़ाई अधूरी रह गई। 1949 में उन्होंने उत्तर प्रदेश में सिविल सेवा की परीक्षा दी और उसमें सफल होने पर राज्य सिविल सेवा की नौकरी की। वे 1983 में भारतीय प्रशासनिक सेवा से निवृत्त हुए।

विधिवत लेखन
श्रीलाल शुक्ल ने विधिवत लेखन की शुरुआत 1954 से की। इससे पहले भी उन्होंने कुछ लेख लिखे थे। प्रशासनिक सेवा से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने अपना पूरा समय लेखन में लगाया। शुक्ल के पिता संस्कृत, ऊर्दू और फारसी के विद्वान थे। यही वजह है कि शुक्ल को भी इन भाषाओं के अलावा हिंदी और अंग्रेजी का भी ज्ञान था। उनका पहला उपन्यास ‘सूनी घाटी का सूरज’ और पहला व्यंग्य ‘अंगद के पांव’ है। उन्होंने अपना लेखन केवल राजनीति पर ही सीमित नहीं रखा बल्कि वे ग्रामीण परिवेश की समस्याएं, शिक्षा की दुर्दशा और समसामयिक परिस्थितियों पर व्यंग्य भी लिखे। उन्होंने कई कहानी, उपन्यास, व्यंग्य, आलोचना समेत हिंदी साहित्य को कुल 25 रचनाएं दीं।

भाषा शैली
शुक्ल के पास भाषा का अद्भुत ज्ञान था। उनकी लेखन शैली व्यंग्यात्मक थी। उन्होंने जब राग दरबारी लिखा तो उसमें मुहावरों, शिल्प और देशज भाषा के शब्दों आदि का प्रयोग बखूबी किया। राग दरबारी के अलावा शुक्ल ने ‘विश्रामपुर का संत’, ‘सूनी घाटी का सूरज’ और ‘यह मेरा घर नहीं’ जैसी कृतियां भी लिखीं। जो साहित्यिक कसौटियों पर खरी साबित उतरीं।

‘राग दरबारी’ से नहीं थे खुश
श्रीलाल शुक्ल का सबसे प्रतिष्ठित उपन्यास राग दरबारी आजादी के बाद के भारत के ग्रामीण जीवन के मूल्यों को परत दर परत उघाड़ता है। यह उपन्यास पाठकों को इतना पसंद आया कि इस पर दूरदर्शन धारावाहिक का भी निर्माण हुआ। एक तरफ जहां राग दरबारी ने शुक्ल को प्रसिद्धि दिलाई तो दूसरी तरफ शुक्ल को यह मलाल रहा कि इस उपन्यास की वजह से उनकी बाकी रचनाएं दब गर्इं।

निधन
श्रीलाल शुक्ल का निधन फेफड़ों में संक्रमण के कारण हुआ था।