कहते हैं कि जब तक जिद न हो तब तक सपने पूरे नहीं होते। ऐसी ही जिद थी धुंडीराज गोविंद फालके यानी दादा साहब फालके में। वे पहले ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने भारत में सिनेमा की शुरुआत की। फिल्मों में आधुनिक तकनीक, पारंपरिक फिल्मों के तरीके से अलग हट कर कुछ नया करने और रचने की काबिलियत थी उनमें। फिल्मों के प्रति अपनी कार्यकुशलता सिद्ध करने के लिए उन्होंने एक बार मटर के पौधे को एक बर्तन में डाला और दिन-प्रतिदिन होते उसके विकास को कैमरे में कैद किया।
प्रारंभिक जीवन: ’दादा साहब के पास पैसा नहीं था, पर सपने थे। वे अक्सर सपनों में खो जाया करते थे। वे सोचते थे कि विदेशों में जैसी फिल्में बनती हैं, क्या वैसी फिल्में भारत में नहीं बन सकतीं। इसी उधेड़-बुन में उन्होंने एक बार ईसा मसीह पर आधारित फिल्म देखी। उस फिल्म में उन्हें ईसा मसीह के स्थान पर कृष्ण, राम, गुरु रामदास, शिवाजी, संत तुकाराम आदि महान हस्तियां दिखाई दे रही थीं। इसके बाद उन्होंने महाभारत और रामायण के किरदारों को चलचित्र के पात्रों के रूप में देखना शुरू कर दिया। और उसी फिल्म से उन्हें सिनेमा बनाने की प्रेरणा मिली। ’फालके का जन्म महाराष्ट्र में हुआ। उनके पिता संस्कृत के विद्वान थे और मुंबई के एलफिंस्टन कॉलेज में पढ़ाते थे। फालके की शिक्षा मुंबई में ही हुई। 1885 में पंद्रह साल की उम्र में उन्होंने मुंबई के जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स में दाखिला लिया, जो उस समय कला-शिक्षा का केंद्र था। वहां से चित्रकला सीखने के बाद फालके ने 1890 में कला भवन बड़ौदा में दाखिला लिया, जहां से उन्होंने चित्रकला के साथ-साथ फोटोग्राफी और स्थापत्य कला का भी अध्ययन किया।
फिल्म कंपनी की शुरुआत: ’दादा साहब फालके ने ईसा मसीह पर फिल्म देखने के बाद फिल्म बनाने की सोची और उसके लिए एक पटकथा ढूंढ़ने लगे। इसी के फलस्वरूप उन्होंने मुंबई के पांच व्यापारियों को लेकर हिंदुस्तान फिल्म कंपनी बनाई। उसी कंपनी के बैनर तले उन्होंने 1913 में पहली मूक फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ बनाई। यह फिल्म बनाने के लिए उन्होंने सिनेमा से जुड़े सभी तकनीकी और व्यावहारिक पक्ष सीखे।
’उन्होंने 95 फिल्में और 26 लघु फिल्में बनार्इं। दादा साहब ने सिनेमा में कई नए प्रयोग किए। इन्हीं प्रयोगों में एक प्रयोग उन्होंने सन 1913 में किया, जब पहली बार एक अभिनेत्री को सिनेमा में उतारा। तब अभिनय का पेशा महिलाओं के लिए अच्छा नहीं माना जाता था। पुरुष ही महिलाओं की भूमिका निभाते थे।
तकनीकी ज्ञान: ’अभी तक मूक फिल्में बनार्इं जा रही थीं। दादा साहब फालके ने फिल्मों की तकनीक जानने के लिए विदेशों में जाकर ज्ञान लिया। इस वजह से उन्हें आर्थिक बोझ भी झेलना पड़ा। मूक फिल्मों से बोलती फिल्मों की ओर ले जाने का श्रेय भी दादा साहेब फालके को जाता है। उन्होंने भारत की पहली स्वदेशी फीचर फिल्म का निर्माण किया। उनके फिल्म क्षेत्र में अमूल्य योगदान के लिए ‘दादा साहेब फालके’ नामक पुरस्कार की घोषणा भी की गई।
प्रमुख फिल्में: ’राजा हरिश्चंद्र (1913), मोहिनी भस्मासुर (1913), सत्यवान सावित्री (1914), लंका दहन (1917), श्री कृष्णा जन्म (1918) और कालिया मर्दन (1919)।
निधन: ’दादा साहब फालके की अंतिम फिल्म ‘गंगावतारम’ के बाद उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा था और उन्होंने फिल्मों से अवकाश ले लिया। 16 फरवरी, 1944 को उन्होंने इस दुनिया से विदा ली।

