नाज़ खान
किसी भी समाज की शिक्षा-व्यवस्था उसकी रीढ़ होती है, क्योंकि इससे न सिर्फ छात्रों का भविष्य तय होता है, बल्कि देश के भावी होनहार भी तैयार होते हैं। मगर बीते कुछ समय में प्रश्नपत्र लीक जैसे मामले बार-बार सामने आने से उन छात्रों में एक बौखलाहट और डर जरूर पैदा हुआ है, जो अथक मेहनत करके परीक्षा में बैठते हैं। ऐसे में आज देश के सामने यह एक गंभीर चुनौती है कि वह शिक्षा-व्यवस्था में अंदर तक उतर आए जालसाजों को जड़ से उखाड़ फेंके। साथ ही दरकार व्यवस्था में कुछ बदलावों की भी है। राज्यों में लगातार होती आ रही इस तरह की घटनाओं से इतना तो समझना चाहिए कि व्यवस्था में कहीं न कहीं कोई बड़ी खामी जरूर है और मर्ज देख कर इलाज करने से ही इस तरह के मामलों पर लगाम लगाई जा सकती है।
हाल में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की दसवीं के गणित और बारहवीं के अर्थशास्त्र विषय की परीक्षाओं के परचे चोरी से बाहर निकाल लिए जाने की घटना ने उन छात्रों को निराश कर दिया और जब उनकी दुबारा परीक्षा कराने की बात उठी तो छात्रों में गहरी नाराजगी पैदा हो गई। इस संकट से गुजर रहे छात्रों के लिए दिक्कतें और भी हैं। एक तरफ छात्रों के अन्य प्रवेश परीक्षाओं में बैठने को लेकर परेशानी आ रही है, तो वहीं उनकी छुट्टियों की योजना पर भी पानी फिर गया है। नतीजा यह हुआ कि इससे आक्रोशित छात्र सड़कों पर उतर आए, देश में बवाल मच गया और दोबारा परीक्षा कराने का भरसक विरोध किया गया। छात्रों मे रोष देखकर सीबीएसई और शिक्षा मंत्रालय के अधिकारियों के बीच हुई बैठक में यह फैसला किया गया कि फिलहाल सीबीएसई गणित का पर्चा दोबारा नहीं कराया जाएगा। इससे पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने भी सीबीएसई को गणित की फिर से परीक्षा कराने के उसके फैसले को लटकाने को लेकर फटकार लगाई थी। हालांकि इसमें भी प्रदर्शन कर रहे छात्रों और उनके अभिभावकों का कहना है कि या तो सभी विषयों की परीक्षा फिर से हो या फिर किसी भी विषय की न हो।
पेपर लीक होने के बाद से हर तरफ से बदनामी झेल रहा सीबीएसई अब नए तरीके से परीक्षा करवाने का मन बना चुका है। उसकी तरफ से कई बदलाव किए जाने पर विचार किया जा रहा है। नई व्यवस्था के तहत सीबीएसई बोर्ड सीधा स्कूल को एक रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर या ई-मेल एड्रेस पर एक यूआरएल भेजेगा। इसको क्लिक करने से लॉगिन के लिए पासवर्ड मिलेगा और उसके पंद्रह मिनट के बाद पेपर को डाउनलोड करने के लिए दूसरा पासवर्ड मिलेगा। इसके बाद स्कूल से उसका प्रिंट आउट निकलवाएंगे। इसका मतलब यही हुआ कि सीबीएसई छापे हुए पर्चे नहीं भेजेगी, बल्कि प्रश्नपत्र बनाने की जिम्मेदारी अब स्कूल की होगी और वही अब इन्हें छपवाएगा। हालांकि इस व्यवस्था के लागू होने से पहले ही कई शंकाओं ने जन्म ले लिया है। देश में इंटरनेट की गति धीमी होने की वजह से घंटों पर्चा डाउनलोड नहीं होता। ऐसे में यह व्यवस्था कितनी कारगर होगी और कितनी देर टिकी रहेगी, समझा जा सकता है। इसलिए यह खामी न हो, इसके लिए स्कूलों को अच्छी इंटरनेट कनेक्टिविटी के साथ प्रिंटर का इंतजाम भी करना पड़ेगा। मगर इसके बाद बड़े पैमाने पर प्रश्नपत्र छापना भी स्कूलों के लिए टेढ़ी खीर होगा। दरअसल, अभी तक सीबीएसई के जरिए प्रश्नपत्रों का अंतिम सेट तैयार करके अपनी चुनिंदा पे्रस में छपवाया जाता रहा है। छपाई के बाद इन प्रश्नपत्रों को सील करके इसके क्षेत्रीय दफ्तर में भिजवा दिया जाता है। फिर क्षेत्रीय दफ्तर इन प्रश्नपत्रों को पास के बैंकों में भेजते हैं। बैंकों से स्कूल इन्हें ले जाते हैं।
आज सोशल मीडिया का दौर है। इसी के जरिए और अन्य तकनीकी उपकरणों को औजार बना कर जालसाज परीक्षा से पहले ही परचे निकालने में कामयाब होते रहे हैं। हालांकि अभी मामले की जांच चल रही है और ताजा मामले के कुछ आरोपी पुलिस की हिरासत में है, तो कुछ से पूछताछ की जा रही है। इनमें दस वाट्सऐप समूहों के संचालक भी शामिल हैं। पेपर लीक मोटी कमाई का जरिया है। इसमें पैसे वाले छात्रों को चुन कर उनसे संपर्क किया जाता है और सौदे के तहत उन्हें प्रश्नपत्र मुहैया कराए जाते हैं। इसमें जालसाज इंटरनेट को हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं। नकल के लिए परीक्षाओं में माइक्रो ब्लूटूथ, मोबाइल सिम, कैमरे वाले बटन और इयरफोन का इस्तेमाल किया जाता है। इसके सहारे छात्र सवालों को परीक्षा भवन से बाहर भेजते और इनके जवाब हासिल करते हैं। या फिर इंटरनेट के जरिए प्रश्नपत्र कुछ ही देर में हजारों छात्रों तक पहुंचा दिए जाते हैं और सोशल साइट के जरिए इन्हें आसानी से फैलाया जाता है।
परीक्षाओं में इस धांधली को अंजाम देने के लिए कई तरीके अपनाए जाते रहे हैं। इसी में नकली उम्मीदवारों के सहारे भी परीक्षा को अंजाम दिया जाता है। दरअसल, बेरोजगारी झेल रहे और पढ़ाई में अच्छे छात्रों को परीक्षा में असल उम्मीदवार की जगह बैठा दिया जाता है। वहीं कुछ रसूखदार लोग भी परीक्षकों और जांचकर्ताओं को प्रभावित कर अपने बच्चों के लिए बेहतर अंक हासिल करने का तरीका अपनाने से नहीं चूकते। चूंकि आज सोशल मीडिया का जमाना है और अच्छे अंकों की चाह सभी की होती है। ऐसे में बिना मेहनत किए अच्छे अंक पाना छात्रों को आसान तरीका लगने लगा है। इसलिए वे परचा खरीदने का विकल्प चुनने से नहीं चूकते।
अभी तक पकड़ में आए कई मामलों से साबित हुआ है कि इसमें छात्रों के अलावा कोचिंग सेंटरों सहित कुछ कर्मचारी, प्रोफेसर आदि तक शामिल होते हैं। यही वजह है कि कई बार इस तरह की परीक्षाएं रद्द की गर्इं। इसी तरह राजस्थान प्रशासनिक सेवा आयोग ने मामले का खुलासा होने के बाद आरपीसीएस प्री परीक्षा-2013 का नतीजा रद्द कर दोबारा कराने को कहा था। इसमें छात्रों समेत कई सरकारी कर्मचारियों की भूमिका रही थी। स्कूल, बोर्ड, यूनिवर्सिटी या प्रतियोगिता परीक्षाओं की बात क्यों न हो, हर जगह पेपर लीक रैकेट के होने की आशंका पनपती रही है। जहां उत्तर प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र, राजस्थान जैसे राज्यों से पेपर लीक जैसे मामले अधिक सामने आए हैं। वहीं बिहार नकल कराने के मामले में कुख्यात है।
देश भर में करीब साठ हजार निजी स्कूलों का नेतृत्व करने का दावा करने वाले ‘नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल एलायंस’ के अध्यक्ष कुलभूषण शर्मा ने भी साफ तौर पर कहा है कि ‘सीबीएसई का पेपर लीक मामला बच्चों के लिए तनाव का कारण बना है। सरकार परीक्षाओं को उचित तरीके से कराने की जिम्मेदारी क्यों नहीं ले रही।’ लगातार विपक्ष का हमला झेल रही सरकार पर भी जहां सियासी हमले तेज हो गए हैं, वहीं कुछ संगठन बोर्ड परीक्षाओं को उचित तरीके से न करा पाने के एवज में केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावडेकर के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं।’
पेपर लीक में प्रश्नपत्र के एक ही सेट को सुरक्षा व्यवस्था में खामी का जिम्मेदार माना जा रहा है। पेपर लीक होने के बाद से ही सीबीएसई आलोचनाओं का शिकार है। दरअसल, इस वर्ष से ही परीक्षा के लिए एक प्रश्नपत्र के एक ही सेट को व्यवस्था की सबसे बड़ी खामी माना जा रहा है। यह व्यवस्था इसी वर्ष लागू हुई। इससे पहले दसवीं और बारहवीं की परीक्षा के लिए प्रश्नपत्रों के कई सेट तैयार किए जाते थे। तीनों ही सेटों में अलग-अलग सवाल होते थे। अब एक बार फिर सीबीएसई की तरफ से तीन पेपर सेट वाली व्यवस्था को लागू किए जाने पर विचार किया जा रहा है। पुरानी व्यवस्था के तहत प्रश्नपत्रों के जो तीन सेट तैयार किए जाते थे, उनमें सभी प्रश्नपत्रों में अलग सवाल होते थे। इस वजह से प्रश्नपत्र लीक करना मुश्किल था और लीक होने पर फौरन इसे बदला जा सकता था। वर्तमान व्यवस्था में भी प्रश्नपत्रों के तीन ही सेट तैयार होते हैं, लेकिन इन सभी में प्रश्न एक जैसे ही होते हैं।
दरअसल, पेपर लीक मामला नया नहीं है, लेकिन शिक्षा-व्यवस्था में बार-बार होती इस तरह की चूक से कई सवाल जरूर खड़े होते हैं। एक तरफ शिक्षा जैसे क्षेत्र में पनपता अपराध है तो दूसरी तरफ सवाल है छात्रों के भविष्य का। ऐसे में उन विश्वविद्यालयों का तरीका अपनाया जा सकता है, जहां मुश्किल से पेपर लीक जैसे मामले सामने आते हैं। इसमें परीक्षा से कुछ सप्ताह पहले कई लोगों से प्रश्नपत्र तैयार कराए जाते हैं। परीक्षा में किसके सेट को लेना है, यह परीक्षा से कुछ देर पहले ही तय किया जाता है। ऐसे में प्रश्नपत्र लीक होने की आशंका कम रहती है, क्योंकि खुद इन सेटों को तैयार करने वालों को पता नहीं होता कि परीक्षा में किसका बनाया प्रश्नपत्र लिया गया है। इसके उलट सीबीएसई में प्रश्नपत्र कई हाथों से होकर गुजरता है।
हर बार पुख्ता इंतजाम और दुरुस्त व्यवस्था का हवाला देकर परीक्षाएं आयोजित कराई जाती हैं, फिर यह दावा अक्सर फेल क्यों हो जाता है? फिलहाल सीबीएसई की परीक्षा में हुए पेपर लीक का खेल सामने है, लेकिन इस बात की जिम्मेदारी कौन लेगा कि आगे से ऐसा कोई खेल सामने नहीं आएगा। यह महज इस बार परीक्षा में हुई धांधली के मामले तक सीमित नहीं है। इससे पहले भी देश के कई हिस्सों से इस तरह के मामले सामने आते रहे हैं।
नकल और पेपर लीक को अंजाम देने वाले जालसाज भारतीय शिक्षा-व्यवस्था में किसी दीमक की तरह लगे हुए हैं। जहां लाखों छात्र अथक मेहनत से अपना लक्ष्य हासिल करते हैं, वहीं कुछ छात्र अन्य तरीकों से भी परीक्षा देने के आदी हैं। इनमें एक है रटंत विद्या और दूसरा नकल करके पास होना यानी पेपर खरीदना आदि। यह इस बात का साफ तौर पर इशारा है कि भारतीय शिक्षा-व्यवस्था में पढ़ने का उद्देश्य महज अच्छे अंकों से पास होना होता जा रहा है। इसकी वजह भी यही है कि इसके लिए एक तो परिवार का बच्चों पर दबाव रहता है कि बच्चे परीक्षाओं में अच्छे से अच्छे अंक लाएं। वजह साफ है, आगे चल कर यही अंक अन्य परीक्षाओं में दाखिला दिलाने और नौकरी में मददगार साबित होते हैं। वहीं व्यवस्था में कुछ खामियां तो हैं ही।
रात-रात भर जाग कर परीक्षा की तैयारी करने वाले वे छात्र भी इस तरह के मामलों के बाद गेहूं के साथ पिसने वाले घुन की तरह हो जाते हैं। बेवजह उन्हें भी परीक्षा दुबारा देनी पड़ती है। वहीं इस मुद्दे पर भी खूब सियासत हो रही है, जबकि यह मुद्दा सियासत का नहीं, शिक्षा-व्यवस्था में आ रही खामी को दूर कर इसे दुरुस्त करने का है, क्योंकि इस तरह के बार-बार हो रहे मामलों से भारतीय शिक्षा प्रणाली की जो छवि छात्रों के सामने बनती है, वह भविष्य में छात्रों में देश की व्यवस्था के लिए विश्वास पैदा कर पाएगी, इसकी उम्मीद कम ही है।
कब-कब हुए हैं पेपर लीक
मार्च, 2011, ऑल इंडिया इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा का पर्चा लीक।
मई, 2013, रेलवे परीक्षा का पर्चा लीक।
नवंबर, 2014 में एसएससी की प्रतियोगी क्लर्क ग्रेड की परीक्षा का पर्चा लीक हुआ। इसका रैकेट दिल्ली व हरियाणा तक फैला हुआ था।
जून, 2014, सीपीएमटी का पर्चा लीक होने के बाद परीक्षा रद्द।
2016, उत्तर प्रदेश में राज्य अधीनस्थ सेवा चयन आयोग की परीक्षा का पेपर लीक हुआ। इसमें भी सोशल साइट के जरिए आंसर-की जारी कर दी गई।
नवंबर, 2016, आरओ/ एआरओ का पेपर परीक्षा से पहले ही वाट्सऐप पर लीक हो गया।
पेपर लीक मामले में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी सीके अनिल का, बीएसएससी के अध्यक्ष और वरिष्ठ आईएएस सुधीर कुमार का नाम आ चुका है।
2017, उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती एवं प्रोन्नति बोर्ड की वर्ष 2017 को होने वाली आॅनलाइन दरोगा भर्ती परीक्षा का पर्चा लीक हुआ।
2017, सेना भर्ती परीक्षा का पर्चा लीक होने की वजह से सैन्य भर्ती बोर्ड को अपने कई केंद्रों पर परीक्षा रद्द करनी पड़ी थी।
अप्रैल, 2017, नेशनल एलिजिबिलिटी कम इंट्रेस टेस्ट (नीट) का पर्चा लीक।
2017 में ही महाराष्ट्र में लगातार तीसरी बार 12वीं की बुक कीपिंग ऐंड अकाउंटेंसी का प्रश्नपत्र लीक हुआ।
अभी साल की शुरुआत में ही बिहार में इंटर की बायोलॉजी की परीक्षा का पर्चा लीक हो गया था। उसकी जांच चल रही है।

