दिल्ली से देहरादून जा रही वह ट्रेन महिलाओं की खिलखिलाहट से कुछ ज्यादा ही गुलजार थी। लगभग दो डिब्बों में महिलाएं ही महिलाएं नजर आ रही थीं। उनका गाना गुनगुनाना, हास परिहास बरबस ही ध्यान खींच ले रहा था। उन डिब्बों में इक्का-दुक्का पुरुष चेहरे भी नजर आ रहे थे। ज्यादातर सवारियों की नजर महिलाओं की गतिविधियों पर थी। पास बैठी एक कम उम्र महिला ने फुसफुसाते हुए अपने पति से कुछ कहा और फिक्क से हंस दी। पति भी तिरछी मुस्कान देते हुए पत्नी से बोला, ‘कोई महिला संगठन है, मैंने पूछा था। देहरादून में कार्यशाला में जा रही हैं सब। घरतोड़ू महिलाएं हैं, कोई काम-धाम नहीं है। बच्चा सास के सिर पर धर कर मौज मस्ती के जा रही हैं।’ पास ही बैठी एक महिला, जो कुछ अधेड़ उम्र की थी उस पुरुष की हां में हां मिलाते हुए बोली- ‘अरे इनके घर कहां होते हैं। पूछ कर देखो! शर्म लिहाज तो उनकी आंखों में होता ही नहीं है। मेरी बहू से भी एक ऐसी औरत टकराई थी, उससे दोस्ती होते ही बहू के रंग ढंग बदलने लगे थे। मैंने तो खबरदार कर दिया कि दोस्ती बढ़ाई तो मुझसे बुरा कोई न होगा।’ उस कम उम्र महिला की आंखें कौतूहल से और फैल गर्इं, जिसमें जिज्ञासा भी थी, इच्छा भी और बंधन की कसमसाहट भी।’’ यह एक नजारा है, पिछले दशहरे के वक्त, जब हम तमाम लोग एक नारीवादी संगठन के बैनर तले हिस्से लेने देहरादून जा रहे थे। यह वार्तालाप बताता है कि नारीवादी कार्यकर्ताओं को लेकर हमारे समाज में किस तरह की सोच कायम है। कुछ उन्हें ‘घर तोड़ू’ या बागी महिलाओं के रूप देखते हैं और अपनी पत्नी, बहू-बेटियों को उनसे दूर रहने की हिदायतें देते हैं। ऐसे लोगों को महिला अधिकार जैसे सवाल, परिवार व समाज विरोधी लगते हैं। उनकी सोच कहती है कि परिवार या समाज के ढांचे में स्त्री का एक निश्चित स्थान होता है और अगर वे अपने स्थान से थोड़ा भी हिलेंगी तो समाज और परिवार का ढांचा चरमरा जाएगा। कुछ लोगों के लिए नारीवाद का अर्थ है ऐसी महिलाएं, जो पुरुष की दुश्मन हैं। सवाल है कि अगर ये तथाकथित रूप से ‘घर तोड़ू’ हैं तो इनके अपने घर कैसे बचे रहते हैं। कहते हैं पहली क्रांति घर से होती है और पहला आंदोलन खुद से। क्रांति नाजायज बंदिशों से, आंदोलन अपने भीतर के भयाक्रांत माहौल से। लेकिन क्या ये नारीवादी महिलाएं क्रांति की शुरुआत सचमुच घर से करती हैं? घर की चारदिवारी के अंदर की गैरबराबरी का विरोध क्या वे उसी स्तर पर करती हैं जितनी उग्रता से घर के बाहर करती हैं? या ‘पर्सनल इज पॉलीटिकल’ जैसे सिद्धांतों को दरकिनार कर घर और बाहर, दो अलग-अलग जिंदगी व विचारधारा जीती हैं?
कॉलेज में शिक्षक दीपक रस्तोगी बताते हैं, ‘ मेरी कई नारीवादी मित्र हैं, महिला अधिकार के मुद्दों पर अक्सर बहस करती हैं, लेकिन कई बार मैंने उन्हें देखा है कि जब वे स्वयं अपने पार्टनर के साथ होती हैं तो उनका रुख कुछ अलग होता है। एक अच्छी समर्पित पत्नी की तरह व्यवहार करती हैं। उनकी अपनी पहचान, व्यक्तित्व पता नहीं कहां चला जाता है। अपने पुरुष दोस्तों से बात करेंगी तो पति से छिप कर। मुझे लगता है कि इनमें और दूसरी महिलाओं में कोई विशेष अंतर नहीं हैं। फिर उनकी अधिकारों की बातें, आजादी की बातें खोखली लगने लगती हंै।’ स्त्रीमुक्ति आंदोलन जुड़ी अंजलि सिन्हा की सोच इससे अलग है। कहती हैं, ‘हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारे ेसाथी या पति या परिवार के दूसरे सदस्य उसी समाज से आए हैं, जहां से बाकी लोग हैं। उनमें भी पितृसत्ता के वहीं तत्त्व हैं जो समाज में है। बल्कि हम स्त्रियों के अंदर भी पितृसत्ता अलग-अलग घोषित-अघोषित रूपों में अपनी जड़ें जमाए हुए है। हम भी कई बार अवचेतन रूप से उसे पोषित करने लग जाते हैं। नारीवादी महिलाओं का गैरबराबरी के खिलाफ संघर्ष, घर और बाहर दोनों ही जगह, एक ही स्तर पर, बराबर रूप से चलता है। अगर हम यह सोचने लगे कि पहले घर को ही पितृसत्ता के चंगुल से पूरी तरह निकाल लें, फिर बाहर गैरबराबरी के खिलाफ लड़ेंगे तो हमारी पूरी शक्ति तो घर में ही लग जाएगी।
साहित्यकार गीताश्री का कहना था कि किसी भी विचारधारा के लिए दोहरे मानक नहीं होने चाहिए, कि बोले कुछ, सोचे कुछ ओर करे कुछ। इन तीनों में तालमेल बहुत जरूरी है। जागरूकता की शुरुआत घर से होती है। अगर पति और पत्नी अर्थोपाजन कर रहे हैं तो उनके रिश्ते में काफी हद तक बराबरी आ जाती है। नारीवादी सामाजिक कार्यकर्ता रेहाना अदीब के लिए निजी रिश्ते में गैरबराबरी के खिलाफ संघर्ष का सफर इतना आसान नहीं रहा है। उन्होंने कहा, ‘घर में जब हम बराबरी के हक को पाने की बात करते हैं या उस बराबरी को ढ़ूंढ़ने की कोशिश करते हैं तो वह हमें मिलता नहीं है और जब मिलता नहीं है तो चुप भी रहना हमारे लिए बड़ा मुश्किल होता है। उस अधिकार को पाने के लिए हम औरों को तो कहते हैं कि आप लड़ें और खुद ही जब अपने अधिकार दब रहे हैं तो हम खामोश रहें। ऐसे में मुझे लगता है कि नहीं मुझे यहां बोलना होगा या विरोध करना होगा, घुटन सी महसूस होती है और बोलते हैं तो कहीं न कहीं परिवार में टूटन पैदा होती है। हम नारीवादी औरतों ने घर को, समाज जिसे घर कहता है, उस घर को खो दिया है। हमारे पास घर है नहीं, जबरदस्ती से घुसे हुए हैं इन घरों में क्योंकि यहां हमने अपने पेट से बच्चे पैदा कर रखे हैं, हमने उनके जीवन के लिए अपनी आहूति दे रखी है, पर हम झुकते तो हैं नहीं। हमने बोल रखा है कि तुम्हें मेरी ये बात पसंद नहीं है तो बोलते रहो हमारी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। फिर भी मैं कहूंगी बहुत बदलाव आया है, शायद हमारी दूसरी पीढ़ी तक चीजें ज्यादा ठीक हो जाएं। कुछ पीढ़िया तो लगेंगी।’
अ गर हम ऊपर के कुछ उदाहरणों को नारीवादी विचारधारा की रोशनी में परखें तो कई चीजें साफ होने लगती हैं। किसी विचारधारा को जीना इतना आसान नहीं होता। एक सीधा सा तर्क है कि किसी को थाल में रख कर सुख सुविधाएं और सहूलियतें दी जाएं और फिर हम उससे उम्मीद करें की वह हमारे अधिकारों के बारे में सोचे और उसे छोड़ने को तैयार हो जाए तो यह कठिन है। निश्चित है कि वह पहले अपने फायदे के बारे में सोचेगा। इसी तरह पितृसत्ता ने पुरुषों को सामाजिक तौर पर महिलाओं की अपेक्षा कुछ विशेष सहूलियतें और सुविधाएं दी हैं। महिलाओं को अपने हिस्से के अधिकार को पाने के लिए उससे वैचारिक, भावनात्मक और जरूरत पड़ने पर कानूनी तौर पर संघर्ष करना पड़ेगा। नारीवाद की अलग-अलग धाराएं भले ही व्यवस्था के अलग-अलग पहलुओं पर ध्यान देती हों पर समग्रता में यह उस पूरे तंत्र की ही आलोचना है जो पुरुषों की तुलना में स्त्रियों को दोयम दर्जा देती है। नारीवाद पुरुष का विरोधी नहीं है यह समझना जरूरी है क्योंकि ऐसा करते ही लैंगिक पहचान को ही हम प्राकृतिक व प्रधान मानने लग जाएंगे जो की स्वयं पितृसत्तात्मक समझ है। नारीवाद प्राकृतिक अंतर का नहीं सामाजिक गैरबराबरी का विरोधी है। धर्म प्रधान भारतीय संस्कृति में चाहे मनुस्मृति की बात हो या किसी दूसरे धर्मग्रंथ की, परिवार संबंधी सभी अधिकार पुरुष को दिए गए हैं। धर्म वह क्षेत्र है जिस पर तर्क स्वीकार्य नहीं है, ऐसे में स्वाभाविक है कि उसे परखे बिना सदियों से आत्मसात किया जाता रहा है। स्त्री पुरुष के रिश्ते में घटित होने वाले हर एक कार्य या विचार की चीरफाड़ लैंगिक कैंची से होगी तो रिश्ते कहीं टिक ही नहीं पाएंगे, क्योंकि सबमें पितृसत्ता किसी न किसी रूप में मौजूद है।
पितृसत्ता की जड़ें इतनी गहरी और सूक्ष्म हैं कि एक-एक को रेखांकित करना और फिर उन पर प्रहार करना, एक लंबी प्रक्रिया है। ऐसी सामाजिक गढ़न के साथ कैसे ये नारीवादी महिलाएं बराबरी के लिए संघर्ष करती हैं? वरिष्ठ नारीवादी कार्यकर्ता जया श्रीवास्तव कहती हैं, ‘मैंने आपसी रिश्तों को कभी इस आधार पर नहीं देखा कि ये काम मैं क्यों करूं या ये काम मुझे क्यों दिया जा रहा है। मुझे अपने बच्चे के लिए कभी कुछ पकाने की इच्छा है या कभी कोई अच्छी सी डिश जो पति को पसंद है बना दिया तो, तो वह रिश्ते का हिस्सा है। स्त्री पुरुष दोनों ही रिश्ते को चलाने के लिए कुछ समझौते करते हैं, एक दूसरे को खुश रखने की कोशिश करते हैं। नारीवादी होने का यह अर्थ नहीं है कि हम अपने अधिकारों की बात तो खूब करे लेकिन जिम्मेदारी को उठाने से पीछे हट जाएं। केवल शुष्क विचारधारा से काम नहीं चलता है।
घर ‘प्यार’ की धुरी पर टिका होता है। जिंदगी के कई रंग होते हैं सब कुछ सफेद-स्याह नहीं होता है। पत्रकार-सामाजिक कार्यकर्ता निवेदिता झा का भी यही मानना है कि पितृसत्ता वाली मानसिकता कोई एक दिन या एक साल की बनाई हुई नहीं है, उसे बदलने में वक्त लगेगा। अगर हम चाहें की सारी बराबरी एक ही दिन में आ जाए तो यह घर तोड़ने वाली बात होगी। धीरे-धीरे सीढ़ी चढना है। मैंने भी अपने जीवन में इसी तरह गैरबराबरी के खिलाफ संघर्ष किया है। शादी के बाद पति के साथ के संबंध में मेरे लिए ये संघर्ष दूसरी महिलाओं की तुलना में इसलिए ज्यादा आसान रहा क्योंकि मैं जानती थी कि मुझे किस तरह की जिंदगी चाहिए। मैंने अपने जीवन को अपनी शर्तों पर जीने की कोशिश की है। मैंने अपनी पसंद की शादी की। विरोध बहुत हुआ, लेकिन मैं खुश हूं कि मैने अपने लिए अपना जीवन सोचा, और उसे हासिल किया।
स्त्री अधिकार और विचार
प्रख्यात नारीवादी विचारक जॉन स्टुअर्ट मिल ने अपनी पुस्तक ‘ दि सब्जेक्शन आॅफ वूमेन’ में स्त्रियों के कार्यों, मनोभावों और क्षमताओं की श्रमसाध्य व्याख्या की है, वहीं परंपरागत रूढ़िवादी सोच के विरुद्ध तर्कपूर्ण तथ्य प्रस्तुत किए हैं। सिमोन द बोउवार की तरह उनका भी मानना था कि एक स्त्री को पुरुष के विरोधीगुणों से संपन्न किया जाता है। उसे आत्मसम्मान की जगह आत्मसमर्पण की शिक्षा दी जाती है, क्योंकि स्त्री की शारीरिक दासता के साथ-साथ पुरुष उसे मानसिक दास भी बनाना चाहता है। मिल प्रश्न करते हैं कि अगर स्त्री वर्ग को पुरुषों की भांति स्वतंत्रता होगी तो क्या मानव समाज एक बेहतर स्थिति में नहीं होगा? नारीवाद इसी आजादी की बात करता है। लेकिन क्या एक स्त्री के लिए परिवार जैसी संस्था में पुरुष के समकक्ष स्तर की आजादी जैसा भाव संभव है?
नारीवादी लेखिका वर्जीनिया वुल्फ आर्थिक रूप से स्वनिर्भर रहीं। उनकी आंटी ने वसीयत में इतना पैसा छोड़ रखा था, जिससे उन्हें हर महीने पांच सौ पाउंड जेब खर्च के तौर पर मिलते थे, जो उनके लिए पर्याप्त था। उस आर्थिक आजादी को उन्होंने महसूस किया था। वह एक खुले वैवाहिक जीवन को जी रही थीं, जिसमें पति-पत्नी को पूरी आजादी थी कि वे अपने मन मुताबिक काम करें, रिश्ते बनाएं, आपसी संबंध उसमें किसी तरह की दखल नहीं देगें। ऐसा ही कुछ हम ज्यां पॉल सार्त्र और सिमोन द बोउवार के रिश्ते में भी देखते हैं।
उन दोनों ने अपने रिश्तों के बीच के स्पेस को खत्म नहीं किया। हम उन्हें आदर्श बनाने की बात नहीं कर रहें हैं लेकिन संबंधों में उस निजी ‘स्पेस’ की बात कर रहे हैं जो स्त्री के हिस्से में कम ही आती है। वर्जीनिया अपनी किताब ‘ए रूम आॅफ वन्स ओन’ में लिखती हैं कि खाना, कपड़ा और आवास हमेशा के लिए मेरा है। उसे पुरुषों से प्राप्त करने के लिए न तो मुझे श्रम या प्रयास करने की जरूरत है और न ही उनके प्रति घृणा या कड़ुआहट लाने की जरूरत है। इसलिए किसी पुरुष से नफरत करने की मुझे जरूरत नहीं है क्योंकि वह मुझे किसी तरह की चोट नहीं पहुंचा सकता है। न ही किसी पुरुष को मुझे रिझाने की जरूरत है क्योंकि उसके पास मुझे देने के लिए कुछ भी नहीं है। वर्जीनिया नारीवाद को एक मानसिक अवस्था मानती थी। वह स्त्री की स्वनिर्भरता की पक्षधर थीं। वह उस ‘स्पेस’ की बात करती थी जो स्त्री को अपनी सृजनात्मकता बनाए रखने के लिए जरूरी था। ‘स्पेस’ यानी अपने रिश्ते, अपनी पसंद, अपनी इच्छा के लिए स्पेस यानी कोई रोक टोक या हस्तक्षेप न हो। लेकिन क्या व्यावहारिक जीवन में परिवार के इस तंत्र में स्त्री को वह स्पेस मिल पाता है? एक नारीवादी स्त्री उस स्पेस के लिए कितना संघर्ष कर पाती है? (अमृता ठाकुर)

