राजेंद्र उपाध्याय

भारतीय रंगमंच और सिनेमा में कई दशकों तक सक्रिय भूमिका निभाने वाली जोहरा सहगल अपने जीवनकाल में ही किंवदंति बन गई थीं। नियमित योगा और कसरत से, कठिन आॅपरेशनों से गुजरने के बावजूद उन्होंने अपने को सौ से अधिक बरस तक रंगमंच पर सक्रिय रखा। यह आज भी अचरज की बात है। इतने कला माध्यमों में इतने बरसों तक सक्रिय जीवन गुजारने के उदाहरण इतिहास में विरले हैं। उन्होंने अपने साथ काम कर चुके कई नामी अभिनेताओं और रंगकर्मियों की मृत्यु देखी, कई की जन्म शताब्दियां मनार्इं और कई पीढ़ियों को अपने सामने जवान होते और ढलते देखा।
अपनी पीढ़ी के कई मशहूर लोगों के साथ उनका उठना-बैठना रहा, चाहे वे किसी भी क्षेत्र या देश के हों। वे कई उप महाद्वीपों में, कई द्वीपों में, कई देशों में एक साथ सक्रिय रहीं। इसलिए 11 जुलाई, 2014 को एक सौ दो वर्ष की उम्र में जब वे इस दुनिया से रुखसत हुईं तो उनके जाने की गूंज दो-तीन देशों में एक साथ सुनी गई। यहां हिंदुस्तान में दिल्ली और मुंबई उनका शोक मना रहे थे, तो वहां लाहौर में भी लोग गमजदा थे। लाहौर, इस्लामाबाद और कराची में भी उनके प्रशंसक थे और इंग्लैंड में भी। बाद के दिनों में मशहूर शायर फैज अहमद फैज की नज्में वे जिस अंदाज के साथ सुनाती थीं, वह भी काबिले तारीफ था।
बाद के दिनों में उन्होंने मुंबइया फिल्मों में काम करना बंद कर दिया था। लेकिन ‘चीनी कम’ में अमिताभ बच्चन के साथ, ‘वीरजारा’ में शाहरुख और प्रीति जिंटा के साथ और ऐसी ही और कई फिल्मों में भी वे एक चुलबुली आंटी के रूप में हमेशा याद रहेंगी। उन्होंने महान अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के साथ भी काम किया और उनके पोते रणबीर कपूर के साथ भी। इस तरह तीन पीढ़ियों के साथ उन्होंने काम किया।

उनकी जीवन यात्रा सक्रिय, उपलब्धि संपन्न, प्रेरक और लंबी रही है। उन्होंने ऊर्जा से भरापूरा जीवन जीया। उन्होंने बदलते जमाने के साथ बदलते दर्शक की बदलती रुचियों के अनुसार अपने आपको ढाला और सिद्ध किया कि कलाकार कभी पुराना नहीं पड़ता है, कलाकार कभी बूढ़ा नहीं होता है, वह लंबे समय तक युवाओं की सी फुर्ती के अनुसार विभिन्न मोर्चों पर सक्रिय रह सकता है।

अपनी आत्मकथा ‘करीब से’ में जोहरा सहगल ने सिलसिलेवार ढंग से बताया है कि कैसे समय-समय पर उन्होंने नृत्य, गायन, रंगमंच, टीवी और फिल्मों के अनुसार क्या-क्या काम नहीं किए? एक समय जब भारत में रंगकर्मियों के लिए नाममात्र की सुविधाएं थीं और आज के जमाने जैसी निजी-सरकारी ढेर सारी संस्थाएं नहीं थीं, उन्होंने पीर, बावर्ची, भिश्ती तक के भी सब काम खुद किए और वह सब कर दिखाया जो आज के रंगकर्मी सब सुविधाएं होते हुए भी प्राय: नहीं कर पाते हैं। यह सही है कि वह एक राजसी घराने से आई थीं और उनके संबंध अपने जमाने के लगभग सभी क्षेत्रों के रसूखदार लोगों से थे। समय-समय पर उन्होंने इसका फायदा भी उठाया। पर इस सबके बावजूद इतने लंबे समय तक रंगमंच और फिल्मों में टिके रहने के लिए अंतत: आपको अपनी प्रतिभा पर ही भरोसा करना पड़ता है।

उनकी आत्मकथा केवल उनकी अपनी आत्मकथा नहीं है, वह उस दौर के लगभग सभी नामी-गिरामी लोगों की आत्मकथा है। यह केवल उनको ही ‘करीब से’ देखने का मौका नहीं देती है, बल्कि उस दौर के सभी नामी-गिरामी लोगों को ‘करीब से’ देखने का मौका देती है। उन्होंने बीसवीं शताब्दी के भारतीय रंगमंच का उत्थान और पतन ही नहीं देखा है, अपने जमाने के महान रंगकर्मियों का ‘उत्थान और पतन’ देखा है, जिनमें महान नर्तक उदयशंकर और महान अभिनेता पृथ्वीराज कपूर का उत्थान और पतन भी शामिल है। दोनों एक जमाने के जगमग सितारे थे और दोनों में किस तरह बीमारियों की चपेट में आकर जरा-जर्जरित होकर मरे। उनके पति कामेश्वर सहगल की मृत्यु का वृत्तांत भी इसमें विचलित करने वाला है।

उनकी यह आत्मकथा किसी एक शहर दिल्ली में ही नहीं घटित होती है, बल्कि यह मुंबई और कई अन्य शहरों कराची, इस्लामाबाद, अमदाबाद, चेन्नई, बंगलूर की भी आवाजाही करती है। कहना चाहिए कि यह केवल हिंदुस्तान की ही आत्मकथा नहीं है, बल्कि पाकिस्तान, ब्रिटेन, जर्मनी, रूस, प्राग, कनाडा और त्रिनिदाद की भी है। इसमें हवाई जहाज से की गई यात्राएं हैं तो पानी के जहाज की भी यात्राएं हैं।

सत्ताईस अप्रैल, 1912 को उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में नवाबों के परिवार में पैदा हुर्इं जोहरा सहगल का देहांत एक लंबे सक्रिय जीवन के बाद 11 जुलाई 2014 को नई दिल्ली में हुआ। 1935 में वे अल्मोड़ा में उदयशंकर के नाट्य दल के साथ जुड़ीं। 1930 में वे जर्मनी से आधुनिक नृत्य का प्रशिक्षण लेकर आर्इं थीं। पृथ्वी थिएटर में उन्होंने पृथ्वीराज कपूर के साथ चौदह साल हिंदुस्तान के छोटे-बड़े शहरों में अभिनय करते हुए बिताए। ‘इप्टा’ का बनना और बिखरना उन्होंने नजदीक से देखा और जाना। इंग्लैंड में बीबीसी टेलीविजन, ब्रिटिश ड्रामा लीग और रूस में ‘मुल्ला नसरुद्दीन’ जैसे धारावाहिकों में उनका न भूलने वाला अभिनय अभी तक दर्शकों को याद है। अपने चुटीले अंदाज में वह अपना और अपने जमाने का सच बयान करती हैं।

रंगमंच और सिनेमा में योगदान के लिए जोहरा सहगल को अनेक पुस्कारों से सम्मानित किया गया, जिनमें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1963), फिल्म और रंगमंच के विकास के लिए ग्रेट ब्रिटेन का नॉर्मन बेटन अवार्ड (1966), पद्मश्री (1988), आजीवन उपलब्धियों के लिए संगीत नाटक अकादमी फैलोशिप (2004) और 2010 में ‘पद्मविभूषण’ दिया गया।

जोहरा सहगल ने आत्मकथा क्यों लिखी? इसका जवाब उन्होंने इस पुस्तक में खुद लिखा है-‘कोई अपने बारे में किताब क्यों लिखता है? सबसे बड़ी वजह तो यह कि इंसान मरने के बाद जीवन से अपनी पकड़ छूटने की कल्पना से डरता है। ऐसे में आत्मकथा उसे मरने के बाद भी अपने होने के भ्रम को बनाए रखने का जरिया लगता है। मुझे लगता है कि यह एक तरह की आत्ममुग्धता है। भला किसे परवाह है तुम्हारी भावनाओं की, तुम्हारे संघर्ष की, तुम्हारे सुख या दुख की? हां, शायद तुम्हारे बच्चों के लिए उनकी कुछ अहमियत हो। हालांकि वो भी दिल से तुम्हें प्यार करने और तुम्हारी देखभाल करने के बावजूद कभी-कभी ऐसा अहसास दिलाते हैं जैसे तुम उनकी जिंदगी से जुड़ा एक फालतू हिस्सा हो और तुम्हारे हटने से उन्हें राहत मिलेगी पता नहीं, पर मुझे ऐसा लगता है।’
‘मेरे लिए इस किताब को लिखने की खास वजह एक ऐसा काम हाथ में लेना था जिसमें मैं खुद को डुबा सकूं। साथ ही, मैं अपनी जिंदगी में कुछ हुआ उन सब बातों को पूरी तरह से भूल जाने से पहले ही लिख डालना चाहती थी। इसमें से बहुत सारी बातें बहुत पुरानी हैं। ऐसा लगता है वो सब किसी और जन्म में हुआ था। इसके बावजूद कुछ यादें इतनी जीवंत हैं जैसे कल ही की बात हो।’

आत्मकथा में भी इतिहास होता है, बहुत पुरानी बातें होती है। ऐसा लगता है वे सब हमारे जन्म से पिछले जन्म की बातें हैं। लेकिन इसमें जोहरा की जिंदगी कुछ इस तरह बयान हुई है कि वे इतनी जीवंत हैं जैसे कल ही की बात हो। मार्था ग्राहम ने एक बार कहा था-‘महान नर्तक अपनी तकनीक के कारण महान नहीं होते हैं, बल्कि वे अपने जुनून के कारण महान होते हैं।’ कहना न होगा कि जोहरा सहगल में ऐसा जुनून था जो उनके हर काम में दिखता था। ल्ल