पंजाब और हरियाणा में डेरों का दबदबा शुरू से रहा है। जबसे इन डेरों की राजनीतिक पार्टियों से नजदीकी बढ़ी है या कहें कि राजनीतिक दलों ने इन डेरों की मार्फत अपना वोट बैंक मजबूत बनाने की कोशिश शुरू की, तबसे इनकी ताकत और बढ़ती गई। सत्ता का समर्थन मिलने से ये डेरे अनैतिक और गैरकानूनी कामों से भी परहेज नहीं करते। इसी का नतीजा है कि समय-समय पर कई डेरा प्रमुखों पर कानूनी शिकंजा कसना पड़ा। मगर पंजाब और हरियाणा में न तो लोगों का इन डेरों से मोहभंग हुआ है और न सियासी दल इनसे दूरी बना पाए हैं। इन डेरों और सियासी पार्टियों के गठजोड़ के पीछे की वजहों का विश्लेषण कर रहे हैं संजीव शर्मा।
जाब की राजनीति में डेरों की भूमिका शुरू से अहम रही है। चाहे चुनाव का वक्त हो या फिर सरकारी फैसले, प्रदेश की राजनीति में डेरों ने अपनी ताकत हमेशा दिखाई है। पंजाब देश का एकमात्र ऐसा राज्य है, जहां इस समय छोटे-बडेÞ करीब दस हजार धार्मिक डेरे चल रहे हैं। इनके अनुयायियों की तादाद लाखों में है। प्रदेश में जिन डेरों का जनता में ज्यादा प्रभाव है उनकी संख्या भी सैकड़ों में है। इसी वजह से सभी राजनीतिक दलों का एकमात्र लक्ष्य इन डेरों के अनुयायियों को अपने साथ जोड़ते हुए चुनावी रण जीतना रहता है। पिछले दो दशक में राज्य में जब-जब चुनाव हुए, इन डेरों का समग्र विकास हुआ। इसके पीछे सभी दलों की एक ही मंशा रहती है कि डेरों से जुड़े अनुयायी अपने गुरु के निर्देशों का पालन करते हुए चुनाव के समय एकतरफा वोट करें।
सभी राजनीतिक दलों के नेता इस बात को लेकर एकमत हैं कि धार्मिक डेरे लोगों की मानसिकता को सामूहिक रूप से प्रभावित करते हैं। नेताओं का मानना है कि अनुयायी डेरा प्रमुखों का कहना मानते हैं और इसका फायदा उन्हें मिलता है। अपने आप में यह भी कम आश्चर्यजनक नहीं कि पंजाब के पुलिस थानों में भले सुरक्षाकर्मियों की कमी रही है, लेकिन डेरा प्रमुखों की सुरक्षा में कभी कोई कटौती नहीं होती। इसका ताजा उदाहरण हाल में तब देखने को मिला जब पिछले साल मई में संत ढडरियांवालों पर हमला हुआ तो उनका हालचाल पूछने के लिए पंजाब के उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और कैप्टन अमरिंदर सिंह कतारबद्ध हो गए थे। संत ढडरियांवालों के डेरे का असर पटियाला और रोपड़ जिलों में ज्यादा है।
दूसरा, नेताओं का मानना है कि इन डेरों में जाने के बाद अलग-अलग जाकर प्रचार करने की जरूरत नहीं होती, क्योंकि समूचे क्षेत्र के लोग एक ही छत तले मिल जाते हैं। हालांकि धार्मिक डेरों के संचालन के मामले में पंजाब का कोई भी हिस्सा अछूता नहीं है। आनंदपुर साहिब के इलाके में सबसे ज्यादा करीब सत्तर डेरे हैं। डेरा बाबा बुडढ दल और छियानबे करोड़ी निहंग छावनी के डेरा प्रमुख अकाली दल को समर्थन करते हैं। यों पंजाब में डेरों का इतिहास पुराना है, लेकिन राजनीति में इन डेरों का हस्तक्षेप सन 2000 के दौरान बढ़ा। इससे पहले हुए चुनावों में सभी राजनीतिक दलों की दौड़ श्री अकाल तखत साहिब तक रहती थी। अकाल तखत से आशीर्वाद लेने के मामले में शिरोमणि अकाली दल अन्य दलों के मुकाबले आगे रहा है। सन 2000 से पहले किसी भी दल का रुझान इस तरफ नहीं था।
वर्ष 2002 में हुए विधानसभा चुनाव में सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा ने सबसे पहले अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी। डेरा सच्चा सौदा का प्रदेश के मालवा क्षेत्र में काफी प्रभाव माना जाता है और यही क्षेत्र अक्सर जीत-हार का पैमाना होती है। डेरा सच्चा सौदा का प्रदेश की राजनीति में दखल बढ़ने के साथ ही राज्य में चल रहे अन्य डेरों ने भी राजनीतिक गतिविधियों को बढ़ावा देना शुरू कर दिया। दिलचस्प बात यह है कि इन डेरों के संचालकों ने कभी खुद खुल कर राजनीति में दखल नहीं दिया, अलबत्ता डेरों ने बाकायदा अपनी राजनीतिक इकाइयां बना रखी हैं।
वर्ष 2007 में डेरा सच्चा सौदा ने खुल कर कांग्रेस का समर्थन किया था। इसके बावजूद कांग्रेस सत्ता में नहीं आई और पंजाब में सत्ता की बागडोर दुबारा अकाली दल के पास चली गई। अकालियों की सरकार के सत्ता में आते ही डेरा सच्चा सौदा के कई विवाद भी पैदा हो गए, जो आज भी जारी हैं। हालांकि हाल में हुए पंजाब विधानसभा चुनाव में डेरा सच्चा सौदा ने पंजाब में खुल कर भाजपा और अकाली दल की मदद की थी, लेकिन पंजाब की सत्ता पर कांग्रेस का कब्जा हो गया। डेरा सच्चा सौदा प्रमुख भले जेल में हैं, लेकिन उन्हें अकाल तखत से माफी के मामले में अकाली दल आज भी स्पष्टीकरण दे रहा है। यही नहीं, डेरा सच्चा सौदा ने वर्ष 2014 में हुए हरियाणा विधानसभा चुनाव के दौरान खुल कर भाजपा का समर्थन किया था।
वर्ष 2014 में हुए लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष कैप्टन अमरिंदर सिंह अमृतसर जाने से पहले बठिंडा के निकट डेरा रूमी में आशीर्वाद लेने के लिए पहुंचे थे। अमरिंदर से एक दिन पहले इसी डेरे में पंजाब के उपमुख्यमंत्री सुखबीर बादल भी गए थे। पंजाब में माझा, मालवा, दोआबा में लगभग सभी जगहों पर धार्मिक डेरों का अपना-अपना प्रभाव है। हाल में हुए पंजाब विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष कैप्टन अमरिंदर सिंह, कांग्रेस के राष्टÑीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने डेरा व्यास स्थित राधा स्वामी सत्संग भवन में एक रात बिताई थी। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी भी पिछले साल राधा स्वामी व्यास के डेरे में आ चुकी हैं।
डेरों के वोट को कब्जे में करने के मामले में पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल सबसे आगे रहे हैं। बादल ने अपने कार्यकाल के दौरान परमिंदर सिंह सेखों को सलाहकार नियुक्त किया था जोकि राधा स्वामी सत्संग व्यास के डेरा प्रमुख की पत्नी के भाई हैं। यही नहीं, डेरा दशमेश बूंगा के डेरा प्रमुख बाबा अजीत सिंह जनता में अपने निजी रसूख के चलते शिरोमणि अकाली दल से विधायक भी रहे हैं। इसके अलावा धर्म और राजनीति का सबसे करीबी उदाहरण बठिंडा में देखने को मिलता है। इस सीट से पूर्व कांग्रेसी विधायक हरमिंदर सिंह जस्सी की बेटी डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह इंसा की पुत्रवधू हैं। हाल में हुए डेरा प्रकरण में भी जस्सी का नाम आ चुका है। पंजाब के जलंधर इलाके में स्थित डेरा सच्चखंड बल्लां का राजनीतिक प्रभाव इतना है कि शिरोमणि अकाली दल चुनाव के समय पंजाब में इस डेरे के अनुयायियों को मैदान में उतारता रहा है।
जातिवाद और क्षेत्रवाद
वैसे तो पंजाब में चल रहे धार्मिक डेरों को अपना-अपना महत्त्व है, लेकिन नेताओं ने इन डेरों को वोट के लिहाज से अपने-अपने तरीके से परिभाषित कर रखा है। विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं से बातचीत करने पर पता चला कि पंजाब के जलंधर इलाके में डेरा सच्चखंड बल्लां का प्रभाव ज्यादा है। यहां आने वाले ज्यादातर अनुयायियों में वे लोग शामिल हैं, जिनके परिवार का कोई न कोई सदस्य रोजगार या कारोबार के सिलसिले में विदेश गया है। नूरमहल स्थित दिव्य ज्योति जागृति संस्थान के बारे में कहा जाता है कि यह डेरा भले पंजाब में है, लेकिन इसका ज्यादा असर पंजाब में उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड आदि राज्यों से आकर बसे लोगों और गांवों में रहने वाले निम्न तबके के लोगों में है। इस डेरे के संस्थापक आशुतोष महाराज भी मूल रूप से बिहार के रहने वाले थे और यहां का संचालन संभाल रहे हजारों की संख्या में मुख्य सेवादार भी बिहार और अन्य राज्यों से हैं। डेरा व्यास में आने वाले ज्यादातर अनुयायी ऐसे लोग हैं, जो पंजाब या अन्य राज्यों में रह कर अपना कारोबार कर रहे हैं या फिर निजी और सरकारी क्षेत्रों में उच्च पदों पर तैनात हैं। कुछ ऐसी ही परिभाषा संत निरंकारी मिशन की भी है।
कई राज्यों की राजनीति में अहम भूमिका निभाने वाले सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा के बारे में प्रचारित है कि यहां समाज के प्रत्येक वर्ग से जुडेÞ लोग आते हैं। दूसरा डेरा व्यास और डेरा सच्चा सौदा ऐसे हैं, जिनके माध्यम से लाखों लोगों को प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से रोजगार मिल रहा है।
जोड़ मेलों की ताकत घटी
पंजाब में दशकों पुराना इतिहास रहा है कि चुनावी वर्ष में होने वाले शहीदी जोड़ मेलों और मकर सक्रांति पर आयोजित होने वाली माघी मेला कांफ्रेंस के माध्यम से पंजाब के सियासी दलों की आगामी दिशा के संकेत मिल जाते हैं। होला मोहल्ला, माघी मेला और जोड़ मेलों के अवसर पर सभी दल अपने-अपने स्तर पर एक ही स्थान पर रैलियों का आयोजन करते हैं। इनमें जुटने वाली भीड़ से इस बात के साफ संकेत मिल जाते हैं कि सूबे में अगली सरकार किसकी होगी। लेकिन पिछले कुछ सालों से लोगों में बड़ा बदलाव आया है। अब लोग ऐसे मेलों और सियासी कांफ्रेंस में जाने से कतारने लगे हैं। इसलिए नेताओं ने भी अपनी रणनीति को बदलते हुए माघी मेलों की बजाय पूरा ध्यान धार्मिक डेरों पर केंद्रित कर लिया है।
अशिक्षा और गरीबी की देन डेरे
लोगों को धार्मिक भावनाओं के साथ जोड़ने वाले ये डेरे आखिरकार हैं क्या? कैसे ये डेरे अस्तित्व में आए? कैसे ये फले-फूले और इनके भक्तों की संख्या लाखों-करोड़ों में क्यों है? कैसी शिक्षा देते हैं ये डेरे? ये सवाल आज पूरे देश के जनमानस के जहन में हैं।
दरअसल, डेरा वह स्थान है जहां एक खास मत को मानने वाले जमा होते हैं। पंजाब में हजारों की संख्या में ऐसे छोटे-बड़े डेरे चल रहे हैं। पंजाब और हरियाणा में साधुओं के डेरों की परंपरा वर्षों पुरानी है। दोनों राज्यों में नाथ, गिरी, सतनामी और दूसरे संतों के छोटे-बड़े डेरे हैं। पिछले तीन दशकों से पंजाब में सिखों के बीच अध्यात्म की नई धारा की बात करने वाले सैकड़ों डेरों का जन्म राजनीतिक संरक्षण के बीच हुआ है। ये डेरे सिक्खी परपंरा से हट कर एक नई और मध्यमार्गी आध्यात्मिक धारा की बात करते हैं। इनसे जुड़ने वाले अधिकतर सिख रविदास और मजहबी समुदायों से हैं। राज्य के प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता डाक्टर निर्मल सिंह कहते हैं कि डेरावाद ने अंधविश्वास और जात-पांत को बढ़ावा दिया है। जट्ट सिखों के संगठन भी इससे बच कर नहीं निकल सकते।
पंजाब में जिन डेरों का सबसे ज्यादा असर है उनमें डेरा सच्चा सौदा, डेरा राधा स्वामी व्यास, संत निरंकारी मिशन, दिव्य ज्योति जागृति संस्थान, डेरा रूमी (बठिंडा), गुरुद्वारा परमेश्वर द्वार, डेरा ढक्की साहिब (लुधियाना), डेरा भैणी साहिब (लुधियाना), डेरा बाबा बुढ्ढा दल, छियानबे करोड़ी निहंग छावनी, डेरा गरीबदासी संप्रदाय, डेरा जगतगिरि आश्रम (पठानकोट), मान सिंह पिहोवा वालों का आश्रम (रूपनगर), प्यारा सिंह भनियारां वाला (रूपनगर) और दमदमी टकसाल।
धर्मगुरुओं की सुरक्षा
पंजाब की सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार ने सत्ता में आने के बाद मंत्रिमंडल की पहली बैठक में यह फैसला किया था कि वीआइपी ड्यूटी में लगे पुलिस जवानों को वापस बुला कर उन्हें पुलिस थानों में तैनाती दी जाएगी। लेकिन अभी तक प्रदेश के उन धर्मगुरुओं या डेरा प्रमुखों की तरफ आंखें बंद करके बैठी है, जिनकी सुरक्षा में न केवल बड़ी संख्या में जवान तैनात हैं, बल्कि पंजाब में कई डेरा प्रमुख ऐसे भी हैं, जिन्हें जेड प्लस सुरक्षा प्रदान की गई है। एक धर्मगुरु को दी गई जेड प्लस सुरक्षा पर हर महीने औसतन बारह लाख रुपए खर्च आ रहा है। डेरों को लेकर पुलिस की तरफ से सरकार को सौंपी गई रिपोर्ट में कहा गया कि डेरों के प्रमुखों को सुरक्षा की जरूरत है और उन्हें धमकियां मिलती रही हैं। इसलिए उनकी सुरक्षा में कटौती नहीं की जा सकती है। कुछ डेरा प्रमुखों को आतंकवाद के समय से ही सुरक्षा दी जा रही है।
जेड प्लस सुरक्षा वाले संत
’ भैणी साहिब के प्रमुख सतगुरु उदय सिंह को माता चंद कौर की हत्या के बाद जेड प्लस सुरक्षा दी गई।
’ राधा स्वामी सत्संग डेरा व्यास के प्रमुख गुरिंदर सिंह को जेड प्लस सुरक्षा मिली है।
’ डेरा सचखंड बल्लां के प्रमुख संत निरंजन दास को आॅस्ट्रिया में 2009 में हमले के बाद से जेड सुरक्षा दी गई है।
’ रोपड़ स्थित बाबा प्यारा सिंह भनियारा वाले को 2007 से जेड सुरक्षा मिली है।
’ नूरमहल जलंधर स्थित दिव्य ज्योति जागृति संस्थान के प्रमुख आशुतोष महाराज को जेड सुरक्षा दी गई है। उन्हें 29 जनवरी, 2014 को डॉक्टरों ने क्लीनिकली डेड घोषित किया था, जबकि संस्थान का दावा है कि आशुतोष महाराज समाधि में हैं।
हरियाणा में बंद हुए मुख्य धार्मिक डेरे
पंजाब की तरह हरियाणा में भी धार्मिक डेरों का महत्त्व हमेशा से रहा है। राज्य के सिरसा,फतेहाबाद और हिसार क्षेत्र ऐसा है, जहां धार्मिक डेरे अधिक रहे हैं। इसके बावजूद हरियाणा की राजनीति में मुख्य तौर पर डेरा सच्चा सौदा और कबीरपंथी समुदाय से संबंधित रामपाल के डेरों का हस्तक्षेप ज्यादा रहा है। हरियाणा के एकाध मुख्यमंत्रियों को छोड़ दें, तो अधिकतर ने इन डेरों में समय-समय पर अपनी हाजिरी लगाई है। डेरा सच्चा सौदा जहां खुल कर हरियाणा की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाता रहा है, वहीं रामपाल का रोहतक और हिसार आश्रम भी स्थानीय राजनीति में सक्रिय रहा है। हरियाणा की पूर्व हुड्डा सरकार के कार्यकाल में जहां सतलोक आश्रम रोहतक बंद हुआ, वहीं वर्तमान भाजपा सरकार के कार्यकाल में सतलोक आश्रम बरवाला बंद हो चुका है। इसी तरह डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम के जेल जाने के बाद फिलहाल सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा की धार्मिक गतिविधियां बंद हो चुकी हैं। १
