मनीषा सिंह

भारतीय सिनेमा की एक खासियत इसमें दिखाए जाने वाले नृत्य और कानों में मधुरता घोलने वाले भावपूर्ण गीत होते हैं। खासकर हिंदी फिल्मी गीतों की एक सुदीर्घ परंपरा रही है, जिन्हें देश-विदेश में सराहना मिली है। पर इधर गीतों में रीमिक्सिंग के नाम पर की जाने वाली तोड़फोड़ और प्रयोगधर्मिता के नाम पर उनमें गालियों और अश्लील शब्दों-संवादों को शामिल करने की भेड़चाल ने कई सवाल खड़े किए हैं। इस प्रवृत्ति पर गायिका अनुराधा पौंडवाल ने टिप्पणी की है कि पुराने गानों का रीमेक नहीं बनना चाहिए, इससे उन पुराने गानों की कीमत कम हो जाती है। रीमिक्स गाने बिल्कुल वैसे होते हैं जैसे किसी खूबसूरत बनारसी साड़ी को काट कर बिकिनी बना दिया गया हो। कुछ साल पहले ऐसी ही चिंता मशहूर गायिका आशा भोंसले ने भी प्रकट की थी। उन्होंने अफसोस जताया था कि अब हमारी ज्यादातर फिल्मों में गानों के नाम पर जो कुछ परोसा जा रहा है, उसमें ज्यादा पुट अश्लीलता का होता है। उनके मुताबिक, गानों के रूप में ऐसी गालियां होती हैं, जिन्हें सुनना और सहन कर पाना मुश्किल है। आशा भोंसले के अनुसार ‘डीके बोस’, ‘हलकट’, ‘साला’, ‘तेरे साथ करूंगा गंदी बात’- आदि शब्दों से भरे गाने सार्वजनिक जगहों पर और परिवार के बीच सुने और गुनगुनाए नहीं जा सकते हैं। उनका मानना है कि ऐसे गीत ज्यादा समय तक नहीं चलते, हालांकि जल्द ही कोई नया, गालियों से भरा और अश्लीलता का पुट लिए गीत उसकी जगह ले लेता है।

एक वक्त था, जब दोहरे अर्थ वाले हिंदी और भोजपुरी गानों का समाज में काफी चलन था (चोली के पीछे से लेकर सरकाय लो खटिया का दौर)- हालांकि, तब भी शहरी युवाओं ने इन गानों को कम ही पसंद किया था, क्योंकि इन्हें सुनने का मतलब था टपोरी छाप कहलाना। लेकिन अब बादशाह और हनी सिंह जैसे आक्रामक गायकों के गाने शहरी तबके की शान माने जाने लगे हैं। इन गानों को सुनना और इन पर झूमना युवाओं को आधुनिकता का अहसास कराने लगा है। ऐसे गानों से ज्यादा इनके प्रति युवाओं में बढ़ती दिलचस्पी बेहद चिंताजनक है।
मामला यों तो हिंदी फिल्मी गीतों की गुणवत्ता से जुड़ा है, पर इधर कुछ वर्षों में ऐसे गीतों और इनके गायकों पर यह आरोप भी है कि इस तरह वे समाज में खुलेआम अश्लीलता को बढ़ावा दे रहे हैं, इससे महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा बढ़ी है। सवाल है कि जिसे सृजनात्मक या नई चीज कह कर समाज के सामने परोसा जा रहा है और जिसे पसंद करने वालों की भारी तादाद है, वह क्या सचमुच इतनी अश्लील, घृणित और उकसावा पैदा करने वाली है कि युवा पीढ़ी उससे तबाह हो सकती है और समाज में हिंसा भर सकती है! खासकर महिलाओं के खिलाफ समाज के बिगड़ते माहौल के लिए उसे इस सबके लिए जिम्मेदार माना जा सकता है!

पिछले कुछ समय में रैप-गायक हनी सिंह के गीतों पर अलग-अलग अदालतों से समन जारी हुए। कहा गया कि उनके गीत आपराधिक मानसिकता वाले लोगों को भड़काते और अश्लीलता को बढ़ावा देते हैं। पंजाब पुलिस ने भी इस संबंध में उनके खिलाफ एक मामला दर्ज किया था और पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पंजाब सरकार को यह कह कर फटकार लगाई थी कि उसने हनी सिंह के खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं की। संस्कृति का सवाल उठने से पहले कुख्यात दिल्ली गैंगरेप कांड के बाद जो माहौल देश में बना था, उसमें भी हनी सिंह को रैपर के बजाय ‘रेपर’ कहा गया था और कई साल पहले गाए उनके एक गीत का हवाला देकर उन्हें सजा देने की मांग उठी थी। कहा गया कि हनी सिंह के गीत समाज में महिलाओं के खिलाफ विकृत सोच पैदा करते और हिंसा को उकसाते हैं। रैप-गायक बादशाह या हनी सिंह के गीतों के बोल और प्रस्तुतियां हमारे देश में नई मानी जा सकती हैं, पर अमेरिका-कनाडा जैसे मुल्कों में पंक रॉक के नाम से ऐसा रॉक गीत-संगीत साठ के दशक से ही प्रचलन में है। इसके लिए अकेले हनी सिंह को कठघरे में खड़ा करने से पहले यह देखना होगा कि पिछले डेढ़-दो दशकों से हिंदी सिनेमा चोली के पीछे से लेकर शीला-मुन्नी नामक जो आइटम गीत बजा-सुना रहा है, उनमें सीधे तौर पर गालियां न सही, लेकिन समाज में उकसावा पैदा करने वाले सारे तत्त्व मौजूद रहे हैं। आज हालत यह है कि हिंदी फिल्मों के हर दूसरे या तीसरे गीते में महिलाओं को इस्तेमाल की चीज बताने वाले वही तेवर और वही मानसिकता नजर आएगी, जो कथित तौर पर लोगों को बादशाह या हनी सिंह के गीतों में नजर आती है।

अपनी फिल्मों में इन्हें जगह देने वाले निर्माता तर्क देते हैं कि युवा दर्शकों के लिए बनाई गई ‘बोल्ड’ फिल्मों के गीतों में ऐसा कुछ भी कहा-सुना नहीं जाता, जो इस पीढ़ी की जीवन-शैली से अलग हो। उनके मुताबिक यह भाषा-शैली अश्लील नहीं, बल्कि इसमें रचनात्मकता और नयापन है। लेकिन सच्चाई यही है कि नैतिकता के मौजूदा मापदंडों पर स्वर और तेवर के मामले में इसे काफी हद तक अभद्रता और अश्लीलता के दायरे में रखा जा सकता है, भले ऐसे गीत युवा पीढ़ी के मोबाइल पर कितने ही जोरशोर से क्यों न बज रहे हों। यह सही हो सकता है कि ऐसे गीत पसंद करने वाले कई युवा धाराप्रवाह न सही, लेकिन कभी-कभी बोलचाल की अपनी भाषा में वही गालियां शामिल करते हैं, जिन्हें फिल्म निर्माता उच्छृंखल चरित्रों के जरिए परदे पर उतार रहे हैं। लेकिन समाज के एक बड़े तबके की राय इससे काफी अलग है। यह तबका फिल्मों के इस रुझान को रचनात्मक के बजाय अश्लील कह कर अपने कानों पर हाथ रख लेता है।

इसके विरोध में खड़े लोगों के मुताबिक फिल्म निर्माता प्रयोगधर्मिता और खुलेपन की आड़ में हदें पार कर रहे हैं। यथार्थ के नाम पर वे जो कुछ परोस रहे हैं, उसके पीछे सोची-समझी व्यावसायिक रणनीति है। ऐसे गीतों और संवादों के जरिए नई युवा पीढ़ी के मस्तमौला अंदाज की जो बानगी फिल्मों में पेश की जा रही है, वह सिरे से नकली है। उसमें वह मासूमियत नहीं है, जो असल में युवाओं के स्वभाव में मौजूद रहती है। फिर यह क्यों जरूरी हो कि समाज में होने वाली सारी गतिविधियों को खुले तौर पर जनता के मंच पर ले आया जाए? आलोचकों की दलील है कि रचनात्मकता सब कुछ उघाड़ देने में नहीं, थोड़ा-बहुत छिपा लेने में होती है। खासकर वह जिसे समाज अपने लिए अच्छा नहीं मानता। कल्पना में दोहरा अर्थ निकाले जाने की गुंजाइशों को छोड़ समाज के अश्लील और अभद्र को सीधे परदे पर दिखा देने और गीतों में उतार देने की इन कोशिशों का अंजाम क्या निकलेगा, बताना मुश्किल है। पर इतना तय है कि पिछले कुछ अरसे में बालीवुड में कथ्य और ट्रीटमेंट के स्तर पर नया धरातल खोजने की जो जद्दोजहद तेज हुई है, उसे इस नकली प्रयोगधर्मिता से झटका लगेगा। साफ है कि नएपन के नाम पर अगर गालियों को फिल्मों में उसी तरह जबर्दस्ती ठूंसने की कोशिश हुई, जैसी गानों में बरसात या झरने का दृश्य डाल कर उसमें भीगी नायिका को अनगिनत बार-बार दिखाया और भुनाया गया है, तो इसमें संदेह नहीं कि लोग जल्दी इससे ऊब जाएंगे। ऐसे हथकंडों का हश्र क्या होता है, दर्शकों से ज्यादा यह बात हमारे फिल्मकार जानते हैं। यह भी ध्यान रखना होगा कि अगर ऐसे गाने पेश करना गुनाह है तो इन्हें सुनना और संजोना भी उससे कम बड़ा अपराध नहीं है। ०