पंकज पराशर
लोककला, लोकसंगीत, लोकशैली और लोकनृत्य का संरक्षण और संवर्द्धन किया जाना चाहिए। इसके लिए सरकारी स्तर पर सहायता भी प्रदान की जाती है। पर लोकगाथा को बचाने की वकालत करने वाले लोग जब लोककंठ से इसे कागज पर उतार कर इसके दस्तावेजीकरण की बात करते हैं, तो वह जाने-अनजाने दरअसल लोकगाथा को नष्ट करने की मुहिम में शामिल हो रहे होते हैं! यह बात सुन कर किसी को भी थोड़ी हैरत होगी कि लोकगाथा के दस्तावेजीकरण से तो वह और सुरक्षित हो जाएगी, नष्ट कैसे होगी? असल में लोकगाथाओं की रचना सामूहिक रूप से की जाती है, इसलिए उसके मूल पाठ या मूलरूप का पता लगाना बेहद मुश्किल काम होता है। रचयिता लोकगाथा की रचना करके उससे मुक्त होता जाता है, वह रचियता होने का श्रेय लेने से मुक्त होकर ही यह कार्य करता है। इसके बाद गाथा समस्त समाज, समुदाय या जाति की रचना हो जाती है और उसे गाने वाला प्रत्येक आदमी उसे अपनी निजी चीज मानता है। प्रत्येक गायक अपनी इच्छा के और अपनी मन:स्थिति के मुताबिक उसमें कुछ न कुछ जोड़ता-घटाता रहता है और यह क्रम अनंत काल तक चलता रहता है। इसलिए गाथाओं का आख्यान बहुत लंबा होता है। भोजपुरी में आल्हा बड़े आकार के लगभग सवा छह सौ पृष्ठों में प्रकाशित है। ‘ढोला मारू रा दूहा’ की कथा भी कुछ लंबी नहीं। विजयमल, लोरिकी, गोपीचंद और भरथरी के गीत भी छोटे नहीं हैं। जार्ज ग्रियर्सन ने तकरीबन आठ सौ पंक्तियों में विजयमल की अपूर्ण कथा को प्रकाशित कराया था। ‘कोस-कोस पर पानी बदले दस कोस पर बानी।’ इसलिए विभिन्न राज्यों में प्रचलित होने के कारण स्थानीय निवासी लोकगाथाओं में अपनी-अपनी भाषा की शब्दावली जोड़ते चले जाते हैं। इससे यह होता है कि लोकगाथा के आकार-प्रकार में वृद्धि होने के साथ ही उसकी भाषा में भी परिवर्तन होता जाता है। इसी वजह से लोकप्रिय गाथा का कोई निश्चित या अंतिम स्वरूप नहीं होता। कोई प्रामाणिक पाठ नहीं होता। इसके अनेक पाठ होते हैं और इसका कोई एक पाठ संभव नहीं हो पाता है। लेकिन आप जैसे ही इसका दस्तावेजीकरण करते हैं, तो किसी एक क्षेत्र की बोली, उसकी शैली को अन्य भाषाभाषी क्षेत्र की शैलियों पर जबरन थोप रहे होते हैं, जिसके कारण लोकगाथाओं की स्वच्छंदता को समाप्त करके इसे सीमित करने का प्रयास करते हैं। इसके चलते एक क्षेत्र की बोली में जो आनंद इसमें सन्निहित होता है, वह दूसरे क्षेत्र की बोली में जाकर अपना प्रभाव खो देता है। गायक का स्वाभाविक आनंद भी नष्ट हो जाता है और उसे अपनी ही लोकगाथा में अपने अजनबीपन का अहसास होता है। मसलन, मैथिली भाषी अंचल के दो जिले दरभंगा और मधुबनी में जिस सुर, शैली और बोली में राजा सलहेस, दीना-भद्री, सीत-बसंत, रेशमा-चूहड़, सादा-सारंगा आदि के नाच प्रस्तुत किए जाते हैं, उसे अगर उसी रूप में सहरसा, मधेपुरा, अररिया, पूर्णिया या खगड़िया-बेगूसराय में प्रस्तुत किया जाए, तो जनता और कलाकार दोनों को इसके साथ जुड़ने और आत्मसातीकरण में परेशानी होगी। जबकि इसी चीज को जब कोसी अंचल के गाथा गायक, नर्तक प्रस्तुत करें तो उन्हें अपार आनंद की अनुभूति होगी। इसलिए लोकगाथा के दस्तावेजीकरण में यह आनंद और उसके साथ तत्काल जुड़ने की क्षमता सीमित होकर नष्ट हो जाती है।
लोकगाथा के स्वरूप की एक बड़ी विशेषता यह होती है कि इनमें भले राजा, महाराजा, नवाब और अमीरों का वर्णन आता हो, पर उसमें स्थानीय रंग बहुत गहरे होते हैं। यही कारण है कि जिस देश या प्रांत में जो गीत प्रचलित हैं उनमें वहां के लोगों के रहन-सहन, रीति-रिवाज, खान-पान और आचार-व्यवहार का सजीव चित्रण रहता है। कहीं-कहीं स्थानीय ऐतिहासिक घटनाओं का भी उल्लेख पाया जाता है। बिहार में प्रचलित अनेक गीतों में बाबू कुंवर सिंह का वर्णन हुआ है। मारवाड़ में यातायात का साधन ऊंट है, इसलिए ‘ढोला मारू रा दूहा’ में मारवणी ऊंट की सवारी करती हुई दिखाई देती है। बुदेलखंड में शुरू से पानी का अभाव रहा है इसलिए वहां यह प्रचलित है- ‘मटकी ना फूटे चाहे खसम मरि जाए।’ दूसरी बात, संगीत के बिना किसी लोकगाथा की कल्पना नहीं की जा सकती। आल्हा गाते समय ढोलक की थाप कुछ विशिष्ट तरह की होती है, जिसे सुन कर श्रोता तक अगर गायक की आवाज न भी पहुंचे तो लोग समझ जाते हैं कि पास में कहीं आल्हा गाया जा रहा है। गोपीचंद और भरथरी के गीत गोरखपंथी साधु सारंगी बजाकर गाते फिरते हैं। बिना सारंगी के गोपीचंद और भरथरी के गीत की कल्पना ही नहीं की जा सकती। लोकगाथाएं प्रारंभ से ही मौखिक परंपरा के रूप में चली आ रही हैं। प्राचीन काल में गुरु अपने शिष्य को वेदों की शिक्षा मौखिक रूप में देता था और वह अपने शिष्य को इसी तरह पढ़ाता था। तमाम लोकगाथाएं इसी स्वरूप पर आज तक सुरक्षित हैं। लोकगाथा तभी तक सुरक्षित रहती है जब तक उसकी परंपरा मौखिक होती है। लिपिबद्ध करते ही उसकी गति और प्रगति दोनों रुक जाती है। अगर आपने किसी गाथा को लिख लिया है तो समझ लीजिए कि आपने लोकगाथा की सांस ही रोक दी है। यह जब तक मौखिक है तभी तक जीवंत है। क्योंकि इससे उसका पाठ निश्चित हो जाता है, जिसके बाद उसमें अनेक अंचल के गायकों द्वारा अपनी सुविधा के अनुसार फेर-बदल करने की गुंजाइश खत्म हो जाती है। लेकिन जब यह मौखिक रूप में हो तो वे अपनी इच्छानुसार इसमें जोड़-घटाव कर सकते हैं। इसीलिए हमें लोकगाथा के अनेक रूप मिलते हैं।
लोकगाथाओं में उपदेशात्मक प्रवृत्ति का अभाव पाया जाता है। जिस तरह संस्कृत के शिष्ट साहित्य में ‘नीतिशतक’, ‘नीतिश्लोका:’ और हिंदी में नीति के दोहे मिलते हैं, उसी तरह नीति के वचन गाथाओं में उपलब्ध नहीं होते। इन गाथाओं की प्रवृत्ति कथानक को गति प्रदान करने की है न कि उपदेश देने की। अगर किसी गाथा में यह तत्त्व पाया जाता है तो समझना चाहिए कि चारण अपने को समुदाय से बाहर समझता है। ‘लोरिकी’, ‘विजयमल’, ‘सोरठी’ और ‘आल्हा’ आदि में देशभक्ति, माता की आज्ञा का पालन, साहस, शौर्य और प्रेम के अनेक प्रसंग मिलते हैं, जिनसे सीख मिलती है, लेकिन इनमें उपदेश देने की कोई प्रवृत्ति नहीं पाई जाती। लोकगाथा कलात्मक या अलंकृत काव्य से पूरी तरह भिन्न है। अलंकृत कविता किसी कलाकार द्वारा लिखी जाती है जो अपनी रचना को सुंदरतम बनाने के लिए विभिन्न अलंकार, रस, छंद, रीति और गुणों के प्रयोग से अलंकृत काव्य की रचना संभव करता है। लेकिन लोकगाथाओं में अलंकार विधान, गुण-योजना आदि का प्राय: अभाव होता है। यदि कहीं अलंकारों की स्थिति दीख पड़ती है तो वे अनायास उपस्थित होते हैं, उसके लिए प्रयास नहीं किया जाता। लोकगाथाएं टेकनीक की दृष्टि से भी बहुत बेहतर नहीं होती हैं। यहां तक कि लोकगाथा में छंदशास्त्र के नियमों का भी बहुत शिथिलता से पालन किया जाता है। इसलिए लोकगाथा में रस होता है, जबकि अलंकृत काव्य में अलंकार। रस स्वाभाविक है और अलंकार मनुष्य निर्मित।
अलंकृत कविता के कवियों में चूंकि यश की आकांक्षा बहुत होती है, इसलिए उसकी विशिष्टता, उसका व्यक्तित्व प्रमुख रूप से हावी होता है। यही चीज एक अलंकृत रचनाकार को दूसरे अलंकृत रचनाकार से अलगाता है। लेकिन लोकगाथाओं में लेखक के व्यक्तित्व का अभाव होता है। चूंकि इन गाथाओं का कोई एक रचयिता नहीं होता, इसलिए उनके व्यक्तित्व का कोई प्रभाव लोकगाथा पर नहीं पड़ता। गाथाओं में कवियों का कोई महत्त्व नहीं होता। न तो वे वर्तमान में उपस्थित रहते हैं और भूतकाल में उनकी सत्ता थी या नहीं, इसमें भी संदेह ही बना रहता है। गाथाओं का रचयिता केवल अदृश्य नहीं होता, बल्कि उसका कोई अस्तित्व ही नहीं होता है। गाथाओं का गायक न तो कोई विचार प्रकट करता है और न किसी वस्तु की आलोचना करता है।

