बिफूर एक गांव है और यह राजस्थान के टोंक जिले के मालपुरा ब्लॉक में पड़ता है। बिफूर के किसान नाथूराम के पास 1.8 हेक्टेयर जमीन है। दो दशक पहले तक तक अपनी इस जमीन से वे हर साल करीब सवा लाख रुपए मूल्य की फसल पैदा कर लेते थे, लेकिन पानी की कमी ने धीरे-धीरे उनकी पैदावार कम कर दी। इस तरह उनकी करीब आधी जमीन बेकार हो गई। हालात इतने बदतर हो गए कि बहुत मेहनत से भी खेती करते तो भी बीस हजार रुपए से ज्यादा कीमत की फसल पैदा नहीं कर पाते थे। उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था कि खेती छोड़ आखिर वे करेंगे भी क्या। फिर एक संस्था की पहल ने गांव की दशा बदल दी। आज से डेढ़ दशक पहले तक ‘ग्लोबल वार्मिंग’ के कारण पैदा होने वाली जो त्रासदी बिफूर की सच्चाई थी, आज उसका वहां के लोगों के लिए कोई मतलब नहीं रह गया है।
दरअसल, बिफूर जब अपनी खेती-किसानी के हाल को लेकर बेहाल था तो वहां जयपुर की गैरसरकारी संस्था सिकोईडिकोन (सेंटर फॉर कम्युनिटी इकोनॉमिक्स एंड डेवलपमेंट कंस्लटेंट सोसायटी) ने कदम रखा। इस संस्था ने पंचायत के सहयोग से सबसे पहले लोगों में यह अहसास जगाने की कोशिश की कि यह उनका ही काम है और उन्हें ही करना है। इस तरह सबसे पहले इलाके के कुओं को गहरा किया गया। पर कुओं को गहरा तो कर दिया गया लेकिन यह प्रयास भी बहुत सफल नहीं रहा। जल्द ही कुओं का जलस्तर और नीचे चला गया।
जाहिर है कि सिर्फ कुओं को गहरा करने से बिफूर की समस्या का समाधान नहीं होने वाला था। सालभर कुओं में जलस्तर बनाए रखने के लिए जरूरी था कि गांव में जल संरक्षण का काम शुरू किया जाए ताकि कुओं को और गहरा न किया जाए बल्कि भूजल स्तर ऊपर उठ सके। इस तरह इसके बाद ही बिफूर में जल संरक्षण का नया चरण शुरू हुआ। वहां मिट्टी के ही बांध बनाए गए ताकि पानी को रोका जा सके। अतिरिक्त पानी को नालियों के जरिए तालाब में पहुंचा दिया गया। इस तरह बांध और तालाब के कारण अब यह सुनिश्चित हो गया था कि कुएं में सालभर पानी बना रहेगा।
बड़ी बात यह है कि राजस्थान में इस तरह के प्रयोगों का सिलसिला इकहरा नहीं है। पर्यावरणविद अनुपम मिश्र ने अपनी दो किताबों ‘आज भी खड़े हैं तालाब’ और ‘राजस्थान की रजत बूंदें’ में इसका सुरुचिपूर्ण तरीके से जिक्र किया है। राजस्थान के ही लापोडिया में लक्ष्मण सिंह के पानीदार उद्यम की तो आज देश-विदेश में चर्चा है। दिलचस्प है कि राजस्थान में जल संरक्षण के ये सारे प्रयोग पारंपरिक और देशज तरीकों पर आधारित हैं। ०

