ओम उपाध्याय
उसका पूरा नाम मनीष था, पर सब उसे मोनू ही पुकारते थे। मोनू का मनीष नाम सिर्फ स्कूल के हाजिरी रजिस्टर तक सीमित था। पूरा परिवार, रिश्तेदार, मित्र और मुहल्ले वाले उसे मोनू के नाम से ही जानते थे। बुलाते भी थे। बहुत कम, वह भी स्कूल के उसके सहपाठी जानते थे कि उसका नाम मनीष है, क्योंकि हाजिरी के वक्त उसका नाम मनीष ही पुकारा जाता था। बहुधा उसका नाम पूछने वालों को वह मोनू ही बताता, पर जब कोई उसके स्कूल में उसका नाम पूछता तभी वह अपना पूरा नाम मनीष बताता।
मोनू होनहार और जिज्ञासु प्रवृत्ति का विद्यार्थी था। वह चौथी कक्षा में पढ़ता था। पढ़ाई और हाजिरजवाबी में अव्वल था। मोनू को पशु-पक्षी पालने का बहुत शौक था। अपने इसी शौक के कारण सबसे पहले उसने एक बिल्ली पाली, पर वह बिल्ली बड़ी चटोरी थी। अगर गलती से वह खुली रह जाती, तो घर का सारा दूध पी जाती। फिर वह घर में गंदगी भी बहुत करती। बिल्ली से तंग आकर मोनू ने उसे अपने शहर से बहुत दूर एक गांव में छुड़वा दिया। कुछ दिनों बाद मोनू ने एक तोता पाला। हरियल तोता बहुत अच्छा था। उसे सब घर वाले पसंद करते थे। मोनू ने उसे कई शब्द सिखा दिए थे। तोता अक्सर पिंजरे में ही रहता था, क्योंकि बाहर उसे जानवर नुकसान पहुंचा सकते थे।
अभी तोते को पाले छह महीने ही हुए थे कि एक दिन जब मोनू अपने तोते को लाल मिर्च और अन्य खाद्य सामग्री खिला रहा था, उस समय तोता पिंजरे के बाहर था और वह मोनू द्वारा खिलाई जाने वाली चीजों का आनंद ले रहा था कि न जाने कहां से एक मोटा बिल्ला आया और वह तोते पर झपट पड़ा। मोनू चीख उठा। उसकी चीख सुन कर सारे घर वाले वहां आ गए और उन्होंने तोते को बचा लिया। पर बिल्ले के झपट्टे से उसके पंख नुच गए थे। मोनू और परिवार के अन्य सदस्य तोते को मरहम पट्टी के लिए जानवरों के डॉक्टर के पास ले गए। तोता एक-डेढ़ महीने में ठीक हो गया, पर इस घटना से मोनू बहुत डर गया और तोते के ठीक होते ही उसे जंगल में छुड़वा दिया।
तोते को छुड़वाने के बाद कुछ दिन बीते ही थे कि एक दिन मोनू का मित्र और सहपाठी राहुल सुबह-सुबह मोनू के घर आया। मोनू ने राहुल से इतनी सुबह आने का कारण पूछा, तो उसने बताया कि उसकी पाली हुई डॉगी लिली ने तीन बहुत सुंदर पिल्ले दिए हैं। वह चाहे तो उनमें से एक को रख सकता है। नेकी और पूछ पूछ! मोनू को जैसे मांगी मुराद मिल गई। वह बहुत दिनों से सोच रहा था कि वह ऐसा जानवर पाले, जिसके पालने में जोखिम कम हो और डॉगी को पालना उसे ऐसा ही लगा। सो, वह तुरंत राहुल के साथ उसके घर की ओर लिली के तीन सुंदर पिल्लों को देखने चल पड़ा।
आठ-दस दिन बाद लिली के उन तीन पिल्लों में से एक सफेद पिल्ला मोनू के घर आ गया। लिली का यह सफेद पिल्ला मोनू के पूरे परिवार को भा गया। मोनू ने लिली के इस पिल्ले का नाम रखा हनी। धीरे-धीरे एक वर्ष बीत गया। हनी का डील-डौल निखर आया। पहले जब वह छोटा था, तब कंू कूं करता था, पर अब भौंकने लगा था।
आज हनी पूरे दो वर्ष का हो गया था। हनी के डील-डौल के बढ़ने के साथ उसकी दुम भी लंबी और पहले से अधिक टेढ़ी हो गई थी। मोनू को हनी की टेढ़ी दुम अच्छी नहीं लगती थी। वह चाहता था कि हनी की पंूछ लंबी और सीधी रहे, ताकि वह और सुंदर दिखे और उसके डील-डौल के अनुरूप उसकी लंबी सीधी पूंछ दिखे। मोनू ने न जाने कितनी बार हाथों से उसकी टेढ़ी दुम को सीधी की, पर जब तक वह उसकी दुम को हाथों से पकड़े रहता वह सीधी रहती, मगर जैसे ही हाथों से छोड़ता कि वह फिर टेढ़ी हो जाती। मोनू सोचता कि आखिर क्या कारण है कि हॅनी की टेढ़ी दुम सीधी नहीं होती?
आखिरकार उसने दुम के साथ एक प्रयोग करने का सोचा। मोनू एक लोहे की खोखली सीधी नली लाया और उसमें हनी की टेढ़ी दुम को लगा दिया। फिर सोचा, इस नली में टेढ़ी दुम को कुछ दिन रखा जाए और कुछ दिनों बाद उसे नली के बाहर निकाला जाए, तब तो निश्चित ही वह सीधी होकर निकलेगी। पर ऐसा नहीं हुआ। हर बार दुम नली से बाहर आते ही टेढ़ी हो जाती।
मोनू के पापा कई दिनों तक उसके इस प्रयोग को देखते रहे। फिर एक दिन हंस कर बोले- बेटे मोनू, कुछ दिन तो क्या, हनी की टेढ़ी दुम को अगर बारह वर्ष भी सीधी नली में रखोगे तब भी यह टेढ़ी की टेढ़ी ही रहेगी। उसे सीधी नहीं कर सकोगे। कुछ देर की चुप्पी के बाद हाजिरजवाब मोनू ने कहा- पापा अगर हनी की टेढ़ी दुम बारह वर्ष इस सीधी नली मे रखने के बाद भी टेढ़ी निकली, तो मैं टेढ़ी दुम को इस सीधी नली में तेरह वर्ष रखूंगा तब तो यह सीधी हो जाएगी!

