हिंदी सिनेमा जगत में नामों आदि को लेकर एक अजीब तरह का अंधविश्वास काम करता है। सफलता अर्जित करने के लिए कुछ अभिनेता-अभिनेत्रियों ने अपना मूल नाम ही बदल लिया। इससे कुछ को शोहरत भी मिली, पर कुछ अपना नाम बदलने के बावजूद सफलता की सीढ़ियां नहीं चढ़ पाए। कुछ निर्माता-निर्देशकों का विश्वास है कि एक खास अक्षर से शुरू होने वाले शीर्षक रखने से ही उनकी फिल्मों को सफलता मिल पाती है। मुंबइया फिल्म उद्योग में व्याप्त ऐसे विश्वासों-अंधविश्वासों के बारे में बता रहे हैं श्रीशचंद्र मिश्र।
प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करते हुए भी हालांकि कुछ कलाकारों ने फिल्मों में अपनी अलग पहचान बनाई है, लेकिन फिल्मों की मायानगरी में इस धारणा को हमेशा स्वीकार किया जाता है कि प्रतिभा, लगन और मेहनत अपनी जगह, लेकिन किस्मत साथ न दे तो सारी कोशिश धरी भी रह सकती है। किस्मत का यह खेल चुपचाप अपना असर दिखाता है। तमाम तरह की समझदारी, रणनीति नाकाम हो जाती है और सफलता तथा ख्याति एक के हाथ से फिसल कर दूसरे के माथे पर चमक जाती है। यही वजह है कि सितारों का रहन-सहन कितना भी आधुनिक क्यों न हो जाए, किस्मत को अपनी मुट्ठी में करने के लिए वे कोई जतन नहीं छोड़ते। पूजा पाठ हो, तंत्र मंत्र हो या ज्योतिषीय सलाह पर गंडे ताबीज बंधवाना हो या नाम के हिज्जे बदलवाना हो, जो भी रास्ता सुझाया जाता है उस पर आंख मूंद कर भरोसा किया जाता है।
आज भी फिल्म का मुहूर्त नारियल तोड़ कर और मेहमानों को पेड़े खिला कर किया जाता है। तकनीकी क्रांति ने अब फिल्मों के प्रिंट को एक छोटी-सी डिस्क में समा दिया है। पहले चालीस-पचास किलो के प्रिंट बनते थे और कई निर्माता पहला प्रिंट लेकर कटरा के वैष्णो देवी मंदिर, तिरुपति के बालाजी मंदिर, मुंबई के सिद्धि विनायक मंदिर, शिरडी के साईं बाबा मंदिर या अन्य किसी आराध्य की चौखट पर सिर नवाते थे। हर निर्माता के दफ्तर में कोई न कोई देवी-देवता विराजे होते हैं और नियमित रूप से उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। यह तो खैर निजी आस्था का सवाल है। लेकिन यह आस्था फिल्म के बैनर में भी खूब दिखती रही है।
ज्योतिषीय सलाह फिल्म वाले खूब श्रद्धा से मानते हैं। जिस अक्षर को शुभ बता दिया जाता है उसी से फिल्म बनाने की परंपरा का पालन कई निर्माताओं ने किया है। जे. ओम प्रकाश और मोहन कुमार की हर फिल्म का शीर्षक ‘अ’ से शुरू होता था। अर्जुन हिंगोरानी ने हर फिल्म ‘क’ से शुरू की। ‘क’ से राकेश रोशन का मोह आज तक नहीं टूटा है। करन जौहर काफी समय तक ‘क’ से शुरू होने वाले शीर्षक से ही फिल्म बनाते रहे। एकता कपूर के दर्जन भर सीरियल ‘क’ पर टिके रहे। उनकी शुरुआती फिल्मों पर भी इस अक्षर का असर दिखा। पूजा-पाठ और तंत्र-मंत्र पर भरोसा करने वाली एकता ढेरों अंगूठियां और कई तरह के गंडा-ताबीज हमेशा पहने रहती हैं।
नाम को लेकर भी सितारों में खासा अंधविश्वास रहता है। बलराज साहनी के बेटे परीक्षित साहनी ने अजय साहनी के नाम से करिअर शुरू किया। बात नहीं बनी तो फिर अपना नाम परीक्षित कर लिया। फिल्मों की शायद ही कोई ऐसी बड़ी हस्ती होगी, जिसने कोई न कोई फिल्मी नाम न अपनाया हो। कुछ ने अपने नाम में मामूली फेर-बदल किया। जैसे रणवीर राज कपूर, राज कपूर और धर्मदेव आनंद देव आनंद हो गए। धर्मेंद्र सिंह देओल खाली धर्मेंद्र होकर रह गए। कुछ ने नाम जरूर परिस्थितियों की वजह से बदले। मसलन, देविका रानी को लगा कि यूसुफ खान नाम फिल्मों में नहीं चल पाएगा, इसलिए उन्होंने उसे दिलीप कुमार की पहचान दे दी। लेकिन कइयों ने अच्छे-भले नाम तक बदल डाले। सुनील दत्त बलराज दत्त के नाम से भी चल सकते थे। राजेश खन्ना का मूल नाम जतिन और जीतेंद्र का रवि अच्छा-खासा था। मनोज कुमार नाम बदल कर कुमार गौरव हुए और सुयश पांडे चंकी पांडे हो गए, लेकिन किस्मत नहीं बदल पाए।
सत्तर के दशक तक नाम बदलने की मानसिकता फिल्म वालों पर ज्यादा हावी रही और इसमें अभिनेत्रियों ने ज्यादा रुचि ली। मधुबाला का मूल नाम मुमताज जहां बेगम और नरगिस का कनीज फातिमा था। उनका नाम बदलने की वजह कुछ हद तक समझी जा सकती है। लेकिन कोकिला निरुपा राय बनीं, सायरा खान ने अपना नाम रीना राय रख लिया, शशिकला मीनाक्षी हो गईं और आरती को एकता नाम पसंद आया तो सिर्फ इसलिए कि ओढ़ा हुआ नाम उन्हें शुभ बताया गया। यह अलग बात है कि नाम बदलन से किस्मत कुछ की ही चमक पाई।
शांताराम इस तरह की शुभ-अशुभ परंपरा को नहीं मानते थे। इसीलिए वे न तो अपनी किसी फिल्म का मुहूर्त करते थे और न ही प्रीमियर। वे अकेले ऐसे फिल्मकार, थे जो किसी भी तरह के अंधविश्वास के कट्टर विरोधी थे। चालीस और पचास के दशक में अमावस्या के दिन कोई फिल्म शुरू न करने का रिवाज था। ‘दो आंखें बारह हाथ’ अमावस वाले दिन शुरू हुई। यूनिट ने अनुरोध किया कि वे एक दिन के लिए शूटिंग टाल दें, लेकिन शांताराम ने किसी की नहीं सुनी। फिल्म बिना किसी बाधा के पूरी हुई। बॉक्स ऑफिस पर तो वह सफल रही ही, ढेरों राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी उसे मिले।
चमका दिया किस्मत ने
अक्सर यह माना जाता है कि फिल्म परिवार में जन्मे व्यक्ति के अलावा वही अभिनय की दुनिया में चल सकता है, जिसने अभिनय का बाकायदा प्रशिक्षण लिया हो। मगर यह धारणा कई बार गलत साबित हुई है। ऐसे कई लोग फिल्मों में आए, जिनका अभिनय से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था। किस्मत ने उनके लिए नया रास्ता खोला और वे स्टार बन गए। चालीस के दशक में अभिनेता और पार्श्व गायक के रूप में अपार ख्याति पाने वाले कुंदन लाल सहगल टाइपराइटर कंपनी के सेल्समैन थे। देव आनंद डाक घर में काम करते थे और दूसरे विश्व युद्ध में चिट्ठियों को सेंसर किया करते थे। हिंदी फिल्मों में आम आदमी के चेहरे को लोकप्रिय बनाने वाले अमोल पालेकर बैंक में बाबू थे। अपनी आवाज के बल पर सफल अभिनय यात्रा कर पाए। सुनील दत्त रेडियो सोलोन पर उद्घोषक थे। स्मिता पाटील मुंबई दूरदर्शन पर समाचार पढ़ती थीं। दीप्ति नवल आकाशवाणी में उद्घोषिका थीं। रमेश सहगल ने सुनील दत्त को, श्याम बेनेगल ने स्मिता पाटील को और विनोद पांडे ने दीप्ति नवल को मौका क्या दिया कि उनकी गाड़ी सरपट दौड़ गई। अपनी आवाज के दम पर आधी सदी से फिल्मी दुनिया पर राज कर रहे अमिताभ बच्चन जब कोलकाता की निजी कंपनी में मैनेजर थे, उनकी आवाज को आकाशवाणी का उद्घोषक बनने लायक नहीं माना गया था। अमिताभ की मां तेजी बच्चन की सहेली तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का अभिनेत्री नरगिस के नाम लिखा सिफारिशी पत्र भी ज्यादा काम नहीं आया। नरगिस के पति सुनील दत्त ने फिल्म ‘रेशमा और शेरा’ में अमिताभ को गूंगे की भूमिका दी। लेकिन किस्मत ने उन्हीं अमिताभ बच्चन को सदी का महानायक बना दिया।
अशोक कुमार ‘बांबे टाकीज’ की प्रयोगशाला में सहायक थे। बहनोई शशधर मुखर्जी ने जब एक फिल्म में काम करने को कहा, तो मना नहीं कर सके, लेकिन अगले दिन सिर मुंडवा कर सेट पर पहुंच गए, यह मान कर कि उनका यह हुलिया देख कर कौन उन्हें हीरो बनाएगा। लेकिन शशधर मुखर्जी अड़े रहे और अशोक कुमार को हीरो बनना पड़ा। उसके बाद के साठ साल में अशोक कुमार ने अभिनय के कितने प्रतिमान कायम किए, ये सभी जानते हैं। बस में कंडक्टरी करते हुए कोई स्टार बन जाए, तो इसे किस्मत के खेल के अलावा और क्या कहा जाएगा? इंदौर में एक अनूठे अंदाज में टिकट काटते बदरुद्दीन काजी फिल्मकार गुरुदत्त को इतने भा गए कि वे उन्हें मुंबई ले आए और जॉनी वाकर नाम देकर ‘बाजी’ में एक छोटी भूमिका दे दी। इसके बाद तो हास्य अभिनय में जॉनी वाकर स्टार बन गए। महमूद के अलावा उन्हें ही एक समय में फिल्म के हीरो से ज्यादा मेहनताना मिलता था। वे अकेले अभिनेता हैं, जिनके नाम पर फिल्म तक बनी। शिवाजी राव गायकवाड़ रोजी-रोटी की तलाश में बंगलुरु चले गए। तमाम तरह के काम किए। कंडक्टरी भी की। तमिल फिल्मकार के बालाचंदर की उन पर निगाह पड़ी। उन्हें रजनीकांत नाम दिया और अपनी फिल्म में खलनायक बना दिया। धीरे-धीरे बढ़ता हुआ यह सफर नायाक और महानायक की परिभाषा को लांघ गया। आज की स्थिति यह है कि रजनीकांत एशिया में एक फिल्म के लिए सबसे ज्यादा पैसा पाने वाले स्टार हैं। राज कुमार फिल्मों में आने से पहले पुलिस इंस्पेक्टर थे। जीतेंद्र डिलीवरी बॉय थे और शूटिंग के लिए नकली जेवर लेकर जाते थे। शांताराम ने ‘सेहरा’ में उन्हें एक संवाद वाली भूमिका दी। वह संवाद भी उनसे बोलते नहीं बना। लेकिन किस्मत में सितारा बनना लिखा था, सो वे बन ही गए।
केवल अभिनय की दुनिया में नहीं, फिल्म निर्माण के अन्य क्षेत्रों में भी जाने-अनजाने ऐसे लोग प्रवेश पा गए, जिन्होंने अपनी मौलिक प्रतिभा से सभी को चमत्कृत कर दिया। यही किस्मत का खेल है। ऐतिहासिक फिल्में बनाने वाले सोहराब मोदी मोटर मैकेनिक थे। कला फिल्मों का एक आंदोलन छेड़ कर अपनी फिल्मों को अंतरराष्ट्रीय ख्याति दिलाने वाले सत्यजित राय प्रकाशन विभाग में कला निदेशक थे। उसी कड़ी के संवेदनशील फिल्मकार श्याम बेनेगल विज्ञापन कंपनी से जुड़े थे। कला और व्यवसाय के बीच की धारा की सार्थक फिल्में बनाने वाले ऋषिकेश मुखर्जी अध्यापक थे, तो बीआर चोपड़ा पत्रकार। सेना की नौकरी छोड़ कर आए आनंद बक्षी ने गीतकार के रूप में नाम कमाया, तो मदन मोहन चोटी के संगीतकार बने। राज खोसला अभिनय का सपना लेकर आए थे, लेकिन वे सफल निर्माता-निर्देशक बन गए। सुभाष घई ने पुणे के फिल्म एवं टीवी संस्थान से अभिनय का प्रशिक्षण लिया, लेकिन वे ज्यादा सफल हुए फिल्मकार के रूप में। किस्मत से आखिर कौन लड़ सकता है?
