‘प्यासा’, ‘साहब बीबी और गुलाम’, ‘चौदहवीं का चांद’ जैसी फिल्मों से अपने अभिनय का लोहा मनवा चुके गुरुदत्त बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। मनमौजी गुरुदत्त का जन्म बंगलुरु में हुआ। उनका वास्तविक नाम वसंत कुमार शिवशंकर पादुकोण था। ’गुरुदत्त के पिता शिवशंकर राव पादुकोण और माता वसंती पादुकोण थीं। उनके पिता शुरू में एक विद्यालय के हेडमास्टर थे, बाद में एक बैंक के मुलाजिम बन गए। मां स्कूल अध्यापिका थीं। उनकी मां लघुकथाएं लिखतीं थीं और बांग्ला उपन्यासों का कन्नड़ में अनुवाद भी करती थीं। गुरुदत्त ने दो शादियां की थीं एक गायिका गीता दत्त से 1953 में और दूसरी अपने ही रिश्ते की एक भानजी सुवर्णा से।

इस तरह बदला नाम

गुरुदत्त का बचपन कलकत्ते में गुजरा। कलकत्ता की छाप उनके बौद्धिक और सांस्कृतिक जीवन पर पड़ी। यह छाप इतनी गहरी थी कि उन्होंने अपना नाम बदल कर गुरुदत्त रख लिया। यह नाम उन्होंने खुद चुना।

कला से लगाव

गुरुदत्त की दादी हर शाम को दीया जला कर आरती करतीं और उस समय चौदह वर्ष के गुरुदत्त दीए की रोशनी में दीवार पर अपनी अंगुलियों की मुद्राओं से तरह-तरह के चित्र बनाते थे। उन्हें उनकी इस कला के लिए सारस्वत ब्राह्मणों के एक सामाजिक कार्यक्रम में पांच रुपए का नकद पारितोषक भी दिया गया था। सोलह साल की उम्र में उन्होंने अल्मोड़ा जाकर नृत्य, नाटक और संगीत की शिक्षा ली।

फिल्मी सफर

गुरुदत्त जुनूनी व्यक्ति थे। उन्होंने अपने सपनों को उड़ान देने के लिए कलकत्ते की लीवर ब्रदर्स फैक्टरी में टेलीफोन ऑपरेटर की नौकरी की। पर मनमौजी स्वभाव के कारण उन्होंने जल्द ही वहां से इस्तीफा दे दिया। मुबंई आ गए। उनके चाचा ने उन्हें प्रभात फिल्म कंपनी पूना में तीन साल के अनुबंध पर फिल्म में काम करने भेज दिया। गुरुदत्त की पहचान ‘चांद’ नामक फिल्म में श्रीकृष्ण की एक छोटी-सी भूमिका से बनी। 1945 में अभिनय के साथ ही वे फिल्म निर्देशक विश्राम बेडेकर के सहायक का काम भी करते थे। 1946 में उन्होंने एक अन्य सहायक निर्देशक पीएल संतोषी की फिल्म ‘हम एक हैं’ के लिए नृत्य निर्देशन किया। यह अनुबंध 1947 में खत्म हो गया। इसके बाद उन्होंने इलस्ट्रेटेड वीकली अंग्रेजी साप्ताहिक के लिए लघुकथाएं लिखीं। इसी समय उन्होंने माटुंगा में रहते हुए ‘प्यासा’ की पटकथा लिखी।

दोस्तों ने की मदद

गुरुदत्त प्रभात फिल्म कंपनी में बतौर कोरियोग्राफर काम करने लगे। वहीं काम करते हुए देव आनंद और रहमान से उनकी दोस्ती हुई। उन्होंने गुरुदत्त को फिल्मी दुनिया में जगह बनाने में काफी मदद की। देव आनंद ने उन्हें अपनी नई कंपनी नवकेतन में एक निर्देशक के रूप में अवसर दिया, लेकिन दुर्भाग्य से यह फिल्म पिट गई। गुरुदत्त ने 1951 में ‘बाजी’ फिल्म का निर्देशन किया। यह उनके द्वारा निर्देशित पहली फिल्म थी।

सराहनीय फिल्में

पहली फिल्म का निर्देशन करने के बाद उन्होंने 1952 में अपनी एक फिल्म कंपनी बनाई, जिसका नाम उन्होंने ‘गुरुदत्त फिल्म्स प्राइवेट लिमिटेड’ रखा। इस कंपनी की पहली फिल्म थी ‘आरपार’, जिसमें उन्होंने खुद मुख्य भूमिका अदा की। गुरुदत्त की दूसरी हास्य प्रधान फिल्म थी ‘मिस्टर एंड मिसेज 55’। यह अमेरिकी शैली की हास्य फिल्म थी। गुरुदत्त की शुरुआती फिल्में हास्य रस की थीं। बाद में उन्होंने गंभीर फिल्में भी बनार्इं। ‘प्यासा’, ‘कागज के फूल’ और ‘साहब बीबी और गुलाम’ जैसी फिल्में ऐसी ही हैं। इन फिल्मों की सराहना आज भी होती है।

निधन : 10 अक्तूबर, 1964 की सुबह गुरुदत्त मुंबई के अपने कमरे में मृत पाए गए।