मैंने उसे यह कह कर डांट दिया था कि ‘तुम टीनेज छोकरी नहीं, दो जवान ब्याहे हुए बेटों की मां हो, दादी-नानी की उम्र हो आई तुम्हारी- बीहेव लाइक अ मेच्योर वुमन। अगर सब लोगों का लंच पैक जाना है तो जगह इस पिछली सीट पर ही है।’
उसके साथ टूर पैकेज तो मैंने ले लिया था, पर उसके बात-बात पर ठुनकने और बचकानेपन पर मुझे खीज होती थी। बिना वजह उसने कुक के सहायक लड़के को डपट दिया था- मिनरल वॉटर और कोल्ड ड्रिंक्स के डिब्बे तो वह पहले ही ड्राइवर के केबिन में रख आया था- बाकी सामान मैंने अपने पास रखवा लिया था। मुझे आशंका थी कि वह लड़के के पास बैठने पर भी नाक-भौंह सिकोड़ेगी- इसीलिए गुस्से में मेरी आवाज ऊंची हो गई थी। मेरी ऊंची आवाज से सकपकाई हुई- अपने में गुम, लाल मुंह किए, चुपचााप दूसरी तरफ खिसक गई थी।
मुझे समझ नहीं आ रहा था कि वह नाराज है या शर्मिंदा! मुझे बुरा जरूर लग रहा था, पर कोई पछतावा नहीं था। चेक-पोस्ट पर जब बस रुकी तो बिना इधर-उधर देखे वह सबसे पहले उतर गई थी। वहां एक छोटा-सा पार्क था, खाना वहीं खाया जाना था। मौसम बहुत अच्छा था, पर पार्क में बहुत धूप थी। झटपट प्रबंधक के सहायक टीटू ने पार्क के प्रवेश-द्वार की सबसे ऊंची, चबूतरेनुमा सीढ़ी पर खाने का सामान रखवा दिया था। पर मेरी आंखें उसे ढूंढ़ रहीं थी। वॉशरूम की तरफ मैं दो चक्कर लगा आया था। रेस्तरां में भी देख आया था। कहीं भी दिख नहीं रही थी वह। आखिर वह पार्क की बाऊंड्री वॉल की बेंचनुमा सिल पर पेड़ की छाया के नीचे बैठी दिखी। वाह, बैठने की क्या खूबसूरत जगह ढंूढ़ ली- मैं मन में कहा। जाती बार यह जगह क्यों नहीं दिखी।
ध्यान आया कि जाते समय शाम हो गई थी, ऊपर से बारिश हो रही थी और हम बस से उतर कर सीधे रेस्तरां में चले गए थे। अगले दिन हमें दिल्ली लौटने के लिए फ्लाईट लेनी थी। मैं नहींं चाहता था कि उस सुंदर प्रदेश में हमारा अंतिम दिन मानसिक तनाव में गुजरे। वह जैसा भी व्यवहार करे मुझे अपने व्यवहार को सामान्य और संयत ही रखना है। अपने आप को यह आदेश देते हुए मैं उसके पास जाकर बैठ गया था।
हमारे आसपास ग्रुप के कई लोग आकर बैठ चुके थे। मैं थोड़ा-बहुत उसके स्वभाव को पहचानने लगा था। आशंकित था कि वह कहीं कुछ बेढब न कर बैठे। यह तो अच्छा हुआ कि खाने के डिब्बे कुक की टीम वाला छोटू ही सबको पकड़ा गया। ऐसा भी हो सकता था कि मैं ‘हम दोनों’ के लिए डिब्बे लाता और वह मेरे हाथ से लेने से इनकार कर देती- नहीं जान पाया था कि उसने डिब्बे में से कुछ खाया भी था या नहीं। उसका मूड ठीक करने के इरादे से मैंने उससे पूछा था- ‘आपका मन हो तो एक-एक कप चाय रेस्तरां में पी आएं।’ उसने सख्त नहींं में सिर हिलाया था। बावजूद इसके अपने प्रयास को जारी रखने के लिए मैं दो चाय वहीं ले आया था और उसके पास सिल पर रख दी थी। उसने चाय नहीं पी थी और अपनी नाराजगी को बरकरार रखे खाली बस में जाकर बैठ गई थी। होटल पहुंचने तक हमारे बीच कोई बातचीत नहींं हो सकी थी। बस के रुकने पर वह सबसे पहले उतर कर अपने कमरे में चली गई थी।
न चाहते हुए भी मेरा ध्यान उसी में लगा था। सोच रहा था कि स्थिति सामान्य हो जाती तो अच्छा होता। तभी दरवाजे पर हल्की-सी दस्तक हुई। उठता या कुछ कहता, इससे पहले ही भिड़े हुए दरवाजे को धकिया कर आधे खुले हुए दरवाजे में खड़ी उसने कहा- ‘मुझे आपसे कुछ कहना है।… अपने आप को ज्यादा सभ्य, शिष्ट और दूसरों की सहायता करने वाला समझते हैं आप! इतनी बुरी बना दिया मुझे कि छोटू को अपने पास न बैठने देती! आप होंगे ज्यादा पढ़े-लिखे, पर मैं भी अनपढ़ गंवार नहींं हूं। सबके सामने मेरी बेइज्जती कर दी। हम आपकी इज्जत करें, आपका सम्मान करें और आप…?’
उस पल मुझे लगा था कि कहीं वह रो न पड़े, पर वह उसी आवेश और तेजी में बोल रही थी- ‘विनीताजी ने जिंदगी में मेरी बहुत मदद की- उनके निधन के बाद आपका हालचाल पूछने के लिए आपके घर आ जाती थी… मुझे लगता था आप अकेला महसूस न करें।… पर आप तो मेरे मालिक ही बन बैठे।’
‘सॉरी, आप बहुत गलत समझ रहीं हैं… इस वक्त मैं आपको समझाऊं भी तो आप समझेंगी नहींं।’ उसे बीच में टोकते हुए मैं यह कह तो गया था, पर मुझे आशंका थी कि वह मेरे किसी शब्द को गलत न समझ ले।… भलाई चुप रहने में ही थी। इतना जरूर कहा- ‘आपको हर्ट करने का मेरा कोई इरादा नहीं था।’
‘अब कभी आपके घर नहीं आऊंगी।’ कहते हुए वह चली गई थी।
‘अच्छा हुआ भड़ास निकाल गई, अब सुबह तक स्वस्थ हो जाएगी।’ मगर ऐसा हुआ नहीं।
आपसी चुप्पी और कटी-कटी-सी स्थिति में हम दिल्ली पहुंचे थे। मुझे चिंता थी कि मेरी वजह से वह डिप्रेशन में न चली जाए।
उसके सनकी स्वभाव का परिचय तो मुझे डेढ़ साल पहले ही मिल गया था, जब विनीता के इस दुनिया में न रहने पर वह एक दिन अचानक घर आ पहुंची थी। दरवाजा मैंने ही खोला था और सामने उसे खड़ी देख कर चौंक गया था। शायद दरवाजे को पकड़ कर खड़ा का खड़ा रह गया होऊंगा कि उसके संकेत से हम लॉबी में रखी कुर्सियों पर बैठ गए थे।
मुझे समझ नहींं आ रहा था कि उससे क्या कहूं, क्या बात करूं? बात करना तो दूर, मुझसे तो किसी की उपस्थिति भी बर्दाश्त नहीं हो पा रही थी।… बात उसी ने शुरू की थी- ‘आजकल के बच्चे भी कैसे हो गए हैं, चार दिन भी नहीं हुए और बाप को अकेला छोड़ कर चले गए! यह भी नहीं हुआ कि बाप को अपने साथ कुछ समय के लिए ही सही अमेरिका ले जाते। विनीताजी तो कहा करती थीं कि हम दोनों में से जो भी अकेला रह जाएगा, वह बेटे के पास ही रहेगा… आपका बेटा तो चलो अमेरिका रहता है, मेरे तो दोनों बेटे यहीं हैं, उनको यह समझ में नहीं आता कि अकेली मां ने कितनी मुश्किल से पाल-पोस कर इस लायक बनाया है। बड़ा तो चलो डीएलएफ में रहता है, मेरे घर से दूर पड़ता है, रोज नहीं मिल सकता, पर छोटा तो उसी मकान की पहली मंजिल पर रहता है। मगर मजाल है कि रोज पांच मिनट के लिए ही मां के पास आकर बैठ जाए और पूछ ले- मां, तुझे किसी चीज की जरूरत तो नहीं? छोटे को पहली गाड़ी मैंने ही लेकर दी थी, किसी भी वीक-एंड पर घर नहीं टिकते। मां से कभी नहीं कहा, मां तू भी बोर हो जाती होगी, कभी तो अपने साथ ले जाते! साथ ले जाना तो दूर, उसकी बीवी की तो आंखों में ही लिखा हुआ होता है… इक मैं ते मेरा बन्ना/ दूजा आए ते मत्था पन्ना।’
बेटों के प्रति शिकायती स्वर मुझे कभी अच्छा नहीं लगता। जैसे मुझे ही कोई कठघरे में खड़ा कर रहा हो। उसके इस तरह अचानक आ जाने से मैं असहज-सा हो रहा था- ऊपर से उसकी ऐसी बातें! मैं बेचैन हो रहा था। मेरे लगातार चुप रहने से, उसे भी शायद अटपटा लगा हो या ऐसे में और बैठना उसे मुश्किल लगा हो। वह यह कह कर कि ‘अगर आप डिस्टर्बड महसूस न करें तो मैं कल आऊंगी’ चली गई थी।
डिस्टर्ब तो वह मुझे कर गई थी। मैं भी तो मां को पुरानी दिल्ली वाले घर में अकेला छोड़ कर, यहां दक्षिण दिल्ली में आ गया था, पर इसमें विनीता का कोई हाथ नहींं था। मां अपनी मर्जी से हमारे साथ नहीं आई थी। दुख मुझे इस बात का है कि मां बहुत जल्दी गुजर गर्इं, वे कहीं भी रहतीं और उनका होना बना रहता तो मेरे मन में अपराधबोध तो न जगता। शायद इसीलिए बेटे के अमेरिका लौट जाने पर मुझे राहत ही मिली थी। शायद यह आश्वस्ति भी कि अकेला छूट जाने पर भी, न बेटे को अपने साथ बांध रहा हंू, न उसके साथ खुद बंध रहा हूं। घर की व्यवस्था तो विनीता के बनाए नियम पर ही चल रही थी।…
उस पर विनीता की विलोम, उसकी यह मित्र हर दूसरे-तीसरे दिन हाथ में कटोरदान लिए आ पहुंचती- ‘मैं, मसाला चाय बना कर लाती हूं, फिर चाय पीते हैं’ कहते हुए किचन में पहुंच जाती।
‘साहेब ऐसी चाय नहीं पीते’ घरेलू सहायिका के कहने के बावजूद, ‘तू परे हट’ कह कर वह चाय बनाती। फिर इन शब्दों के साथ मेरे हाथ में पकड़ाती- ‘मुझे लोग लड़ाकी कहते हैं।… सर्दी में ऐसी ही चाय पीनी चाहिए। मुझे तो आप हमेशा से बहुत अच्छे लगते रहे हैं, विनीताजी के सामने तो कभी इक्कट्ठे बैठ, खुल कर बात करने का मौका ही नहीं मिला। यों मेरे बहुत से काम आप करवा देते थे, पर बात काम की नहीं, आदमी की नजर की होती है। आप जैसे ही मर्द होते हैं, जिसके साथ निश्चंत होकर औरत उठना-बैठना चाहती है।’
वह अपनी रौ में आती और अपना जबर्दस्त राग गाती और लौट जाती।
मैंने शुक्र मनाया कि उसके तथाकथित लड़ाके व्यवहार से मेड नाराज नहीं हुई। विनीता के जीवित होने पर तो मैं इन सहेलियों के जमावड़े से परे ही रहता था। विनीता अपनी इस जवान विधवा सहेली के प्रति सहानुभूति रखती हुई उसकी हर सहायता करती, पर उसके अनपेक्षित व्यवहार का मेरे आगे रोना भी रोती। इस ‘लड़ाकी’ प्रसंग में मुझे बरसों पहले विनीता के अनुभव की याद हो आई। वह मुझसे कह रही थी- ‘देखो न, मैं तो शन्नो के यह कहने पर कि ‘मैं सुबह नौ बजे की निकली शाम छह बजे तक घर पहुंचती हूं, मेरे पीछे बड़े वाले लड़के के साथ स्कूल से अक्सर एक लड़की आती है। मैं नहीं चाहती कि मेरे लड़कों के बारे में कोई उल्टी-सीधी बातें बनाए, मेरे साथ उस लड़की के घर चली चलो।… चली तो मैं गई, पर वह तो वहां पूरा नाटक खेल आई। (अपने कानों को पकड़े विनीता पूरे नाटकीय अंदाज में मुझे बता रही थी।)
लड़की के घर की घंटी बजाने पर शायद लड़की की मां ने दरवाजा खोला था- इसने उनसे लड़की को बुलाने के लिए कहा। मां के बार-बार यह कहने पर कि भीतर तो आइए, यह दहलीज पर ही खड़ी रही। लड़की के आते ही, बिना उससे कुछ पूछे-कहे, इसने उसके मुंह पर तमाचा जड़ दिया- तू मेरे लड़के को फांस रही है। खबरदार, तू कभी फिर मेरे घर आई।’ मैं तो पानी-पानी हो गई।’
पर अब विनीता तो थी नहीं…
अब मुझे न चाहते हुए भी शन्नो का इंतजार रहता। वह आती तो घर जिंदा हो जाता… मैं जिंदा हो जाता। उसके कहने पर ही तो सुबह की सैर शुरू की। बाग में उसको देख सुबह उजली हो जाती। थोड़ी लाऊड तो वह है या कहूं अतिवादी या बहुत एक्साइटेड या एकदम चुप। शायद अकेले जिंदगी ढोने के कारण ऐसी हो गई? बच्चों को पालना-पोसना, उन पर अहसान तो नहीं, तो फिर उनके प्रति शिकायत क्यों? गुस्सा क्यों? शायद सारी उम्र अकेले, आत्मनिर्भर रहने के बावजूद संस्कारवश वह पुरुष के बिना अपने को असुरक्षित महसूस करती है।… पर बच्चों की अपनी जिंदगी है। लगाव मां-बाप के लिए होता है, पर लगाव का मतलब हमेशा हां में हां मिलाना नहीं होता। लड़के मां के साथ बंधे नहीं रह सकते। पर यह शन्नो को कौन समझाए!… समझ तो वह तभी सकती है, जब वह ठंडे दिमाग से अपनी जांच-पड़ताल खुद करने की हिम्मत करे।
समझ नहींं आता कि क्या करूं? न चाहते हुए भी आंंखों के आगे शन्नो आ धमकती है। एक हफ्ते से भी ज्यादा हो गया लौटे हुए… न पार्क में दिखाई दी, न कहीं से उसके बारे में कोई सूचना ही मिली। मन में आया, उसके घर फोन कर लेना चाहिए। फोन मिलाया तो पता चला कि वह डॉक्टर के पास गई है। शायद उसकी पुत्रवधू थी, जो बता रही थी- ‘मां की सांस फूल रही थी, हार्ट-इंस्टीट्यूट लेकर गए हैं।’
अंतर्मन ठीक ही बेचैन हो रहा था। मोबाइल पर बात करने की अपेक्षा सोचा कि उसे मैसेज भेज दूं… ‘देखो परीक्षण करवाने पर इस उम्र में ब्लॉकेज तो निकलेंगे ही, आवेग में आकर कहीं एकदम सर्जरी के लिए राजी मत हो जाना। सेकेंड ओपीनियन जरूर ले लेना।’
शन्नो के बेटे और मेरा बेटा एक ही स्कूल में पढ़ते थे। उनमें दोस्ती कितनी रही होगी ध्यान नहीं, पर बचपन में इक्कट्ठे खेलते-कूदते थे। सुबह की सैर से लौटते हुए दूध, ब्रेड आदि ले रहा था कि एक गाड़ी पास आकर रुकी। उसमें से जो उतरा उसे एकबारगी मैंने पहचाना नहींं। वह शन्नो का छोटा बेटा था। उसने नमस्ते करने के बाद बताया- ‘उस दिन मां के मोबाइल पर आपका मैसेज मिल गया था, थैंक्स। मां को पेस मेकर लगा है।’
‘अब कैसी हैं वे’, पूछने पर उसने कहा था- ‘अगर कोई कॉम्प्लीकेशन न हुई तो मंडे-ट्यूजडे तक घर आ जाएंंगी।’
शन्नो ठीक हो जाए, उसे अवसाद न घेर ले, यह मेरी कामना और भगवान से प्रार्थना है, साथ ही यह चाहना भी कि किसी भी तरह वह मेरी आदत न बन जाए। शिष्ट व्यवहार के साथ जिस दूरी की अपेक्षा होती है, उसे बनाए रखने के लिए मैंने अपने आप को समझाया कि उसका हालचाल पूछने के लिए मैं उसकी लैंड-लाईन पर फोन कर लूंगा, पर अभी उसके घर नहींं जाऊंगा।
जिस दिन फोन किया, वह चेक-अप के लिए गई थी। मेरा जाना एकदम औपचारिक न लगे, इसलिए मैं अगली सुबह सैर के बाद उसके घर पहुंच गया। थोड़ी हिचक के साथ घंटी बजाई।… घंटी कहीं खराब तो नहीं! थोड़ी देर और लगती तो शायद मैं और प्रयास किए बिना घर लौट आता। तभी दरवाजा खुला और उसे खोलने वाली खुद शन्नो। पजामे और सामने से खुलने वाले टॉप में एकदम जवान-सी लगती खिली हुई लड़की।
‘अरे आप! मुझे बहुत खुशी हुई आपको यहां देख कर। अंदर आइए न आप…।’
उसके ड्रॉर्इंग रूम में आ गए थे हम। काऊच पर शायद उसका बड़ा बेटा सोया था, इसलिए उसने डाइनिंंगटेबल की कुर्सी पर बैठने के लिए कहा था। तभी गोद में बच्चे को उठाए उसका छोटा बेटा भी आ गया और उसने भाई को भी जगा दिया था। किसने कब चाय के लिए कहा, नहीं मालूम। बड़ी बहू सबको चाय दे रही थी।
अपनी इस फुलवारी में बैठी शन्नो की खुशी का रहस्य मेरे सामने था।
शन्नो का छोटा बेटा मुझसे कह रहा था- ‘अंकल मां को समझाइए, हमारी छोटी-छोटी बातों पर रूठ न जाया करे। हमारा मां के अलावा और है ही कौन?’
बड़े ने भी छोटे के स्वर में स्वर मिलाया- ‘आपकी बहुत तारीफ करती है मां, आपको बहुत मानती है। आपके साथ टूर की बात करो, तो खुश हो जाती है। डॉक्टर से कह रही थी- ‘मैं घूमने-फिरने की बहुत शौकीन हूं। भगवान स्वस्थ रखे तो बस अब यही इच्छा है कि देश-विदेश में बहुत-सी जगहें देख सकूं!
‘जवाब में डॉक्टर ने कहा- ‘आपका शौक तो बहुत अच्छा है, पर अभी तीन महीने तक आप कहीं नहींं जा सकतीं।’
‘अंकल, आप जगह तय कर लीजिए, बुकिंग्स हम सब करवा देंगे! आप मां के साथ होते हैं, तो हम निश्चिंत रहते हैं। हमारी मां दबने-घुटने वाली औरत तो नहीं है, फिर भी न जाने इसने हमारी किस बात को दिल पर लगा लिया?’
‘दिल विल नहीं, हमारी मां को तो किसी की नजर ही लग गई।’ छोटा बेटा मां को गले लगा कर लाड़ कर रहा था और शन्नो प्यार से उसे परे हटा कर मुस्कुरा रही थी।
मुझे विनीता और बेटे की बहुत याद आ रही है। शन्नो के घर से बाहर आ गया हूं। सोच रहा हूं, घर पहुंच कर ग्रीन टी में शहद डाल कर एक कप गरमा-गरम पीऊं।…
और टूर पैकेज?… वह अभी भूल जा।
(मीरा सीकरी)
