बारह साल का मोक्ष स्कूल से आकर अपनी विज्ञान की कॉपी ढूंढ़ रहा था। ‘मम्मी मेरी विज्ञान की कॉपी नहीं मिल रही है, आपने कहीं देखी क्या?’
‘नहीं मैंने तो नहीं देखी, तुमने अपनी अलमारी में अच्छे से देखा?’
‘हां मम्मी, पर वह नहीं मिली।’
‘ऐसा करो, एक बार अपने दादाजी के कमरे में जाकर देखो। उनके कमरे में तुम्हारी पिछले साल की कॉपियां पड़ी हुई हैं, कहीं उनमें न जा मिली हो।’
‘पिछले साल की कॉपियां! पर दादाजी उनका क्या करते हैं?’
‘पता नहीं क्या करते हैं।… मैंने अक्सर उन्हें उनमें कुछ लिखते देखा है।’
मोक्ष दादा जी के कमरे में पहुंचा। वे हफ्ते भर के लिए उसकी बुआ के घर गए हुए थे। मोक्ष पुरानी कॉपियों के ढेर में विज्ञान की कॉपी खोजने लगा। खोजते हुए उसने यों ही एक पुरानी कॉपी खोली तो देखा, उसके बाकी बचे पन्नों पर दादा जी ने बड़ी अच्छी लिखावट में कुछ लिख रखा था।
मोक्ष ने पढ़ कर देखा तो दादा जी ने उसमें एक बड़ी सुंदर बाल कहानी लिखी हुई थी। पढ़ कर उसे बहुत अच्छा लगा, क्योंकि दादा जी ने अपनी कहानी का हीरो उसे ही बनाया हुआ था। अब तो उसने वहां रखी बाकी कॉपियां भी टटोलनी शुरू कर दी। सभी के शेष बचे पन्नों पर दादा जी ने बहुत सुंदर बाल कहानियां लिख रखी थी।

मोक्ष की खुशी की कोई सीमा न रही। उसे लगा जैसे उसके हाथ कोई छिपा खजाना लग गया हो। पर उसे आश्चर्य भी हो रहा था कि दादाजी अपनी कहानियों को यों छिपा कर क्यों रखते हैं, इन्हें तो किताबों की शक्ल में बच्चों की लाइब्रेरी में होना चाहिए।
मोक्ष ने वहां से चुपचाप वे कॉपियां उठाई और अपने बैग में रख ली। शाम को उसने वे कहानियां अपने दोस्त अरूल को भी पढ़वाई, तो वह कहने लगा, ‘यार ये तो बहुत अच्छी कहानियां हैं, इन्हें तो प्रकाशित होना चाहिए।’
मोक्ष बोला, ‘सही कह रहे हो अरूल, कहानियां पढ़ कर मैं भी यही सोच रहा था।’
‘तो क्या ऐसा हो सकता है कि हम इन कहानियों को प्रकाशित करा दें? अरूल ने आइडिया दिया।
‘पर हम कैसे कराएंगे।… हम तो किसी प्रकाशक को जानते तक नहीं।…?’ मोक्ष मायूसी से बोला।
‘हम नहीं जानते तो क्या हुआ, गूगल बाबा तो सब जानता है। हम उस पर खोज लेंगे।’ अरूल ने युक्ति बताई। दोनों ने गूगल पर खोज कर कुछ प्रकाशकों के फोन नंबर और पते ले लिए। उनसे बात करने की जिम्मेदारी अरूल के बड़े भाई रमन भइया को दे दी गई। उन्होंने अपने एक दोस्त की मदद से एक प्रकाशक से बात की। वह दादाजी की कहानियां पढ़ कर बहुत प्रभावित हुआ, ‘तुमने फोन पर सही कहा था रमन। इन कहानियों को तो जरूर छपना चाहिए। लेकिन उसके लिए तुम्हें इन्हें अच्छे से टाइप कर मुझे ईमेल से भेजना होगा।’ रमन सारी कॉपियां लेकर वापस घर लौट आया और अरूल और मोक्ष को सारी बात बताई। सुन कर अरूल सोच में पड़ गया। ‘ये कहानियां तो हिंदी में हैं और हमें तो हिंदी में टाइपिंग नहीं आती।…’
‘अरे वह कोई समस्या नहीं है, आजकल ऐसे बहुत से सॉफ्टवेयर हैं, जो अंग्रेजी में टाइप किए गए डेटा को हिंदी में बदल देते हैं। हम यह कर लेंगे।…’ रमन भइया की इस बात से उन्हें राहत मिली।

‘तो ठीक है, आज से हम शाम को खेलने के बजाय यही काम करेंगे।’ अरूल बोला।
‘मैं भी तुम्हारी मदद करूंगा।’ रमन भइया की बात से दोनों में जोश भर गया। सबने मिल कर हफ्ते भर में सारी कहानियां टाइप कर ली और प्रकाशक को भेज दी। तब तक दादाजी भी घर वापस आ गए थे। मोक्ष ने उनके आने से पहले ही सब कॉपियां वापस जगह पर रख दी थी, इसलिए उन्हें किसी बात की खबर नहीं हुई।

दो महीने बाद दादा जी का जन्मदिन था। घर में छोटी-सी पार्टी रखी गई थी, जिसमें अरूल और रमन भइया भी आए थे। केक कटने के बाद मोक्ष ने दादाजी को उन्हीं की लिखी कहानियों की किताब उपहार में भेंट की। दादा जी ने जब उस किताब पर बतौर लेखक अपना नाम और फोटो देखा तो वे आश्चर्य से भर उठे। मोक्ष के मम्मी-पापा को भी विश्वास नहीं हुआ। फिर मोक्ष ने सबके सामने सारा किस्सा कह सुनाया। वह सुनकर दादा जी की आंखें भर आईं। उन्होंने मोक्ष और अरूल को गले से लगाते हुए कहा, ‘यह मेरे जीवन का सबसे अनमोल उपहार है। बोलो, इसके लिए मैं तुम्हे क्या रिटर्न गिफ्ट दूं?’

अरूल तपाक से बोला, ‘दादा जी, आपने मोक्ष को कहानियों में हीरो बना कर उसे तो रिटर्न गिफ्ट दे दिया, अगली बार मुझे हीरो बना कर कहानियां लिख दीजिए, यही मेरा रिटर्न गिफ्ट होगा।’ अरूल की बात सुन कर सभी ठहाके मार कर हंस पड़े।
दादा जी ने आजकल पुरानी कॉपी के बचे पन्नों पर कहानी लिखना छोड़ दिया है। मोक्ष और अरूल ने उन्हें हाईटेक बना दिया है। अब वे अपनी कहानियां लेपटॉप पर टाइप कर उन्हें ईमेल से सीधे प्रकाशन के लिए भेज देते हैं और उन्हें फेसबुक और अपने ब्लॉग पर भी शेयर करते हैं। देश-विदेश के बच्चे दादा जी की कहानियों के प्रशंसक बन चुके हैं और इसका सारा श्रेय दादा जी मोक्ष और अरूल को देते हैं। ०