श्रीशचंद्र मिश्र
लॉन टेनिस खिलाड़ी लिएंडर पेस दुखी हैं। उसका वाजिब कारण भी है। पिछले दिनों उजबेकिस्तान के खिलाफ डेविस कप मुकाबले के लिए भारतीय टीम में उन्हें जगह नहीं मिली। सत्ताईस साल में पहली बार ऐसा हुआ। उनका नाम काटने वाले कोई और नहीं, बल्कि एक समय डबल्स में उनके जोड़ीदार रहे महेश भूपति हैं। महेश इस समय डेविस कप टीम के गैर-खिलाड़ी कप्तान हैं। पेस को सबसे ज्यादा पीड़ा उस तरीके से हुई है, जिसके जरिए उन्हें टीम से बाहर का रास्ता दिखाया गया। उजबेकिस्तान के खिलाफ टीम में अपना स्थान पक्का मान कर वे मैक्सिको से भारत आए। आकर उन्हें पता चला कि वे नहीं खेल रहे। यह बात उन्हें फोन या मेल के जरिए बताई जा सकती थी। लिएंडर पेस ने सोलह साल की उम्र में पहली बार मार्च-अप्रैल 1990 में जापान के खिलाफ डेविस कप मुकाबले में हिस्सा लिया था। तबसे वे भारतीय टीम का अनिवार्य हिस्सा रहे हैं। इस दौरान उन्होंने कई उल्लेखनीय सफलता पाई। इन सत्ताईस सालों में कई खिलाड़ी आए-गए, पेस लगातार डटे रहे। डेविस कप मुकाबले में हिस्सा लेने को वे हमेशा तत्पर रहे। अब यह सिलसिला टूट गया है। भविष्य में जुड़ पाएगा, इसकी महेश भूपति के कप्तान रहते, तो उम्मीद नहीं की जा सकती। दोनों के मतभेद जगजाहिर हैं। एक समय उनमें दांत काटे की दोस्ती थी। उसके दम पर दोनों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक समय दुनिया की नंबर एक जोड़ी होने का रुतबा पा लिया था। रिश्तों में एक बार खटास आई तो वह बढ़ती ही गई।
अब सवाल है कि क्या भूपति ने महज खुंदक की वजह से पेस को टीम से निकाला? भूपति ने तिरालीस साल के पेस की जगह सैंतीस साल के रोहन बोपन्ना को चुना। बोपन्ना ने इस साल डेविस कप मुकाबले से पहले नौ मैच जीते थे। सात में उन्हें हार मिली थी। पेस का जीत-हार का अनुपात 5-7 का रहा। बोपन्ना की रैंकिंग चौबीस है, जबकि पेस की तिरपन। जाहिर है, खेलने का हक बोपन्ना का ही बनता है। ऐसे में महेश भूपति पर पक्षपात का आरोप लगाने का कोई मतलब नहीं है। बहरहाल, पेस के सत्ताईस साल के सफर पर विराम लगना दुखद है। पिछले कुछ समय से पेस ऐसी स्थितियों का सामना कर रहे हैं। पिछले साल रियो द जनेरियो (ब्राजील) में हुए ओलंपिक खेलों में लिएंडर पेस लान टेनिस के पुरुष डबल्स में या मिक्स्ड डबल्स में या दोनों में हिस्सा ले पाएंगे या नहीं, यह तय नहीं हो पा रहा था। इसका निर्धारण दो आधार पर होना था। एक, विश्व रैकिंग में तब की स्थिति पेस को किस स्पर्धा के लिए अर्हता दिलाती है? दूसरे, टेनिस संघ किस जोड़ी को चुनता है। हालांकि टेनिस संघ की ऐसे मामलों में ज्यादा चलती नहीं है, यह 2012 में लंदन में हुए ओलंपिक खेलों के वक्त जगजाहिर हो गया था। तब महेश भूपति और सानिया मिर्जा जैसे स्टार खिलाड़ियों की जिद चली थी। नतीजा काफी निराशाजनक रहा था। जो स्थिति थी उसमें लिएंडर पेस और सानिया मिर्जा की जोड़ी मिक्स्ड डबल्स में पदक की मजबूत दावेदार हो सकती थी। पेस ने 2015 में आस्ट्रेलियाई ओपन, विंबलडन और अमेरिकी ओपन में मिक्स्ड डबल्स का खिताब जीता। सानिया महिला डबल्स में दो ग्रैंड स्लैम समेत ग्यारह खिताब जीतने में सफल रही थीं। संयोग से पेस और सानिया दोनों की जोड़ीदार स्विटजरलैंड की मार्टिना हिंगिस थी।
ओलंपिक में लेकिन एक ही देश की जोड़ी खेल सकती है। महिला डबल्स में सानिया के लिए कोई सक्षम महिला जोड़ीदार थी नहीं। ऐसे में ज्यादा संभावना मिक्स्ड डबल्स में बनती थी और उसमें पेस का साथ सबसे आदर्श साबित हो सकता था। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। सानिया-बोपन्ना की जोड़ी बना दी गई। पेस को डबल्स में बोपन्ना का साथ मिला। पेस का यह सातवां ओलंपिक था। भारतीय संदर्भ में यह एक नया रिकार्ड था। इस नए रिकार्ड से पहले एक और रिकार्ड पेस के नाम के साथ पहले से जुड़ा हुआ था। उनके पिता डॉक्टर वेस पेस उस हॉकी टीम के सदस्य थे, जिन्होंने 1972 के म्यूनिख ओलंपिक में कांस्य पदक जीता था। चौबीस साल बाद पेस ने 1996 में अटलांटा ओलंपिक में लॉन टेनिस में कांस्य पदक जीत कर उस सफलता को दोहरा दिया। भारत के लिए ओलंपिक पदक जीतने वाली पिता-पुत्र की यही एकमात्र जोड़ी है। दिलचस्प संयोग यह है कि म्यूनिख ओलंपिक में पेस की मां जेनिफर ने भी हिस्सा लिया था। वे बास्केटबाल टीम की सदस्य थीं। अपने सातवें ओलंपिक में पेस का लक्ष्य स्वर्ण पदक जीतना था। तिरालीस साल की उम्र में जब ज्यादातर खिलाड़ी रिटायर हो जाते हैं, पेस का यह सपना देखना उनके जीवट और आत्मविश्वास को दर्शाता है। डबल्स में सौ से ज्यादा जोड़ीदारों के साथ करीब साठ टूर्नामेंट जीत चुके पेस को मलाल है कि वे अभी तक ओलंपिक में डबल्स स्पर्धा का कोई पदक नहीं जीत पाए हैं। जिन दिनों महेश भूपति के साथ उनकी जोड़ी रंग जमा रही थी, इसके कई बार आसार बने। 1999 में फें्रच ओपन और विंबलडन में पेस-भूपति डबल्स विजेता रहे, लेकिन 2000 से 2008 तक के तीन ओलंपिक खेलों में यह जोड़ी कोई कमाल नहीं दिखा पाई।
लिएंडर पेस रियो ओलंपिक को अपने सफर का अंतिम पड़ाव मानने को तैयार नहीं हैं। रिटायर होने के लिए उन्होंने असल में कोई सीमा तय ही नहीं की है। उनका मानना है कि खेलते रहने की इच्छा हो और खिलाड़ी को अपनी मानसिक और शारीरिक क्षमता का पता हो तो उम्र उसके लिए बाधा नहीं बन सकती। 1998 में पच्चीस साल की उम्र में पेस ने न्यूपोर्ट (अमेरिका) में सिंगल्स का अपना एकमात्र डबल्यूटीए टूर्नामेंट जीता था। लेकिन जल्दी ही उन्हें समझ में आ गया कि उनकी तकनीक सिंगल्स के लिए उपयुक्त नहीं है। लिहाजा उन्होंने डबल्स पर अपना ध्यान केंद्रित कर दिया। बड़े लक्ष्य कभी सामने नहीं रखे। शुरू में पांच ग्रैंड स्लैम जीतने पर ध्यान लगाया। वह पड़ाव तय कर लिया तो दस खिताब को कसौटी बना लिया। बढ़ते-बढ़ते 1999 से 2016 तक ग्रैंड स्लैम खिताबों की संख्या अठारह तक पहुंच गई। अब इसे बीस तक बढ़ाने का पेस का विचार है। उन्हें लगता है कि दो-तीन साल और खेल कर वे इस मंजिल को भी पार कर लेंगे। उसके बाद जो मन और शरीर कहेगा, पेस मानेंगे।
लिएंडर पेस दुनिया के ऐसे अकेले खिलाड़ी हैं जो सत्ताईस साल से ज्यादा समय से खेल रहे हैं और अब भी उनके रुकने का कोई इरादा नहीं है। अक्सर यह सवाल उठता है कि एक देश से दूसरे देश की यात्रा, लगातार खेलने का दबाव और कांटे की प्रतिस्पर्धा के बीच पेस संतुलन कैसे बनाए रख पाए, और वह भी लगातार कई साल तक। यह हमेशा कौतुक का विषय रहा है। पेस इसका श्रेय अपने पिता की सीख को देते हैं। वोल्फसबर्ग में पेस ने कड़ी मेहनत करना सीख लिया था। उसी का असर था कि उन्होंने 1990 में विंबलडन का और 1991 में अमेरिकी ओपन का जूनियर खिताब जीत लिया। पिता ने उन्हें जल्दी ही समझा दिया कि शरीर पर अतिरिक्त दबाव डालने की कोई जरूरत नहीं है। और खिलाड़ियों की तरह वे जिम में ज्यादा समय नहीं बिताते। पारंपरिक ट्रेनिंग पर भी वे ज्यादा जोर नहीं देते। सिर्फ खुद को फिट रखने लायक व्यायाम ही करते हैं। लिएंडर को एक और सबक अपने अनुभव से भी मिला। 1999 में डबल्स स्पर्धा के तीन ग्रैंडस्लैम जीतने के बाद वे 2003 तक तीन और खिताब ही जीत पाए। तब पेस खुद को ज्यादा से ज्यादा टूर्नामेंट में खपाए रखते थे ताकि ज्यादा से ज्यादा सफलता पा सकें। लेकिन इसका शरीर पर असर पड़ने लगा। उन्हें ट्यूमर हो गया। एमडी एंडरसर सेंटर में इलाज कराने के बाद उन्होंने तय कर लिया कि संख्या के बजाय वे गुणवत्ता पर ध्यान देंगे। उस समय तक साल में पेस बयालीस हफ्ते खेलते थे। उस व्यस्तता को कम करना पहला कदम था। दूसरे कदम में एक साल में चुने हुए सोलह टूर्नामेंट में खेलने का उन्होंने फैसला कर लिया। खतरा यह था कि इससे रेटिंग पर असर पड़ सकता है। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। उलटे 2010 से बड़ी सफलताओं का नया सिलसिला शुरू हो गया। 2006 में अमेरिकी ओपन का पुरुष डबल्स, 2008 में अमेरिकी ओपन का मिक्स्ड डबल्स और 2009 में फ्रेंच ओपन और अमेरिकी ओपन का पुरुष डबल्स का खिताब पेस के हिस्से में आया। 2010 से 2016 तक पेस ने आठ और ग्रैंड स्लैम खिताब अपने नाम जोड़ लिए। 1999 में तीन बड़े खिताब पेस ने छब्बीस साल की उम्र में जीते थे। इस सफलता को उन्होंने 2015 में बयालीस साल की उम्र में दोहरा कर सभी को चौंका दिया।
व्यक्तिगत उपलब्धियों के अलावा देश के सम्मान के लिए खेलने को भी उन्होंने हमेशा प्राथमिकता दी। डेविस कप के लिए होने वाली टीम स्पर्धा में पेस कई ऐतिहासिक सफलताओं के नायक रहे। मुकाबले में कैसी भी टीम क्यों न हो, डबल्स में पेस के होते हुए भारत की जीत हमेशा निश्चित होती थी। लेकिन डेविस कप में डबल्स के अलावा चार सिंगल्स मैच होते हैं और उसमें मजबूती न होने की वजह से तीन बार फाइनल में पहुंच चुकी भारतीय टीम अब सोलह सर्वश्रेष्ठ टीमों के वर्ल्ड ग्रुप में जगह बनाने के लिए लगातार जूझ रही है। पेस इससे चिंतित हैं। वे चाहते हैं कि युवा खिलाड़ियों को प्रशिक्षित करने के लिए ऐसी व्यवस्था की जाए, जिससे वे विश्व स्तर पर खेलने लायक नहीं, बल्कि जीतने लायक बन सकें। अपनी तरफ से वे अगले पांच साल तक डेविस कप में अपना सौ फीसद योगदान देने के लिए प्रतिबद्ध हैं। क्या उन्हें इसका मौका मिलेगा? ०

