रजनी अरोड़ा
होली का त्योहार आपसी मेल-मिला और मौज-मस्ती का प्रतीक है। एक तरफ जहां लोग एक-दूसरे को रंगों से सराबोर करते हैं, वहीं गुझिया, लवंग लतिका, बर्फी जैसी मिठाइयां, चाट-पकौड़े, दही-भल्ले और भांग मिली ठंडाई को भी खाने-खिलाने का जोर रहता है। सब ेक-दूसरे को होली की शुभकामनाएं देते हैं। लेकिन बढ़ती मांग और ज्यादा खपत की वजह से मिलावट भी काफी हो रही है। यह मिलावट खाद्य पदार्थों में ही नहीं, होली के रंगों में भी मिलती है। मिठाई या नमकीन में होने वाली मिलावट रंग में भंग डाल देती है। कई बार दुकानदार मिठाई को गाढ़ा करने के लिए स्टार्च या सिंथेटिक दूध, खोया या पनीर का इस्तेमाल करते हंै। दूध को गाढ़ा करने के लिए सूजी, ब्लॉटिंग टिशू पेपर या टॉयलेट पेपर को दूध में भिगोकर उसका पल्प और यूरिया भी मिलाया जाता है। इस दूध या विभिन्न दूध-उत्पाद से बनी मिठाइयों के सेवन से हमारे लीवर को नुकसान होता है और पेट संबंधी कई विकार होने का खतरा रहता है। होली की पसंदीदा केसर गुझिया में भी मिलावट की आशंका रहती है। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण के वैज्ञानिकों ने यह साबित किया है कि इनमें मेटानिल, क्विनोलिन जैसे पीले रंगों से कैंसर जैसी बीमारियां होने की आशंका रहती है।
इन्हें बनाने में इस्तेमाल किया जाने वाला घी या तेल भी मिलावटी हो सकता है। इन्हें बनाने के लिए आरगेमिनी मेक्सिकाना और येलो बटर डाई, पाम स्टियेरिन आॅयल को वनस्पति घी में मिला कर इस्तेमाल किया जाता है। होली ठंडाई के बिना अधूरी-सी है। एनर्जी बूस्टर की तरह पी जाने वाली ठंडाई में भी कई बार मिलावट मिलती है। डिब्बाबंद मिठाई लेने के मूड में हैं तो उसका बैच नंबर और एगमार्क जरूर जांच लें। होली पर बनने वाली मिठाइयों में इस्तेमाल किए जाने वाले दूध-उत्पाद में स्टार्च की जांच करने के लिए आप मिठाई का छोटा सा टुकड़ा लेकर थोड़े से पानी में डालें। इस पानी को उबालें। ठंडा होने पर इसमें आयोडीन की दो बूंद मिलाएं। अगर यह मिश्रण नीला हो जाता है तो इसका मतलब है कि यह मिलावटी है। इस तरह की जांच से आप दूध और दूध की बनी चीजों की जांच तो कर ही सकते हैं। मिठाइयों में जरूरत से ज्यादा चटक रंग उनमें इस्तेमाल किए जाने वाले नकली या सिंथेटिक। अगर आपको मिठाई खरीदनी ही पड़े तो किसी प्रतिष्ठित और बड़ी दुकान में ताजी तैयार चीजें ही खरीदें। ताकि वहां इनमें हाइजीन या स्वच्छता और मिलावट का अंदेशा कम रहेगा। यह ध्यान जरूर रखें कि वे चटक रंगों की न हों क्योंकि इनमें सिंथेटिक रंग हो सकते हैं।
बड़ा हो या छोटा-हर कोई होली के अवसर पर रंगों में सराबोर होना चाहता है। लेकिन आजकल बाजार में रसायनयुक्त सिंथेटिक रंग धड़ल्ले से मिलते हैं जिनसे खेलने पर इस त्योहार मे कई बार आंखों और त्वचा को गहरा नुकसान हो सकता है। सिंथेटिक रंग कई तरह के पाउडर, पेस्ट और पानी के रंग के रूप में बाजार में मिलते हैं। कई तरह के घातक रसायन, इंजन आॅयल, डीजल, क्रोमियम, आयोडीन, कॉपर सल्फेट आदि से रंग बनाए जाते हैं। कुछ रंग-निर्माता तो नरम बालू को भी कई रंग के पाउडर के साथ मिला कर होली का गुलाल बना देते हैं। पानी में डालने पर असली रंग बहुत जल्द घुल जाएगा और पानी का रंग बदल देगा। जबकि मिलावटी रंग पानी में धीरे-धीरे घुलेगा और पानी का रंग थोड़ा-सा ही बदलेगा और दानेदार दिखेगा क्योंकि उसमें रेत मिली होती है। १

