रवींद्र कुमार पाठक
लोकोक्तियां (कहावतें) समाज का प्रतिबिंब होती हैं। उनका विकास या संघटन सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक मूल्यों से निरपेक्ष नहीं होता। इस संदर्भ में उल्लेखनीय है कि उनमें समाज के पूर्वग्रह और सामाजिक स्तरीकरण भी झांकते नजर आते हैं। बहुत सारी ऐसी लोकोक्तियां हैं, जो सामाजिक भेदभाव का न सिर्फ प्रतिबिंबन हैं, बल्कि अपने प्रयोग द्वारा वे अप्रत्यक्ष रूप से उन भेदभावों की संरचना को ही मजबूती देती हैं। ऐसी भेदवादी संरचनाओं में पितृसत्ता, जातिवाद, नस्लवाद, क्षेत्रवाद आदि तो होते ही हैं, बल्कि कई अन्य (शारीरिक रूप से अक्षम, विकलांग आदि)के प्रति विद्यमान घातक पूर्वग्रहों को भी जाहिर करती हैं। स्त्री और लोकोक्तियों के संबंध में जो व्यापक सच उभर कर सामने आता है, उसके अनुसार अधिकतर में स्त्री की संवेदना-पीड़ा आदि कहीं शामिल नहीं होती या उसे व्यक्त करने वाली भाषा स्त्री को ले कर बेहद असमावेशी होती है। यानी वे पुरुष-प्रभुत्व की भाषा में आकार पाती हैं। ऐसी कहावतों में पुरुष को जहां स्वाधीन और स्वच्छंद, वीर, साहसी, चुस्त-दुरुस्त, शक्तिशाली, जिम्मेदार, कर्मठ, ईमानदार और बहुमुखी दिखाया जाता है या उससे वैसा ही रहने की अपेक्षा की जाती है। वहीं स्त्री को चालाक, धूर्त्त, अविश्वसनीय, मौकापरस्त, पेटू, झूठ बोलने वाली, धोखेबाज, झगड़ालू, निर्लज्ज आदि दिखाया जाता है और साथ ही यह अपेक्षा भी की जाती है कि वह पराश्रित, कमजोर, डरपोक, सुंदर, शर्मीली, सलज्ज, झुकने वाली, विनम्र, सेवा करने वाली, चुप रहने वाली, पति की यौन-दासी, सास-ससुर की सेवा करने वाली और अपनी सारी आकांक्षाओं व इच्छाओं को दबा कर घर के लिए बैल की तरह खटने वाली मुफ्त की नौकरानी बनी रहे ।
इस तरह ये कहावतें समाज में पुरुष और स्त्री के बीच की विषम स्थितियों और स्त्री से की गई विसंगत और अन्यायकारी व्यवहार को रेखांकित करती हैं। सार रूप में कहना होगा कि उपलब्ध लोकोक्तियों का मुख्य स्वर स्त्री को लेकर नकारात्मक ही रहा है। साथ ही उनमें उत्पीड़नों की भी अनुगूंज सुनाई पड़ती है। ऐसी कहावतों की संख्या भी कम नहीं, जिन में ममता की छांह से बिछुड़ी हुई उन नवब्याहता कन्याओं की व्यथा-कथा भी उभर कर सामने आई है, जिनका सामना ससुराल पक्ष के अमानवीय व्यवहार से हुआ है। उदाहरण के लिए-लोहार के घर लोहा और ससुराल में बहू को दुख ही दुख है (बांग्ला कहावत)। बेटी के बाप की पगड़ी हमेशा नीचे रहती है आदि। फिर भी, व्यापक सत्य यही है कि पुरुष-भाषा में रचित इन कहावतों में स्त्री की निंदा, अवमूल्यन, वस्तुकरण आदि की प्रवृत्ति आम है। इसके साथ, स्त्री के प्रति अकारण दंड, उपेक्षा और अपमान वाली लोकोक्तियां भी हमारे समाज में बहुतायत से मिलती हैं। बेटे का महत्त्व बढ़ाती और बेटी का अवमूल्यन करतीं बहुतेरी कहावतों में जो आशय आमतौर पर आकार पाता है, वह कुछ इस प्रकार है-बेटा आंख होता है और बेटी नाक। स्त्री को इंसान की जगह ‘नाक’ यानी घर की इज्जत करार देने वाली ऐसी कहावतें लड़की के प्रयत्नों को हतोत्साहित करती है। तसलीमा नसरीन ने अपनी किताब ‘औरत के हक में’ में एक बांग्ला कहावत का उल्लेख किया है कि अभागे की गाय मरती है और भाग्यवान की बीवी।
गढ़वाली कहावत है, जिसका आशय है कि बैल को खेत के किनारे और महिला को अकेले में पीटना चाहिए, ताकि वह चूं भी करे तो कोई सुनने वाला न हो। ऐसी ही तमाम अन्य कहावतों या उनके आशयों को उदाहरण-रूप में रखने से बात कुछ और खुल सकती है। जैसे औरत छोटी या मोटी विष की बूटी, कलियुगी बहू में तनिक नहीं हया, डोली से उतरे करे पिया-पिया, सारी खुदाई एक तरफ, जोरू का भाई एक तरफ, माय के न मिले ओढ़ना-बिछौना, जनाना के कान में चमकेला सोना, अंधी पीसे कुत्ते खाए, कमजोर की लुगाई, गांव भर की भौजाई, गाय भोली-भाली खरीदनी चाहिए और बहू सीधी-सादी लानी चाहिए आदि। बिन ब्याहे बेटी मरे ठाढ़े ऊ ख बिकाय। बिन मारे मुदई मरे तीनु काल टर जाय। आदि।
इसी संदर्भ में संस्कृत के नीतिकार चाणक्य का कथन उद्धरणीय है-सलज्जा गणिका नष्टा, निर्लज्जा वै कुलांगना।
लज्जायुक्ता वेश्या और लज्जाहीन कुलस्त्री नष्ट हो जाती हैं। । यह उदाहरण है- स्त्री की यौनिकता को लेकर पितृसत्ता में मौजूद दोहरी सोच का। एक तरफ तो घर या अपने समूह की स्त्री से ‘लज्जावनत’ और ‘पतिव्रता’ होने की अपेक्षा की जाती है, तो दूसरी तरफ वारांगना या अन्य समूह की स्त्री से अपेक्षा की जाती है कि वह यौन-व्यवहार में निर्लज्जता की हद तक उन्मुक्त हो। ये दोनों सोचें एक ही सिक्के के दो पहलू की तरह हैं। दोनों में पुरुष के सुख की चिंता, स्त्री की यौन-स्वतंत्रता का निषेध और उसकी यौनिकता को कठोरता से भोगने और दलने की आकांक्षा विद्यमान होती है। ऊपर की लोकोक्तियां विराट सामाजिक कोष के कुछ चुनिंदा नमूने भर हैं।इन्हें यह समझते हुए पढ़ना चाहिए कि दुनिया के किसी हिस्से या किसी समय में किसी भाषा में ऐसी और इससे भी ज्यादा घातक और घृणित कहावतों का नाला कभी सूखा नहीं रहा है। लेकिन, इस संदर्भ में सर्वाधिक चिंता का विषय यह है कि आज भी ऐसे बजबजाते नालों का जीवन के हर क्षेत्र में बहने का ही नहीं, बल्कि ऐसे ही कुछ नए-नए नालों के जनमने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। ०

