अरविंद तिवारी
कालू ने जब अपनी वेतन की स्लिप देखी, तो उसे समझ में नहीं आया कि पचास रुपए उसके वेतन से क्यों कटे। बैंक से वह पूरा वेतन निकाल लाया, पर पचास रुपए की कटौती उसे साल रही थी। चतुर्थ श्रेणी कमर्चारी के लिए पचास रुपए मायने रखते थे। उसने देखा था कि मुख्यमंत्री आवास पर जो पीए बैठता था, लोग उसकी जेबें नोटों से भर देते थे। उन्हें अपने केस की फाइल में सिर्फ मुख्यमंत्री के हस्ताक्षर चाहिए होते थे। खुद मुख्यमंत्री की संपत्ति में दो वर्ष के दौरान पचास गुना इजाफा हो गया था, ऐसे आरोप विपक्ष लगा चुका था, जो बड़े-बड़े अखबारों में भी छपे थे। मुख्यमंत्री आवास में होते हुए भी कालू को कभी किसी ने ‘टिप’ नहीं दी थी, जबकि उसने तरह तरह के मेहमानों के चाय-नाश्ता कराया था। टिप नहीं मिली कोई बात नहीं, पर मेहनत की जो तनख्वाह मिल रही है, उसमें से भी कटौती! पचास रुपए बाबुओं, अफसरों और मंत्रियों के लिए कुछ नहीं होते, पर कालू जैसे चतुर्थ श्रेणी के कमर्चारी के लिए बहुत कुछ होते हैं। पचास रुपए में गुड़िया की चप्पल आ जाती। पचास रुपए में पत्नी के ब्लाउज का कपड़ा आ जाता।

मुख्यमंत्री आवास पर काम करते हुए कालू को पंद्रह साल हो गए। इन पंद्रह सालों में छह मुख्यमंत्री उसने देख लिए। कुछ तो इतने भले थे कि रोज उसका हाल-चाल पूछते और यह भी कहते कि कोई काम हो तो बताना। कालू ने अपने गांव के फतेसिंह का तबादला मुख्यमंत्री जी से कहकर गृह जिले में करवा दिया था। फतेसिंह ठाकुर थे, जबकि कालू कुशवाह। गांव में ठाकुरों का दबदबा था। कई तरह के दबावों में पिछड़ी जातियां रह रहीं थीं। कालू, फतेसिंह से उम्र में बड़ा था, पर खुद ही अपनी ओर से ‘जोहार’ करता था। पर तबादला हो जाने के कारण अचानक फतेसिंह का व्यवहार बदल गया था।

पिछली दीपावली पर जब कालू गांव गया तो फतेसिंह ने सबके सामने उसके पैर छू लिए थे। ठकुराइन भड़क गई थी। शाम को दारू पीकर फतेसिंह ने अपनी बिरादरी को गरियाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।

‘अरे नामर्दों तुम काहे के ठाकुर हो। जाटव मंत्री से काम निकलवाने के लिए उसके पैर छू लेते हो। वह युवा मंत्री तुम्हारे बेटों की उम्र का है। मैंने गांव के कालू भैया के पैर छू लिए तो तुम्हारी नाक कट गई।…’
‘तुम्हारी नाक उस समय नहीं कटी जब ठाकुर की बेटी खटीक के बेटे के साथ भाग गई थी।’
ठाकुरों ने समझ लिया आज फतेसिंह उनके पुरुखों की इज्जत मिट्टी में मिला कर रहेगा। ठाकुरों ने फतेसिंह से मांफी मांगकर उसे घर के भीतर कर दिया।

मुख्यमंत्री अलग-अलग स्वभाव के होते हैं। एक मुख्यमंत्री तो कालू की पत्नी पर ही बुरी नजर रखने लगा था। कालू समझ गया और पत्नी को गांव भेजकर खुद अस्पताल में भर्ती हो गया। अस्पताल से लौटकर तीन महीने की छुट्टी पर चला गया। इन तीन महीनों में ही उस रसिया मुख्यमंत्री की छुट्टी हो गई थी।

कालू की पत्नी को जब पता चला कि कालू के वेतन से पचास रुपए कट गए, तो वह मुख्यमंत्री आवास के अफसरों और बाबुओं को कोसने लगी। ‘नाशपीटो! तुम्हारे कीड़े पड़ें! तुम्हारे वंश का नाश हो। पचास रुपए काट लेते हो तो गू क्यों नहीं खा लेते।’ कालू ने किसी तरह से उसे चुप कराया।

दूसरे दिन उसने बिल बनाने वाले बाबू से संंपर्क किया। बाबू पहले तो कालू से बेगार करवाता रहा, फिर जानकारी दी, ‘पिछले महीने तुम्हारे हाथ से जो चाय का कप टूट गया था, उसकी रिकवरी के पचास रुपए कटे हैं। मुख्यमंत्री आवास का कोई कप सौ रुपयों से कम का नहीं है, इसलिए खैर मनाओ कि रिकवरी सौ रुपयों की नहीं हुई है।’ कालू ने भोलेपन से पूछा, ‘बाबूजी सही-सही बताना, सरकारी निवास, सर्किट हाउस आदि में कभी कप नहीं फूटे। अगर फूटे तो क्या उनकी भी रिकवरी होती रही है।’

बाबू मुस्कराते हुए बोले, ‘देखो कालू! अगर कप फूटेंगे नहीं, तो कप बनने वाली फैक्ट्रियां बंद हो जाएंगी। इसलिए राज्य के विकास के लिए कपों का फूटना अपरिहार्य है। अगर फोर्थ क्लास से नहीं फूटे, तो अधिकारी अपने हाथ से फोड़ देंगे, क्योंकि हर साल उनकी खरीद भी तो होनी है वरना बजट लैप्स हो जाएगा। रही बात रिकवरी की तो यह पहली बार हो रहा है कि फोर्थ क्लास से रिकवरी हो रही है। दिल्ली का आदेश है कि खर्चों पर लगाम लगाई जाए, उसी निर्देश के तहत तुम्हारी रिकवरी की गई है। मुख्यमंत्री इस मामले में सख्त हैं।’

कालू मुख्यमंत्री आवास की शानो-शौकत देख चुका था। रोज-रोज छप्पन भोग बनते थे। उनमें कोई कटौती नहीं, पर फोर्थ क्लास से कप फूटने पर रिकवरी! उसे महात्मा गांधी और शहीदों पर गुस्सा आ रहा था, ऐसी आजादी के लिए वे कुर्बान हो गए! पंद्रह साल की नौकरी में उसने बीसियों कप फोड़े होंगे। मगर कभी उनकी कीमत की वसूली नहीं हुई। आठवीं पास कालू यह नहीं समझ पा रहा था, पचास रुपयों से दिल्ली के आदर्शों को कैसे प्राप्त किया जा सकता है।

इस घटना को बीस दिन बीत गए। कालू का मन काम में नहीं लगता था। सावधानी कितनी भी रखो क्राकरी टूटती ही है। इसी तरह वेतन से कटौती होती रही तो घर कैसे चलेगा। जब कालू का तनाव कम नहीं हुआ तो उसने अपने मन की बात, गोपी को बता दी। मुख्यमंत्री आवास में गोपी ही ऐसा फोर्थ क्लास था, जो कालू के दुख-दर्द में काम आता था। गोपी तीस सालों से मुख्यमंत्री आवास में था और रिटायर होने वाला था। उसने कई दलों के मुख्यमंत्री देखे थे। गोपी आज भी विपक्षी नेताओं के मुंह लगा था। गोपी ने कप के दाम वसूली की सूचना विपक्ष के बड़े नेता को दे दी।

छुट्टी के बाद एक दिन जब कालू मुख्यमंत्री आवास में बने अपने ‘हाउस हट’ में पहुंचा तो वहां तीन पत्रकार उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। पत्रकार उसकी पे-स्लिप की कॉपी चाहते थे। वे बार-बार पचास रुपए की रिकवरी की बारे में पूछ रहे थे, लेकिन कालू कुछ भी बताने को तैयार नहीं था। एक पत्रकार ने कालू को उसकी बेटी गुड़िया की कसम दे दी, तो उसे सच बताना पड़ा। कालू के गांव में कसम का बहुत महत्व था, साथ ही गंगाजली का भी। हालांकि गांव के रसूखदार लोग गंगाजली के सहारे झूठ भी बोलते थे, पर कालू कसम और गंगाजली दोनों को मानता था।

दूसरे दिन राज्य के प्रमुख अखबारों में कालू की रिकवरी के चर्र्चे थे। विपक्ष के नेताओं से लेकर आम आदमी तक मुख्यमंत्री को दोषी बता रहा था। पत्रकारों ने कालू पर इतनी कृपा जरूर की कि उसका फोटो अखबारों में नहीं छापा। मुख्यमंत्री को जब इस विरोध और अखबारबाजी का पता चला तो उन्होंने कालू को सस्पेंड कर दिया। कालू ने बहुत हाथ-पांव जोड़े, पर मुख्यमंत्री जी नहीं पिघले। कालू के निलंबित होने और उसके पीछे कप फूटने की कहानी राष्ट्रीय अखबारों में भी छप गई।

उन दिनों राज्य में शांति थी। न कहीं मॉब लिंचिंग हो रही थी और न कहीं दंगा। न बाढ़ आई थी और न अकाल पड़ा था। न कहीं बंद बुलाया जा रहा था और न हड़ताल हो रही थी। बलात्कार में अव्वल रहने वाले उस राज्य में उन दिनों बलात्कारी छुट्टी पर चल रहे थे। जाहिर है कि विपक्ष को बैठे-बिठाए कालू का मुद्दा मिल गया। विपक्षी नेताओं ने कालू की पीठ ठोंकी और उसे दिलासा दिया कि पूरे राज्य की जनता तुम्हारे साथ है। बड़े आंदोलन की रूपरेखा तैयार हो गई। मुख्य विपक्षी दल जो राज्य में अपनी प्रासंगिकता खो चुका था, अचानक हरकत में आ गया।

दूसरे दिन राजधानी के रामलीला मैदान में विशाल रैली हुई, जिसमें सभी विपक्षी दल एक साथ खड़े देखे गए। सियासी दलों के अलावा राज्य कर्मचारी यूनियन के नेता भी उस रैली में शामिल थे। राज्य भर के कर्मचारी बसों में भरकर रैली स्थल पर पहुंचे थे। इसके बाद पूरे राज्य के कर्मचारी हड़ताल पर चले गए। कप की रिकवरी का मुद्दा और कालू का निलंबन देश-विदेश के मीडिया की सुर्खियां बन गया। अन्य राज्यों के कर्मचारियों ने भी कालू के समर्थन में एक दिन की सांकेतिक हड़ताल कर दी। मुख्यमंत्री की पार्टी के असंतुष्ट नेता आलाकमान से मुख्यमंत्री की शिकायत करने दिल्ली कूच कर गए। आलाकमान ने मुख्यमंत्री को तत्काल दिल्ली तलब कर लिया।

मुख्यमंत्री जब दिल्ली से लौटे तो उनका मुंह लटका हुआ था। इस बार वे अपने निवास के अदना से कमर्चारी से मात खा गए थे। दिल्ली से लौटकर उन्होंने कालू के निलंबन को रद्द करते हुए उसे नौकरी पर बहाल कर लिया और मंत्रिमंडल की एक उपसमिति बना दी, जो कालू के प्रकरण की जांच करेगी। इस जांच में उन परिस्थितियों का भी पता लगाया जाएगा, जिनके बरक्स मुख्यमंत्री आवास का कीमती कप टूटा था। यदि कालू दोषी नहीं पाया गया तो उसके पचास रुपयों की कई गई रिकवरी रद्द कर दी जाएगी। कालू को पचास रुपए लौटा दिए जाएंगे।

कमर्चारी नेताओं ने आंदोलन वापस नहीं लिया। उनका तर्क था कि राज्य के सभी मंत्री मुख्यमंत्री के चमचे हैं, अत: कालू के साथ न्याय नहीं हो पाएगा। सचिवालय से लेकर जिलाधिकारी के दफ्तर के सामने घटना प्रदर्शन बदस्तूर जारी था। तीन दिनों तक मुख्यमंत्री जी को नींद नहीं आई। ऐसा ऊहापोह तब भी नहीं था, जब उन्हें मुख्यमंत्री पद की शपथ से पहले अपनी ही पार्टी के नेताओं का विरोध झेलना पड़ा था। वे दौड़े-दौड़े फिर दिल्ली गए। हाईकमान ने उन्हें सख्त संदेश दिया कि कालू वाली समस्या खुद सुलझाओ या फिर कुर्सी छोड़ने के लिए तैयार रहो।

अगले ही दिन राज्य की राजधानी में एक बड़ा पत्रकार सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें मुख्यमंत्री ने कालू की रिकवरी के पचास रुपए तत्काल लौटाने की घोषणा की। रिकवरी के पैसे किससे वसूले जाएं, इस बाबत मुख्यमंत्री ने पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक आयोग भी गठित कर दिया। आंदोलन समाप्त हो गया, लेकिन कालू को पचास रुपए प्राप्त करने से पहले एक शपथपत्र पर हस्ताक्षर करने पड़े; जिसमें लिखा था यदि कप फोड़ने के लिए आयोग कालू को जिम्मेदार मानेगा, तो उसे पचास रुपए जमा कराने होंगे।

आयोग के कार्यक्षेत्र में कप के निर्माण की प्रक्रिया से लेकर कालू के हाथ से कप गिरने तक का विस्तृत जांच क्षेत्र था। इस संबंध में उस कप फैक्ट्री के मालिक को समन भेजा गया, जिसके यहां कप बना था। फैक्ट्री का मालिक घबरा गया। जब आयोग ने फैक्ट्री से कप के रॉ मेटेरियल का सैंपल मांगा, तो फैक्ट्री के मालिक को दिल का दौरा पड़ गया। किसी तरह डॉक्टरोंं ने उसे बचा लिया। इस बीच, आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों ने राजधानी के पॉश इलाके में नए फ्लैट खरीद लिए। छह माह पूरे होने के बाद भी आयोग ने सरकार को अपनी रिपोर्ट नहीं दी, तो सरकार ने मजबूरी में आयोग का कार्यकाल छह माह और बढ़ा दिया।

अगले छह माह रिपोर्ट को फेयर करने में बीत गए। डेढ़ साल बाद आयोग ने सरकार को अपनी रिपोर्ट पेश कर दी। एक संवाददाता सम्मेलन में मुख्य सचिव ने आयोग की रिपोर्ट को सार्वजनिक कर दिया। इस रिपोर्ट में कप निर्माण की प्रक्रिया से लेकर मुख्यमंत्री निवास की कप खरीदने की प्रक्रिया में कोई खामी नहीं थी। अत: कप फूटने के प्रकरण में कालू को उत्तरदायी ठहराया गया।