देवी-देवताओं को घर-घर पहुंचाने का काम राजा रवि वर्मा ने किया। पुस्तकों, कैलेंडरों और दीवारों पर देवी-देवताओं का जो रूप आज दिखाई देता है, वह राजा रवि वर्मा की कल्पना का ही नतीजा है। केरल के किलिमानूर में जन्मे राजा रवि वर्मा को मालूम था कि भारत की आत्मा धार्मिक ग्रंथों और महाकाव्यों में बसती है। इसलिए उन्होंने उन ग्रंथों के चरित्रों के चित्र बनाए। सरस्वती और लक्ष्मी के चित्र भी उन्होंने ही बनाए थे। वे पहले ऐसे चित्रकार थे, जिन्होंने भगवान को इंसान का चेहरा दिया।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
राजा रवि वर्मा ने अपना हुनर पांच साल की उम्र में ही दिखाना शुरू कर दिया था। उन्हें जो भी दिखता उसका चित्र बनाने लग जाते। रवि वर्मा के चाचा भी चित्रकार थे। रवि वर्मा जब चौदह साल के थे तब उनके चाचा उन्हें अपने साथ एक राजभवन में ले गए। वहां उन्होंने दीवार पर एक चित्र बनाया। थोड़ी देर के लिए चाचा कहीं चले गए। जब वापस आए तो देखा कि भतीजे ने पूरे चित्र में रंग भर कर पूरा कर दिया है। यह कलाकारी देख कर चाचा को लगा कि यह चित्रकार बनेगा। चित्रकारी में प्रारंभिक शिक्षा उनके चाचा ने ही दिलाई। बाद में वे राजा रवि वर्मा को तिरूवनंतपुरम ले गए, जहां उन्होंने तैल चित्रण की शिक्षा ली। उन्होंने कला शिक्षा के लिए बड़ौदा, मैसूर आदि अन्य राज्यों की यात्रा की। उन्होंने पहले यूरोपीय कला का अध्ययन किया। मदुरै के चित्रकार अलाग्री नायडू और विदेशी चित्रकार थियोडोर जेसन से चित्रकला के गुर सीखे।

ईश्वर से हटाया पहरा
रवि वर्मा ने जब अपनी कल्पनाशक्ति से देवी-देवताओं को इंसान का रूप दिया, तो हर घर में ईश्वर पहुंच गए। इस तरह उन्होंने भगवान पर पहरा हटाया। उन्होंने अपने चित्रों को आमजन तक पहुंचाने के लिए प्रेस का गठन भी किया। उन्होंने 1894 में विदेश से कलर लिथोग्राफिक प्रेस खरीद कर मुंबई में लगाई। अपने चित्रों को बेचना शुरू कर दिया। वायसराय और भारत के गर्वनर जनरल द्वारा रवि वर्मा को राजा की उपाधि दी गई। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें केसर-ए-हिंद से भी नवाजा।

तैलरंग चित्रकारी में माहिर
राजा रवि वर्मा तैलरंगों से चित्रकारी में माहिर थे। उनके जैसा आयल पेंटिंग बनाने वाला चित्रकार उस समय कोई नहीं था। वे पोर्ट्रेट बनाने में भी निपुण थे। उन्होंने महाराणा प्रताप का एक पोर्ट्रेट बनाया था, जो उनका सवश्रेष्ठ रहा।

विवादों के बीच
राजा रवि वर्मा की कई तस्वीरों को लेकर विवाद भी हुआ। उनके चित्रों में अधिकतर दक्षिण की महिलाएं हैं। राजा रवि वर्मा विवादों में इसलिए फंसे, क्योंकि उनकी चित्रकारी में रंभा, उर्वशी जैसी अप्सराएं अर्द्धनग्न अवस्था में दिखाई गई थीं। कई लोगों ने इसे हिंदू धर्म का अपमान माना। इसे लेकर रवि वर्मा पर मुकदमे चले। रवि वर्मा पर यह भी आरोप लगता है कि उन्होंने सरस्वती और लक्ष्मी जैसी हिंदू देवियों के जो चित्र बनाए थे उसमें उनकी प्रेमिका सुगंधा का चेहरा देवियों से मिलता है। 2014 में आई फिल्म ‘रंगरसिया’ राजा रवि वर्मा के जीवन पर ही बनी है, जिसमें सुगंधा के बारे में भी दिखाया गया है। गुजरात स्थित लक्ष्मीविलास महल के संग्रहालय में उनके चित्रों का बहुत बड़ा संग्रह है।

निधन : 2 अक्तूबर, 1906 को राजा रवि वर्मा ने दुनिया से अलविदा कह दिया।