नेताओं से लेकर अभिनेताओं तक के आजकल देश की चिंता करने के आयाम बदल गए हैं। उनमें अपनी सेहत बनाने, भुजदंड फड़काने और छह ‘एप्स’ का प्रदर्शन करने का मुकाबला शुरू हो चुका है। पहले एक अभिनेता अपने शरीर सौष्ठव का प्रदर्शन करने का वीडियो डालता है, जवाब में नेता अपने दंड पेलते शरीर का चित्र स्क्रीन पर डाल देता है। एक नेता कुर्सी के बाजुओं पर उठक बैठक करते अपनी बाहों की मछलियों का प्रदर्शन करते हैं, तो एक लोकप्रिय खिलाड़ी अपने घरेलू जिम में कठिन मशीनों पर व्यायाम करता दिखाई देता है।
सत्ता के प्राचीरों से लेकर अभिनेताओं के रंगमहलों तक आजकल एक ही नारा गूंजता सुनाई देता है, ‘बंधु, हम फिट तो इंडिया हिट’। यानी हमारी सेहत ठीक रहेगी, तो हम जनता की खिदमत में अपनी सेहत खपा सकेंगे। अगर घोड़ा ही बीमार हो गया तो वह अपने ऊपर लदी हुई सवारियों को लेकर भागेगा कैसे?
इसलिए आज का युगसत्य है कि पहले अपने नेता जी की सेहत संवार लो, इसके बाद वह आपकी भूख, बीमारी और बेकारी की चिंता शुरू करेंगे।
अब नेता की सेहत सुधारने का मसला जरा टेढ़ा है। अच्छी सेहत से पहले उनका हृदय प्रसन्नचित्त होना चाहिए, उनका मिजाज दुरुस्त रहे। इसके लिए घपलों-घोटालों को नेस्तनाबूद कर देने के दावे के बावजूद उनके घरों में नोटों की डलिया आने के उत्सव त्योहार बंद नहीं होने चाहिए। अब तो आभासी मुद्रा का भी नया धंधा शुरू हो गया। लिया दिया कुछ भी नहीं, और नेता और अभिनेता देखते ही अरबपति हो गए। लेकिन अगर कहीं दांव उल्टा पड़ गया और यह महानुभाव अरबपति से रोडपति हो गए, तो फिर उनकी सेहत सुधरने का भविष्य धूमिल है। यह सही है कि अपने प्रशस्ति गायन में यह अवश्य कहा जा रहा है कि हमारी शासनावधि में हमारे दामन पर भ्रष्टाचार का एक भी दाग नहीं लगा। हां, हमारे बेटों, पोतों की आय अवश्य आश्चर्यजनक ढंग से हजारों गुणा बढ़ गई। कैसे?
अब इसमें हमारे शासक दल का अध्यक्ष होने का कोई योगदान है, आपकी छीछालेदार, कोरी वितंडावाद है। आखिर लड़के का अपना भाग्य और अपना परिश्रम भी कोई चीज है। करवानी है तो उसके ‘अच्छे नसीब’ की जांच करवाओ। किस माई के लाल के पास वह ठंडा बस्ता है, जो ऐसी जांच का साहस भी कर सके?
इसलिए अपने विरोधियों के आरोपों को ठंडे बस्ते की जांच की चुनौती देकर नेता अपनी सेहत बनाने के अभियान में जुट गए। छप्पन इंच के सीने का सपना देखते-देखते उनकी कमर का घेरा छप्पन इंच हो गया। अब उसे वर्जिश करके बत्तीस इंच पर लाना है। रुपए के ताप से उनके खून का दबाव ऊपर दो सौ और नीचे डेढ़ सौ रहने लगा, अब उसे योग, अध्यात्म और मेडिटेशन से ऊपरी एक सौ बीस और निचला अस्सी पर लाना है। जब तक यह नहीं हो जाता तब तक यह नेता-अभिनेता या खिलाड़ी के मुकाबले हम फिट की प्रतिस्पर्धा कैसे जीतें? मुकाबला नहीं जीतेंगे, तो हमारा भारत एक महान हिट कैसे होगा?
अब जिन युग पुरुषों का इतिहास ही नहीं, भूगोल भी गलत है, जितनी चाहे कसरत कर लें, उनकी तोंद को पीछे हटते देर लगेगी। बस यही बीच का समय तो देश का संक्रांति काल है, जिसमें जो जैसा है, वैसा ही रहेगा। नेता का बेटा नेता और करोड़पति का बेटा अरबपति, लेकिन गरीब का बेटा तो भूख से ही मरेगा।
देश का भाग्य संवारने की चिंता में नेताओं को अपनी सेहत के धीमे सुधार की चिंता खाए जा रही है। जनाब अकबर इलाहाबादी भी उनकी असलियत बता कर शर्मिंदा हो गए कि ‘हाकिम को रियाया की बहुत चिंता है अपना डिनर खाने के बाद।’
आजादी के सत्तर वर्ष बीत गए, हमारे आला हुजूर का यह डिनर खत्म होने में ही नहीं आया और इधर पूरा देश भुखमरी से मरने वाले देशों की सूची में और भी नीचे और भी रसातल में चला गया। जितने प्रतिशत लोग योजनाबद्ध आर्थिक विकास की शुरुआत में गरीबी रेखा से नीचे निर्धनता से परेशान मंदहाल थे, आज भी उतने ही हैं। जितने बच्चे इस देश में जन्म लेने के पहले पांच बरसों में कुपोषण से मर जाते थे, आज उससे अधिक मरने लगे, क्योंकि आबादी बढ़ गई है। पढ़े-लिखे नौजवान नेताओं के निर्देशानुसार पकौड़े या पान बेचने के बावजूद अर्ध बेकारी के अवसाद से बाहर न आ सके। यह कृषि प्रधान देश शर्मिंदा हो गया, क्योंकि यहां पहली हरित क्रांति की मौत के बाद दूसरी हरित क्रांति ने जन्म लेने का साहस ही नहीं किया।
आज देश के नेता ऐसी विकट स्थिति का मुकाबला करने के लिए दंड पेल रहे हैं। जितनी हो सके कसरत करो, बदन चुस्त ही नहीं होगा, तो भारत हिट कैसे होगा। इसीलिए अब देश को नारों की उत्तेजना, जुमलों की चेतना और नाटकीय भाषणों की संचेतना में जीने की आदत हो गई। इस आदत से नेता तो शायद अगले शासन पारी में फिट हो जाएं, लेकिन आम आदमी के अच्छे दिनों का जो गुड़-गोबर हो गया, उसकी खोज-खबर कौन लेगा?
सुरेश सेठ

