आधुनिक काल के पुनर्जागरण ने मानवजाति की सोच को उसकी वास्तविक जमीन प्रदान करते हुए पार्थिव बनाया। हम सूर्य केंद्रित सोच और समझ को पीछे छोड़ कर पृथ्वी को अपना वास्तविक घर मानने और उसे बेहतर बनाने का प्रयास करने की ओर आए। इस काम में विज्ञान ने हमारी मदद की। सूर्य को केंद्र से हटाने का मतलब था, ईश्वर, देवता और चेतना को केंद्र से हटाना और उनकी जगह मनुष्य, प्रकृति और पदार्थ को केंद्र में लाना। इसका मतलब था, एक नई मूल्य व्यवस्था को जन्म देना। ईश्वर, देवता और चेतना को अपना केंद्र मानने से जुड़े मूल्य हमें सार्वभौम ब्रह्मांड का नागरिक बनाते थे। वे हमें हमारे पार्थिव और दैहिक अहंकार से बाहर निकाल कर ईश्वर, देवता और चेतना से उद्भूत प्रेम और करुणा को हमारे मानवीय होने का हेतु बनाते थे। लेकिन इससे अतार्किक और अवैज्ञानिक सोच भी पैदा होती थी। ईश्वर, देवता और चेतना का अमूर्त्तन उसे प्रतीकात्मक बनाने लगता था। फिर उस प्रतीक को ओढ़ कर राजा, पुरोहित, ब्राह्मण और धनी महाजन ताकतवर हो जाता था। इन वर्गों के वर्चस्व से पैदा होने वाली निरंकुशताएं अन्याय, असमानता, दमन और शोषण के विविध रूपों को जन्म देती रही हैं।
यह उन दिनों की बात है, जब पृथ्वी के बजाय, सूर्य को उसके इर्द गिर्द घूमने वाला माना जाता था। सूर्य हमारी आत्मा या ईश्वर का प्रतीक हो गया था। इससे लगता था कि हम ईश्वर की संतान हैं और वह हमारे पिता की तरह हमारे आसपास घूमता है। इससे राजशाही और सामंतवादी व्यवस्थाएं पैदा हुर्इं। मगर आधुनिक काल में हम खुद केंद्र में आ गए। अब हम खुद ईश्वर होकर विश्व के स्वामित्व का सपना देख सकते थे। उसके लिए हमें अब किसी ईश्वर की कृपा की जरूरत नहीं रह गई थी। हमारा पार्थिव, भौतिक और दैहिक अस्तित्व केंद्रीय हो गया था और वही हमारी चेतना के रूपों का उत्पादन करने लगा था। पृथ्वी अब सूर्य के इर्द गिर्द घूम रही थी। यानी अब यह हमारी जिम्मेवारी थी कि हम अपने स्रोत तक कैसे पहुंचते हैं। बात उलट गई थी। अब हम पृथ्वी के नागरिक की तरह ब्रह्मांड के सफर पर निकलने के लिए कमर कस रहे थे।
जाहिर है कि यह तब्दीली हमसे आग्रह कर रही थी कि हम अपने ज्ञान के स्रोतों की ओर नई दृष्टि से मुड़ें और उनकी मनुष्य या जनकेंद्रित व्याख्या करें। अब हमें प्रेम और करुणा वाले अपने मानवीय सार को ईश्वर की कृपा से नहीं, अपने व्यवहार और अपनी नई व्यवस्था के भीतर से पैदा होने वाली जरूरत की तरह खोजना था। यह काम हमें इसलिए करना था, ताकि हम अपने ज्ञान के स्रोतों से दूर भी न हो और उन्हें सामंती समाज व्यवस्था को वापस लाने वाले पुनरुत्थान का शिकार होने से भी रोक सकें।
हमसे गलती कहां हुई? गलती यह हुई कि हमने अपने ज्ञान के स्रोतों को शाश्वत सत्य का पर्याय मान लिया और उन्हें आधुनिक वैज्ञानिक भौतिकवाद के आध्यात्मिक विकल्प की तरह ज्यों का त्यों अनुकरणीय बनाए रखा। हम अपनी परंपरा की वैज्ञानिक व्याख्या के लिए राजी नहीं हुए। हमें लगा कि विज्ञान अभी वहां तक पहुंच ही नहीं पाया है, जहां हम सदियों पहले पहुंच गए थे।
इस तरह हमने अपनी पराजय और गुलामी के कारण वहां नहीं खोजे, जहां वे थे। हमने ऐसा करके अपनी बहुत-सी कमजोरियों पर पर्दा डाले रखा। नतीजतन, हम आज भी पुनरुत्थानवादी होकर खुद को विश्वगुरु मानते रहने के मिथ्या दावे कर रहे हैं। इससे हम अपने जमीनी स्रोतों से आने वाली अपनी उस सांस्कृतिक चेतना और ऊर्जा को खो देते हैं, जो हमें मौलिक विकास करने लायक बना सकती है। हमें अगर विकास के अपने वैकल्पिक मॉडल को खड़ा करने की प्रेरणा कहीं से मिल सकती है, तो वे हमारे अपने वही ज्ञान के स्रोत हैं, जिन पर सांस्कृतिक भक्तिवाद ने पर्दा डाल कर ढक रखा है।
अपनी परंपरा को अपने समय से आगे मानने वाले अपने उस अतीत की ओर देख रहे हैं, जिसमें हमने अपनी मौलिक उत्पादन पद्धतियों और विज्ञान शिल्पगत विद्याओं के सहारे अपनी व्यापारिक पूंजी का अद्वितीय विकास किया था। उसके पीछे अनेक विद्याओं यानी उत्पादन पद्धति मूलक तकनीकों की बड़ी भूमिका थी। उनमें प्रकृति के जमीनी अनुसंधानों पर आधारित आयुर्वेद, धातु विज्ञान और उस पर आधारित अस्त्र-शस्त्र विद्याएं, देह विज्ञान पर आधारित प्राण विद्या तथा योग विद्या और ज्योतिर्विज्ञान यानी खगोलविज्ञान पर आधारित ऋतुचक्र संबंधी भविष्यवाणियों के द्वारा कृषि सभ्यता का विकास मुख्य हैं। परवर्ती समय में यह ज्योतिर्विज्ञान, लोगों को भ्रम में डालने वाले ज्योतिष शास्त्र में तथा योग, तंत्र मंत्र के कर्मकांड में बदल गया। इस तरह अध्यात्म से निकले पाखंडपूर्ण अमूर्तन ने भारत के वैज्ञानिक आधार वाली विद्याओं को अपनी जमीन से अपदस्थ कर दिया। वेदों में मधुसंचय वाली वन संस्कृति का मधुविद्यामूलक देव संस्कृति तक के विकास के सफर को देखा जा सकता है।
देवजन मधु, घृत, समिधा, अन्न से जुड़ी आर्य या ऋषि संस्कृति के रूप में कृषि सभ्यता के विकास का हेतु हुए थे। यहां तक का भारतीय संस्कृति का विकास यथार्थ के तीन रूपों के सामंजस्य से पैदा हुआ था, जिन्हें आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक क्षेत्रों के रूप में देखा गया था। स्पष्ट है कि तब भौतिक यथार्थ हमारी आध्यात्मिक चेतना की भूमि की तरह आया था। इन दोनों के बीच पुल का काम करते थे प्रकृति के विविध रूपों के पर्याय देवता। वहां कबीलाई दौर की सभ्यता का ‘सहभागिता’ के आधार पर सांस्कृतिक सामंजस्य घटित हुआ था। इसे हम वेदों के ‘संहिता’ होने के निहितार्थ की तरह देख सकते हैं। इसी से ‘देवाभागम् यथापूर्वे’ वाली सहभागी देव संस्कृति प्रकट हुई। उसका व्यवहारमूलक मूलमंत्र था- ‘संगच्छध्वम्’ और प्रेरक चेतना मूल्य था- ‘शिवसंकल्पमस्तु’। सहभागी एकजुटता और जनकल्याण वाला हमारा वह समाज अगर अद्वितीय विकास कर सका, तो उसमें किसी को आश्चर्य कैसा?
बाद में इस देवसंस्कृति का पतन हुआ, तो उसके कारण भी चिह्नित हो सकते हैं। वैदिक काल में ‘यस्य छाया अमृतम् तस्य मृत्यु’ के रूप में शाश्वत की भी परिवर्तनीयता को सृष्टि का मूल नियम मानने वाला भारत, अपने परवर्त्ती ब्राह्मणवादी उत्तरकाल में इस सोच और समझ को उलट देता है। वह माया यानी भौतिक यथार्थ को क्षणिक और मृत्युमय होने के कारण ‘मिथ्या’ घोषित कर देता है और सत्य को अमृतमय ‘शाश्वत’ मान कर उसकी साधना करने लगता है। इस तरह वह ऐसे ‘सनातन धर्म’ को बनाने बचाने लगता है, जो सभी परिवर्तनों से ऊपर होता है। यह अवैज्ञानिक दृष्टिकोण था, जो अतत: हमारे पतन की आधारभूमि बना।
वेदों के समय तथा बाद में उपनिषद काल के सह-समांतर दर्शन काल में परिवर्तन की बात केंद्र में रही। तब यह सवाल उठा था कि भौतिक जगत के तमाम परिवर्तनों के बावजूद क्या हम ऐसी चेतना को उपलब्ध हो सकते हैं, जो नष्ट नहीं होती। जीवन के परिवर्तन चक्र का अंत मृत्यु में होना निश्चित था। इसलिए यह विचार बार-बार सामने आया है कि क्या मृत्यु के बावजूद हम चेतना के किसी आंतरिक रूप में मरने से बच सकते हैं या नहीं? यह दर्शन आरंभ में ‘दर्शन की अनुभूति’ तक सीमित था, जिसे ‘देखते हुए जानने’ की दशा कहा जाता था। बाद में यह अनुभूति, अनुभूति भर न रह कर एक यथार्थ वस्तु यानी ‘आत्मा’ के दर्शन में बदल गई। पर सांख्य, न्याय, योग आदि दर्शनों के अलावा बौद्ध, जैन तथा चार्वाक दर्शन इस आत्मा और ब्रह्म के बारे में या तो मौन रहते हैं या उनके अनुभूतिमूलक रूप तक खुद को सीमित रखते हैं। इसलिए वे ‘बहुत-सी अनुभूतियो’ की बात करते हुए आत्मा और ब्रह्म के बारे में अनिश्चय को बनाए रखना बेहतर समझते हैं। इनकी बजाय वे मुख्यत: जीवन और भौतिक संसार के परिवर्तन चक्र में मौजूद क्षणिकता के सवाल से मुखातिब होते हैं। वे हमें बताते हैं कि इस क्षणिकता के अर्थ को जानने वाला व्यक्ति ‘साक्षी भाव’ को उपलब्ध हो सकता है। तथापि एक ‘भावदशा’ को ‘आत्मा’ कहना अधिकतर दार्शनिकों के यहां दिखाई नहीं लेता।
बौद्ध दार्शनिकों ने आत्मा की मौजूदगी से इंकार किया था, पर बाद में वेदांत दर्शन ने ब्रह्म को सारे परिवर्तनों से परे मौजूद अविकारी अस्तित्व की तरह देखा। वेदांत ने मनुष्य में ऐसी आत्मा की मौजूदगी पर मुहर लगा दी, जो ब्रह्म से तादात्म्य होने की स्थिति में सनातन या शाश्वत चेतना को उपलब्ध हो सकती है। इस विचार के आ जाने के बाद जगत की क्षणिकता की ओर से ध्यान हटा कर उसे माया कहने और फिर विकार तक कह कर उससे बचने की बातें होने लगीं। यह विचार हमारे दर्शन को उस वैज्ञानिक आधार के विरोध में ले गया, जिसकी जमीन भौतिक संसार में थी और जो जगत की क्षणिकता या परिवर्तनशीलता की तर्कसंगत मीमांसा करके भौतिक और आध्यात्मिक, दोनों तरह का विकास एक साथ कर सकता था। पर वास्तविक संसार को ही हमारे यहां माया का नकारात्मक खेल बना दिया गया। हम ऐसे ब्रह्म की ओर देखने लगे जो हमें मृत्यु के पार नहीं ले जाता था, अपितु जगत की परिवर्तनशीलता से परे अपनी मौजूदगी के द्वारा प्रसाद या कृपा के रूप में हमें कुछ भी दे सकता था।
देवताओं और अवतारों को यह रूप हमारे पुराणकाल में प्रदान किया गया। इस तरह यह विचार पैदा हुआ कि इस दुनिया में भक्ति ही पर्याप्त है, उससे आप बिना पुरुषार्थ किए कुछ भी पा सकते हैं। इस तरह पुराण काल की भक्ति अवैज्ञानिक, न्याय-विरोधी और तर्क-विरोधी विचार पद्धति के रूप में हमारे यहां स्थापित हो गई।
अब हम इस बात को ठीक से समझ सकते हैं कि कैसे और क्यों भक्ति की विचारधारा की ओर रुख करता हुआ भारत धीरे-धीरे अपने विश्व गुरु के पद से नीचे आ गिरता है। फिर वह ज्ञान के क्षेत्र में दुनिया की अगुआई करने के बजाय भक्ति से जुड़ी सांस्कृतिक गुलामी की मानसिकता का शिकार होकर रह जाता है।
विनोद शाही

