भारतीय संस्कृति के रक्षक, पुरातनपंथी ठेकेदारों ने वैलेंटाइन को पश्चिमी अपसंस्कृति करार दिया और युवाओं को इससे बचाने के लिए साम दाम दंड की नीति अपनाई। प्रेमी युवाओं के बीच वैलेंटाइन डे को ‘रक्षा-बंधन’ में बदलवाने की भरपूर कोशिश की। डराया, धमकाया, ठोंक पीट भी की। पार्क, रेस्तरां और अन्य सार्वजनिक जगहों से खदेड़ा। भयादोहन के बाद भी वे इन युवाओं के हौसले और उनके प्रेम की आकांक्षा, अभिव्यक्ति और नवनिर्मित आजादी को परास्त नहीं कर पाए। कहा गया है कि प्रेम का रास्ता तलवार की धार पर दौड़ने जैसा है- ‘प्रेम का पंथ कराल महा/ तलवार के धार पै धावनो है’। और ये युवा उस पर दौड़ते रहे। खाप मानसिकता और प्रेमियों के संघर्ष में युवा पीढ़ी की फतह होती रही। यह संघर्ष मीडिया के उभरते रूपों के सामने टिक नहीं पाया। सूचना तकनीक के विस्फोट, मोबाइल क्रांति, ग्लोबल वेबसीरिज, मल्टीफ्लेक्स और विशाल मॉल कल्चर ने युवाओं की प्रेमाभिव्यक्ति को नया ‘स्पेस’ दिया। मनोभावनाओं को बहुरंगी दुनिया मिली। सामाजिक विन्यास के जो दायरे सिमटे थे, व्यास की जो लकीरें छोटी थी, उसे युवा प्रेमियों ने लंबा किया।

वर्तमान समाज पूर्ववर्ती समाज की तुलना में काफी खुला है। कल्पना कीजिए उन दिनों की, जब घर के ड्राइंग रूम में एक लैंडलाइन फोन होता था। अगर महिला मित्र का फोन आ जाए तो घर के बड़े-बुजुर्गों के सामने बात करना कितना मुश्किल होता था। सारी बातचीत औपचारिक रस्म अदायगी में बदल जाती थी। मोबाइल की दुनिया ने इसे आसान बनाया। औपचारिक और अनौपचारिक के फर्क को मिटाया। पूरी बातचीत को ‘प्राइवेसी’ में बदल देने की युक्ति इसमें शामिल थी। लोगों के बीच बोल नहीं सकते तो मैसेज कर सकते हैं। चैट कर सकते हैं। कई तरह के वर्चुअल चिह्नों, संकेतों, इमोजी में आप अपने हंसी-खुशी-गम शेयर कर सकते हैं। आप उनके सामने लाइव हो सकते हैं। इसने युवा प्रेमियों के जीवन को आसान बना दिया है। प्रेमियों के जीवन में यह क्रांतिकारी उपलब्धि की तरह है। अब डिजिटल तकनीक के जरिए अंतर्मन को अभिव्यक्त करना आसान हो गया है।

अब वे मेट्रो, मॉल, पार्क आदि सार्वजनिक स्थानों पर भी प्रेमालाप, मौज-मस्ती करते मिल जाते हैं। वे अपने आसपास की दुनिया से बेफिक्र या कहें उससे खुद को काट कर अपनी बनाई दुनिया में खोए रहते हैं। महाकवि घनानंद के शब्दों में समाज की तरफ पीठ करके प्रेम की दुनिया में डूबे रहते हैं। एक ही ईयरफोन की लीड को लड़के-लड़कियां एक-एक कान में लगा कर एक-दूसरे के नजदीक सट कर गपियाते, बतियाते, प्रेमियाते नजर आते हैं। यह आज के युवाओं के साथ होने के ‘नए दृश्य’ हैं।

धीरे-धीरे ये दृश्य छोटे शहरों, कस्बों तक पहुंच गए। लेकिन गांव में बनने वाले नए प्रेमी जोड़े खाप पंचायतों की प्रेम विरोधी क्रूरता के भी शिकार हुए। जाति, गोत्र, धर्म, क्षेत्र के नाम पर ऐसे प्रेमी जोड़ों की हत्याएं भी हुर्इं। हिंदी फिल्मों ने तो इसे दर्ज किया ही। मराठी में बनी ‘सैराठ’ ने इस क्रूरता को बेहद कलात्मक तरीके से प्रस्तुत किया।

मोबाइल, इंटरनेट, सोशल मीडिया यारी-दोस्ती का एक जरिया बना तो एक समस्या भी बनी है। दोस्ती जिस रफ्तार से बनती है उस रफ्तार से टूटती और छूटती भी है। दोस्ती और प्रेम के नाम पर धोखाधड़ी भी खूब होती है। प्रेम में धोखे मिलते हैं। कई बार अनचाहे शरीरिक हमले भी झेलने पड़ते हैं, तो कई बार लूट, ब्लैकमेलिंग और बलात्कार के शिकार मामले भी सामने आते हैं। निजी जिंदगी की वैसी गोपनीय तस्वीरें भी इंटरनेट और सोशल मीडिया पर सार्वजनिक कर दी जाती हैं, जो उनकी छवि और सम्मान को ठेस पहुंचाने वाली होती हैं।