भारतीय सिनेमा में भी प्रेम स्थायी भाव की तरह रहा है। हिंदी सिनेमा ने जाति, वर्ण, धर्म, वर्ग, क्षेत्र, भाषा, सामंती और पितृसत्तात्मक बंधनों, जकड़बंदियों, बद्धमूलताओं के बीच प्रेम को रचा। देवदास, ‘अछूत कन्या’ जैसी प्रेमपरक फिल्में चौथे दशक में ही बनीं, जिन्होंने परंपरागत समाज और उसकी रूढ़ियों को झकझोरने का काम किया। ‘अछूत कन्या’ में ब्राह्मण-दलित जाति के बीच प्रेम रचा। इस फिल्म के यथार्थ ने सिनेमा में क्रांतिकारी दिशा पहल की और समाज को दिशा देने की भी कोशिश की, लेकिन इस यथार्थ का निर्वाह सिनेमा में अधिक नहीं हो पाया। ‘सुजाता’ जरूर उस यथार्थ को नए ढंग से उठाती है, लेकिन बाद में प्रेम रचते हुए फिल्मकार जाति के सवाल से पीछे हटते रहे। धार्मिक कट्टरता के खिलाफ हिंदू-मुसलिम प्रेम कहानी ने कई फिल्मों में जगह बनाई।

‘मुगल-ए-आजम’ फिल्म ने सलीम-अनारकली के प्रेम के बहाने हमारी पूरी ऐतिहासिक चेतना ही बदल दी। अकबर की इतिहास में बनी-बनाई छवि ध्वस्त हो गई। इतिहास का विराट व्यक्तित्व, जिसका चेहरा मानवीय और धर्मनिरपेक्ष बनाया गया था उसे इस फिल्म ने क्रूर शहंशाह के रूप में पेश किया। इतिहास का हीरो फिल्मी पर्दों पर विलेन बन गया। ‘प्यार किया तो डरना क्या…’ गीत ने शाहे-वक्त के पूरे वजूद और सत्ता की बुलंद इमारत को धाराशाई कर दिया। लैला-मजनू, सोहनी महिवाल की तरह विशुद्ध प्रेमपरक फिल्में भी युवाओं के बीच बहुत लोकप्रिय हुर्इं। प्रेम में पिट गए बेफिक्र, बेपरवाह युवाओं के लिए समाज में ‘मजनू’ मुहावरा ही चल निकला। भारतीय समाज को सर्वाधिक प्रभावशाली तरीके से सिनेमाई प्रेम ने बदला।

नब्बे के दशक में सूचना और तकनीक क्रांति के विस्फोट ने समाज में आमूलचूल परिवर्तन उपस्थित किया। आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में भारी बदलाव हुए। इस दौर में सिनेमा बदला और प्रेम की वापसी बिल्कुल नए ढंग से हुई। नई पीढ़ी नए ढंग के प्रेम के साथ प्रवेश की। आमिर खान, सलमान खान, शाहरुख खान, राहुल राय, अजय देवगन, रितिक रोशन आदि ने प्रेम के नए मुहावरे गढ़े। राज कपूर, दिलीप कुमार, देवानंद से भिन्न किस्म का प्रेम अमिताभ, जितेन्द्र, अनिल कपूर की फिल्मों में था और उनसे भिन्न नब्बे का प्रेम था। इसमें किशोरावस्था से निकल रहे युवाओं का प्रेम था। कॉलेज के छात्रों का प्रेम, जिसका जादू युवाओं पर चढ़ कर बोला। इन्होंने वैश्विक स्तर पर भारतीय युवाओं को प्रभावित किया।

इमरान हाशमी, रणवीर सिंह, शाहिद कपूर, रणवीर कपूर, दीपिका पादुकोण, अनुष्का शर्मा, आलिया भट्ट, कैटरीना कैफ आदि की फिल्में या फिल्मकार अनुराग कश्यप, विशाल भारद्वाज, अजय बहल आदि की फिल्मों ने हिंदी सिनेमा के प्रेम को ज्यादा यथार्थवादी बनाया। इनकी फिल्मों में प्रेम के साथ हिंसा और सेक्स उभर आए। अब पर्दे पर सेक्स चित्रण के लिए आदर्शवादी प्रतीकों, संकेतों, बिंबों और अतिरिक्त कल्पनाशीलता की जरूरत खत्म हो गई। उसकी एक वजह यह भी थी कि जब इन्होंने फिल्में बनाना शुरू किया उन दिनों लोगों के हाथों में मोबाइल आ गया और पोर्नोग्राफ्री पर बंदिशें नहीं थी। नतीजन इनकी फिल्में प्रेम और सेक्स दोनों को तरजीह देने लगी। युवाओं के बीच दैहिक प्रेम जगह बनाने लगी। प्रेम और फिर विवाह के फार्मूले भी पुराने पड़ गए। ‘लिव इन रिलेशन’ और ‘यौनता विमर्श’ की फिल्मों ने जगह ले ली।

विवाह मुक्त प्रेम की परिकल्पना युवाओं को ज्यादा आकर्षित कर रही है। फिल्मकारों को भी ‘एडल्ट सर्टिफिकेट’ से परहेज खत्म हो गया। वेबसीरिज और आॅनलाइन फिल्में प्रेम के मद्धिम स्वर के साथ आक्रामक और प्रयोगधर्मी सेक्स लेकर आया। वात्स्यायन के कामसूत्र भी इनके सामने फीके हैं। ये फिल्में युवाओं के बीच लोकप्रिय हो रहे हैं। प्रेम, सेक्सुअलिटी और देह के उपभोग की दृष्टि से भारतीय फिल्में यूरोपीय और अमेरिकी फिल्मों की तुलना में काफी पीछे रही हैं, लेकिन अब वेबसीरिज फिल्में उनसे प्रतिस्पर्धा कर रही हैं। देह का उपभोग, सेक्सुअलिटी और हिंसा सब मिलजुल रहे हैं। प्रेम या देह पर जबरन कब्जा या अधिकार जमाने या ‘यौन सहमति’ न होने के बाद भी पहल करने के खिलाफ फिल्में बन रही हैं, लेकिन उपभोगवादी दृष्टि प्रबल हुई है।
एलजीबीटी को कानूनी अधिकार मिलने के बाद सिनेमा में ‘गे’ और ‘लेस्बियनिज्म’ के दृश्य बढ़े हैं। इन बदलावों का सीधा असर आज के युवाओं पर पड़ रहा है और लोकवृत्त में दृष्टिगोचर हो रहा। प्रेम के नकार में युवा हिंसक भी हो रहे। तेजाब फेंकने से लेकर शारीरिक क्षति और हत्या तक को अंजाम दे रहे।
मेट्रो सिटी या अन्य बड़े शहरों, महानगरों में प्रेम के स्वरूप में यह बदलाव उपस्थित है। क्योंकि शहरी संरचना ढांचे में गांव की तरह जकड़बंदी, जाति और वर्ण की जटिलता और खाप नहीं है। युवा शहरी जीवन शैली टीवी, मोबाइल और सोशल मीडिया के रास्ते गांव तक पहुंच रही है, लेकिन अब भी गांव के जीवन में वैसे प्रेम, विवाह और सेक्स और लिव इन रिलेशन के लिए इतना नहीं खुला है कि पब्लिक में आ जाए। ग्रामीण समाज परंपरा और रूढ़ियों के नाम पर बहुत बद्धमूल बना हुआ है। सामाजिक परिवर्तन की गति शहरों की तुलना में अब भी काफी धीमी है। ऐसे बंद समाज में प्रेम की भूमिका बेहद रचनात्मक और क्रांतिकारी है।

आंबेडकर जब कहते हैं कि जाति-व्यवस्था एक चारमीनार की तरह है, जिसके एक मीनार पर ब्राह्मण, दूसरे पर क्षत्रिय, तीसरे पर वैश्य और चौथे पर शूद्र हैं, लेकिन इस मीनार में सीढ़ियां नहीं हैं। जो जहां है वहीं स्थित है। ऊपर-नीचे आने-जाने के रास्ते बंद हैं तो जाति-व्यवस्था की जड़ता और अपरिवर्तनशीलता सामने आती है। ऐसे समाज में युवा प्रेम ही वह सीढ़ी और रचनात्मक-संरचनात्मक ढांचा है, जो मीनार की संरचना में जुड़ सकती है और सामाजिक ढांचे का पुनर्गठन पुनर्निर्माण कर सकती है।