समकालीन हिंदी कविता में प्रचुर मात्रा में प्रेम कविताएं लिखी जा रही हैं। प्रेम अपने समूचे भाव-वैभव तथा वैविध्य के साथ उनमें रूपायित हो रहा है। ऐसे आपाधापी वाले परिवेश में ‘अटक गई नींद’ संग्रह की कविताएं प्रेम जैसे कोमल और एकांतिक मनोभावों को एक नए तेवर और मुहावरे के साथ प्रस्तुत करती हैं। कवि प्रेम के चित्रण में भी व्यापक सामाजिक और जागतिक संदर्भों की अनदेखी नहीं करता, बल्कि जीवन और जगत के वृहत्तर संदर्भों को सापेक्षता में उसे विशिष्ट भाव-भंगिमा और तेवर प्रदान करता है। यहां हर कविता एक निश्चित संदर्भ में पूर्ण है। वह कवि के प्रेम संबंधी चिंतन का मूर्तिमान रूप है। राकेश मिश्र प्रेम के अनेक पक्षों पर दार्शनिक की तरह चिंतन करते हुए उसे अर्थव्याप्ति प्रदान करते हैं। प्रेम की नानारूपात्मक छवियों का एक कोलाज तैयार करते हैं।
प्रस्तुत संकलन की कविताएं प्रेम को अनुभव के दायरे से निकाल कर बौद्धिक मीमांसा की ओर ले जाती हैं। यह कवि की अपनी निजी उपलब्धि है। ये कविताएं केवल कवि के प्रेमास्पद तक परिमित नहीं हैं, बल्कि उसमें प्रकृति और मनुष्यता के साथ रागात्मक अनुबंध भी समाहित है। इस संकलन का महत्त्व इस दृष्टि से भी है कि इसके द्वारा पाठक को भावनात्मक पोषण प्राप्त होता है। वह बुद्धि तथा भावना के संतुलन को साधता है। इस संकलन की भाषा अपनी अभिव्यंजना में बेहद सटीक और परिपक्व है। इसमें किसी तरह का छद्म नहीं है।
अटक गई नींद : राकेश मिश्र; राधाकृष्ण प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, जी-17, जगतपुरी, दिल्ली; 395 रुपए।

उद्भ्रांत का गद्य

महाकाव्य, खंडकाव्य सहित सभी काव्य रूपों में प्रचुर कार्य करने वाले शीर्ष स्थानीय कवि उद्भ्रांत ने विगत साठ वर्षों की सुदीर्घ और सतत रचना यात्रा के दौरान हिंदी के विरल गद्यकार के रूप में भी अपनी पुख्ता पहचान बनाई है। बीसवीं सदी के सातवें दशक से ही, जब वे नवगीतकार के रूप में प्रसिद्ध हुए, उन्होंने कहानी, आलोचना, संस्मरण, साक्षात्कार और विविध सामयिक और साहित्यिक विषयों पर लेख लिखने प्रारंभ कर दिए थे। गद्य लेखक के रूप में उद्भ्रांत का चरम उत्कर्ष विगत दशक में दिखा, जब उनके साहित्यिक संस्मरण विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में धारावाहिक छपे। इसी अवधि में उद्भ्रांत उपन्यासकार के रूप में भी उभरे। उनकी आलोचना, संस्मरण, डायरी और साक्षात्कार की पुस्तकों ने भी विद्वानों का ध्यान आकर्षित किया। हाल ही में उनकी आत्मकथा की पुस्तकें भी प्रकाशित और चर्चित रहीं।
वरिष्ठ आलोचक खगेंद्र ठाकुर के संपादन में प्रस्तुत पुस्तक में देश के ख्यात साहित्यकारों ने उद्भ्रांत के गद्य लेखन के उक्त विविध स्वरूपों का युक्तियुक्त विचार किया है।
उद्भ्रांत का गद्य : संपा. खगेंद्र ठाकुर; यश पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, 1/10753, गली नं.-3, सुभाष पार्क, नवीन शाहदरा, दिल्ली; 395 रुपए।

गणतंत्र के चरवाहे

इस संग्रह में कुल बावन गीत हैं, जो जीवन के अलग-अलग अनुभव-क्षणों की रागात्मक प्रस्तुतियां हैं। प्रेम, क्रोध, अहंकार, आस्था, आकांक्षा और अवसाद तक के रंग इन गीतों में मिलते हैं। सुमन जी के गीतों की सबसे बड़ी विशेषता है, उनका अर्थ-मुखर होना। इन गीतों को पढ़ते हुए कहीं उलझाव महसूस नहीं होता। नवगीत के बारे में विचार करते हुए भवदेव पांडेय ने लिखा भी है- ‘आज हिंदी में कवियों और गीतकारों की भारी भीड़ हो गई है, इसका मुख्य कारण यह है कि पंक्ति, तुक, मात्रा अथवा लय-विधान करने की हिम्मत अमली को भी कवि-कर्म मान लिया गया है।’ प्रमोद कुमार ‘सुमन’ कुछ अलग तरह के गीतकार हैं।
हर गीतकार की अपनी एक आंतरिक दुनिया होती है, जहां सिर्फ उसका शासन चलता है। इस दुनिया में जब कोई बलात् प्रवेश करता है, तो यह एक अस्वीकार्य स्थिति होती है। सुमन जी भी इस तरह की हर कोशिश का प्रतिरोध करते हैं। अपनी अभिव्यक्ति पर कोई हस्तक्षेप उन्हें स्वीकार नहीं है। इसी तरह उन्हें अपनी भाषा का परिधान बदलना या अन्यथा रूपसज्जा भी स्वीकार नहीं है।
गणतंत्र के चरवाहे : प्रमोद कुमार ‘सुमन’; अंजुमन प्रकाशन, 942, आर्य कन्या चौराहा, मुट्ठीगंज, इलाहाबाद; 200 रुपए।