प्रकाश मनुष्य के सहज आकर्षण का केंद्र है। मनुष्य अंधेरे में कभी नहीं रहना चाहता। अगर उसे विश्रांति नहीं चाहिए, तो फिर उसे प्रकाश चाहिए। प्रकाश उसमें उल्लास भरता है, ऊर्जा का संचार करता, तमाम निराशाओं से दूर रखता है। प्रकाश उम्मीद का तंतु है। इसलिए मनुष्य जब भी उमंग में होता है, उल्लास में होता है, जब भी उसके जीवन में खुशी का अनुभव होता है, वह अपने आसपास प्रकाश रचता है। प्रकाश का उत्सव मनाता है। उसके लिए उत्सव, उल्लास, प्रसन्नता का प्रतीक है प्रकाश। वह प्रकाश के जरिए अपने भीतर की सदिच्छाओं को प्रकट करता है। इसीलिए उसने अंधेरे को बुराई का प्रतीक बनाया, तो प्रकाश को अच्छाई का।

रूसी रचनाकार रसूल हमजोतोव एक बार जब भारत आए थे, उन्हीं दिनों यहां दिवाली का त्योहार था। वे दीपों से सजे घरों और अट्टालिकाओं को देख कर बहुत प्रभावित हुए थे। उससे भी अधिक उन पर प्रभाव पड़ा था, जब उन्हें उपहार में जलता हुआ दीया दिया गया। इस घटना का उल्लेख उन्होंने अपनी आत्मकथा मेरा दागिस्तान में बहुत मार्मिक ढंग से किया है। उन्होंने इस त्योहार के बहाने दुनिया भर में अग्नि को सहेजने और उपहार में देने की परंपराओं का उल्लेख किया है।

यों ज्यादातर जगहों पर दीपावली को धन की देवी लक्ष्मी की पूजा के रूप में मनाया जाता है, पर वास्तव में यह एक तरह से अग्नि के सम्मान का उत्सव है। अग्नि को सहेजने और जीवन में बने रहने, बनाए रखने का भी उत्सव है। यह प्रकाश का उत्सव है। अग्नि है, तो प्रकाश है। जीवन में ऊष्मा है। अग्नि है, तो जो कुछ कच्चा है, उसके पकने की प्रक्रिया संभव है। अग्नि है, तो पचने की प्रक्रिया संभव है। इस तरह यह अन्न और खाद्य के सम्मान का भी उत्सव है।

भारत में ज्यादातर पर्व और त्योहार कृषि संस्कृति से जुड़े हैं। फसलों, ऋतुओं के चक्र से उनका संबंध है। दिवाली का भी कृषि संस्कृति से जुड़ाव है। यह खरीफ की फसल कटने का मौसम होता है। किसान के घर में अन्न आता है। उसके घर खुशहाली आती है। इसलिए उसके मन में इसे लेकर उछाह होता है। उमंग होता है। फिर वर्षा ऋतु बीतने और शीतकाल शुरू होने के संधिस्थल पर जीवन में आने वाले बदलावों से भी इसका नाता है।

बरसात में पैदा हुए तरह-तरह के कीट-पतंगों, घर के भीतर पैदा हुई नमी से मुक्ति पाकर नए मौसम में नए ढंग से जीवन जीने की तैयारी करने का भी अवसर है यह। घर को साफ-सुथरा कर, लीप-पोत कर बरसात में पैदा गंदगी को दूर करने का उपयुक्त समय। इस तरह पूरे गांव, मुहल्ले की सफाई होती है और स्वच्छ वातावरण बनता है। इस उल्लास में दीये की रोशनी और ऊष्मा, पूजा सामग्री की गंध वातावरण में मौजूद हानिकारक विषाणुओं, जीवाणुओं को नष्ट करते हैं। शीतकाल में चूंकि घर के भीतर ही ज्यादातर समय बीतता है, इसलिए उसे साफ-सुथरा करना जरूरी है।

जब घर में फसल कट कर आती है, तो उसका पहला हिस्सा देवी-देवताओं को अर्पित किया जाता है। उसी के पकवान बनते हैं, उसी से बने मिष्ठान्न पूजा में चढ़ाए जाते हैं। यह अकारण नहीं है कि दिवाली पांच त्योहारों का समुच्चय है। इसकी शुरुआत धनतेरस से होती है, जब नए बरतन-बासन खरीदे जाते हैं। उस दिन एक दीया द्वार पर जलाया जाता है। उसके अगले दिन नरक चौदस होती है, जब यम की पूजा होती है। इस दिन रात को घूरे पर एक दीया अवश्य जलाया जाता है। यह इस बात का प्रतीक है कि कृषि संस्कृति में घूरे यानी जिसमें साल भर घर का कूड़ा-कचरा पड़ता रहता है, पशुधन का गोबर इकट्ठा होता रहता है, जिसकी कंपोस्ट बनती है, उसका भी अपना महत्त्व है। इसका एक प्रतीकार्थ यह भी है कि दिवाली मनाने से पहले गंदगी को समेट लिया गया है।

दिवाली की सुबह, सूरज निकलने से पहले कई इलाकों में हंसिया से सूप को बजाते हुए घर के हर हिस्से से दलिद्दर यानी दरिद्रता को बाहर निकाला जाता है। फिर घूरे पर रखे दीये को लेकर गांव के सीवाने पर जाया जाता है, जहां दलिद्दर वाले सूप को सामूहिक रूप से फूंक दिया जाता है। इसी आग से हंसिए पर अंजन बनाया जाता है, जिसे लगाने से माना जाता है कि आंखों की रोशनी हमेशा बनी रहती है। फिर दिन भर घर की रसोई और देवता के स्थान की लिपाई-पुताई कर उसे पवित्र किया जाता है।

फिर शाम को उत्सव के दीप जलते हैं। अगले दिन गोवर्धनपूजा होती है, जिसके बारे में कृष्ण के गोवर्धन पर्वत उठाने से कथा जुड़ी है। इसी दिन अन्नकूट होता है, जिसमें नए अन्न से भोजन बनता है और फिर सामूहिक भोज होता है। उसके अगले दिन भैया दूज का त्योहार होता है, जो भाई-बहन के अटूट प्रेम का एक और त्योहार है।

दिवाली है अनादि पर्व

यों मान्यता है कि भगवान राम के चौदह वर्ष वनवास के बाद अयोध्या लौटने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। मगर अलग-अलग इलाकों में इससे जुड़ी अलग-अलग मान्यताएं भी हैं। वेदों में भी दीपोत्सव का वर्णन मिलता है। पद्मपुराण और स्कंदपुराण में भी इसका उल्लेख है। स्कंदपुराण में दीप को सूर्य के अंश के प्रतिनिधि के रूप में माना गया है। सूर्य चूंकि पृथ्वी पर अपने प्रकाश और ऊष्मा से जीवन में ऊर्जा भरता है, उसके अंश रूप में दीप को देखा गया। कार्तिक मास में सूर्य अपनी स्थिति बदलता है, इसलिए उसके नए स्वरूप का स्वागत करने के लिए अमावस्या की गहन रात्रि को प्रकाशित कर उत्सव का रूप दिया जाता है। कुछ लोग इसे नए चंद्रमा के स्वागत का उत्सव भी कहते हैं।

सातवीं शताब्दी के संस्कृत नाटक नागनंद में वर्णन है कि राजा हर्ष इसे दीपप्रतिपादुत्सव के रूप में मनाते थे। इस दिन हर घर में दीये जलाए जाते थे और नवविवाहित जोड़ों को उपहार में दीये भेंट किए जाते थे। राजशेखर ने काव्यमीमांसा में इसे दीपमालिका बताया है, जब घरों और सड़कों आदि की सफाई कर दीपों से सजाया जाता था। कुछ लोगों की मान्यता है कि इसी दिन धन की देवी लक्ष्मी ने विष्णु को अपने पति के रूप में वरण किया था, इसलिए यह उत्सव मनाया जाता है। इस दिन लक्ष्मी के साथ संकट दूर करने वाले गणेश, ज्ञान की देवी सरस्वती और धन के देवता कुबेर की भी पूजा की जाती और उन्हें प्रसाद अर्पित किया जाता है। ओड़ीशा और बंगाल में इस दिन लक्ष्मी के बजाय काली की पूजा की जाती है। उत्तर प्रदेश के मथुरा में इस त्योहार को कृष्ण से जोड़ कर देखते हैं। उनका मानना है कि इसी दिन कृष्ण ने नरकासुर का वध किया था।

इसी दिन चूंकि भगवान महावीर को निर्वाण प्राप्त हुआ था, इसलिए जैन मतावलंबी तीर्थंकर के निर्वाण दिवस के रूप में दिवाली मनाते हैं। दिवाली के दिन ही अमृतसर में स्वर्णमंदिर का शिलान्यास हुआ था और सिख पंथ के छठवें गुरु हरगोविंद सिंह को जेल से रिहा किया गया था, इसलिए सिखपंथी दिवाली को इस अवसर से जोड़ कर देखते हैं। इसी तरह नेपाल में चंूकि इसी दिन से नए साल का आरंभ होता है, वहां लोग नए साल के स्वागत में दिवाली मनाते हैं। दिवाली को लेकर ऐसी ही अनेक मान्यताएं हैं। पर सबके मूल में प्रकाश का उत्सव है, जो सुख, समृद्धि और उल्लास का प्रतीक है। यह इस बात का संकेत है कि प्रकाश के इस पर्व को चाहे किसी भी पौराणिक या ऐतिहासिक घटना से जोड़ा जाता रहा हो, पर यह चूंकि मनुष्य की सदिच्छाओं का प्रतीक है, इसकी शुरुआत तभी हो गई होगी, जब मनुष्य ने अपनी सभ्यताओं का विकास करना शुरू किया होगा। जब उसने अग्नि की खोज की होगी और उसके प्रकाश ने उसे चमत्कृत किया होगा, आकर्षित किया होगा। इस तरह दिवाली अनादि काल से चला आ रहा पर्व है।

दीपावली हिंदू, जैन और सिख समुदाय के साथ विशेष रूप से दुनिया भर में मनाई जाती है। यह श्रीलंका, पाकिस्तान, म्यांमा, थाईलैंड, मलेशिया, सिंगापुर, इंडोनेशिया, आॅस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, फिजी, मॉरीशस, केन्या, तंजानिया, दक्षिण अफ्रीका, गुयाना, सूरीनाम, त्रिनिदाद और टोबैगो, नीदरलैंड, कनाडा, ब्रिटेन शामिल संयुक्त अरब अमीरात, और संयुक्त राज्य अमेरिका में भी धूम-धाम से मनाई जाती है। भारतीय संस्कृति की समझ और भारतीय मूल के लोगों के वैश्विक प्रवास के कारण दीवाली मानाने वाले देशों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है। कुछ देशों में यह भारतीय प्रवासियों द्वारा मुख्य रूप से मनाई जाती है। अन्य देशों में यह सामान्य स्थानीय संस्कृति का हिस्सा बनता जा रहा है।

बाजार का वैभव

जब उद्योग-धंधों का विकास होना शुरू हुआ, तो धन की महत्ता बढ़नी शुरू हुई। मिल-कारखानों की संख्या बढ़ने लगी और शहरों ने आकार लेना शुरू किया। इस तरह रोजी-रोजगार की तलाश में शहरों की तरफ लोगों का पलायन बढ़ा। मगर जो लोग पढ़ाई-लिखाई, रोजी-रोजगार के लिए शहरों में आए, वे अपने साथ अपनी संस्कृति भी लेते आए। अपने तीज-त्योहार, अपनी परंपराओं को शहरों में भी जिंदा रखने का प्रयास किया। इस तरह बाजार की उन पर नजर गई और व्यवसाय का एक नया क्षेत्र खुलता दिखा, तो उसने उन त्योहारों को भव्यता देनी शुरू की। ग्रामीण संस्कृति में जिन त्योहारों के रंग कुछ फीके जान पड़ते थे, उन्हें बाजार ने शहरों में भव्यता प्रदान की। इस तरह बहुत सारे त्योहारों की प्रकृति पर भी असर पड़ना शुरू हो गया है। जो त्योहार कृषि संस्कृति पर आधारित थे, वे धीरे-धीरे नागर संस्कृति के वैभव से अपना स्वरूप बदलने लगे। बाजार का स्वभाव ही है चकाचौंध पैदा कर अपना आकार बढ़ाना।

इस तरह जब बाजार ने दिवाली पर ध्यान केंद्रित किया, तो उसे स्वाभाविक रूप से चकाचौंध मिली। दिवाली तो है ही रोशनी का त्योहार, सो उसमें चमक भरना बाजार के लिए मुश्किल काम नहीं था। सो, कई परंपराएं टूटीं, कई नई बनीं और फिर वे मुख्यधारा बन गर्इं। बाजार जब अपना मुंह खोलता है, तो बहुत सारी स्थानीयताओं को लील लेता है। वही हुआ दिवाली को लेकर भी। रोशनी के लिए पहले जो मिट्टी के दीये जलाने की परंपरा थी, उसे बाजार ने लगभग समाप्त कर दिया। उसकी जगह मोमबत्तियों और बिजली की झालरों, रंगीन सजावटी बत्तियों ने ले ली।

मिट्टी के दीये का चलन खत्म हुआ, तो उसके व्यवसाय से जुड़े लोग भी कहीं अंधेरे में गुम होते चले गए। खेतों, तालाबों से पवित्र मिट्टी लाकर उसे गूंथना, उसे चाक पर रख कर महीनों दीये गढ़ना और फिर आंवा में पकाना, सब कुछ खत्म हो गया। कुंभकारी का पेशा ही एक तरह से खत्म हो गया। जो कुछ लोग सगुन के तौर पर मिट्टी के दीये जलाते भी हैं, उसे भी बाजार ने डिजाइनर शक्ल दे दी। अब वे कारखानों में बनने लगे। बिजली की भट्ठी में पकने और मश्ीन से रंगे जाने लगे। कपास की बाती भी कारखानों में बनने लगी। मगर चकाचौंध रचने वाली बिजली की झालरों के बीच उन दीयों की उपस्थिति जैसे खुद को ही प्रश्नांकित करती नजर आती है।

पूजा के लिए जो लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां पहले पवित्र मिट्टी से बनाई जाती थीं, कुशल कारीगर उनमें अपना हुनर दिखाया करते थे, अब वे भी प्लास्टिक, कांच, धातु आदि से कारखानों में बन कर सुंदर रूप में बाजार में सजी मिल जाती हैं। प्लास्टिक के वंदनवार, रंगोली तक बाजार उपलब्ध करा रहा है। घरों में जो हफ्ते भर से मिठाइयां और पकवान बनाने की तैयारियां चलती थीं, अब उसकी भी चिंता नहीं। सब कुछ बाजार में उपलब्ध है। इस तरह जिसकी जितनी आर्थिक क्षमता है, उसकी दिवाली उतनी ही भव्य मनती है।

बाजार ने दिवाली को भड़कीला बनाने के लिए सबसे बड़ा गुनाह किया है कि उसने पटाखों की परंपरा विकसित कर दी। प्राचीन काल में, बल्कि औद्योगिक संस्कृति के विकास से पहले तक पटाखों का ऐसा चलन नहीं था। पता नहीं कैसे बाजार ने यह मान्यता रच दी कि दिवाली पर पटाखे फोड़ना सौभाग्य का प्रतीक है। यह पश्चिम की नकल से विकसित हुआ, जब वहां लोग खुशियां प्रदर्शित करने के लिए पटाखे फोड़ते हैं। नए साल पर पटाखों का चलन उनके यहां बहुत पहले से है।

हमें समृद्ध देशों की परंपराएं अपनाने में बहुत गर्व होता है, सो पटाखों को भी सहज ढंग से अपना लिया और आज स्थिति यह है कि देश के विभिन्न हिस्सों में इसे बनाने के बड़े केंद्र बन गए हैं। पर समस्या यह है कि यह देश पहले ही जनसंख्या के दबाव और वाहनों की बढ़ती संख्या के कारण वायु प्रदूषण से निजात पाने के लिए कसमसा रहा है। उसमें पटाखों का अतर्कित इस्तेमाल इसे जानलेवा स्तर तक बढ़ा देता है। पर बाजार ने हमें यह सोचने तक का अवसर नहीं छोड़ा है कि त्योहार खुशियों का अवसर होते हैं, न कि अपने और दूसरों के लिए समस्याएं पैदा करने का।

उपहार संस्कृति

खुशी, उत्सव के मौकों पर अपने परिजनों, रिश्तेदारों, करीबी मित्रों को उपहार देने की परिपाटी पुरानी है। मगर भारतीय संस्कृति में त्योहारों पर उपहार आमतौर पर प्रसाद के रूप में वितरित करने की परंपरा रही है। बाजार ने उस परंपरा को भी खत्म कर दिया। अब महंगे उपहारों की परंपरा विकसित हो गई है। जिसके पास जितनी क्षमता है, वह उतना ही उपहारों पर खर्च करता है। जिसका ओहदा जितना बड़ा है, वह उतना ही अधिक और महंगे उपहार बटोरता है। अब वे दिन गए जब दिवाली पर प्रसाद रूप में खील-बताशे बांटे जाते थे, घर में बने पकवान खिलाए जाते थे।

अब पखवाड़े भर पहले से बाजार में उपहार की खरीदारी की भीड़ उमड़ पड़ती है। सोने-चांदी के आभूषण से लेकर बर्तन-भांडे, आधुनिक इलेक्ट्रानिक वस्तुएं, मिठाइयां, बाजार में जो कुछ उपलब्ध है, वह सब कुछ दिवाली के उपहार के रूप में लिया-दिया जाने लगा है। बहुतों के लिए यह अपनी काली कमाई खपाने का अवसर बन गया है, तो अनेक लोगों के लिए अवैध कमाई का जायज मौका। व्यापारियों और अधिकारियों में उपहार का लेन-देन सौहार्दवश नहीं, बल्कि स्वार्थवश अधिक होता है। उपहार बांटने वालों की दौड़-भाग में सड़कों पर घंटों-घंटों जाम लगा रहता है।

इस प्रवृत्ति से केवल शहर प्रभावित नहीं हैं, छोटे कस्बे और गांव तक इससे अछूते नहीं रह गए हैं। वहां भी बिजली की लड़ियों, मोम के दीयों, उपहार में महंगी वस्तुओं के लेन-देन की परंपरा विकसित हो चुकी है।

इस तरह दीप की दिव्यता का यह पर्व, जिसमें दीप की प्रार्थना की जाती थी कि हे दीप! हमें सौभाग्य और समृद्धि प्रदान करो, हमारे परिवार को खुशहाल रखो- वह परंपरा बाजार की चकाचौंध में कहीं दुबक गई है। दीप की दिव्यता उसके प्रकाश की पवित्रता में होती है, न कि पाखंड की चमक में।