सबसे खौफनाक यह है कि छोटे-छोटे बच्चे भी दुष्कर्म जैसी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। उन्हें पता ही नहीं कि वे क्या कर रहे हैं। वे किस तरह ऐसी बातें सीख रहे हैं। बहुत से लोग पोर्न की सहज उपलब्धता से इसे जोड़ते हैं। यह दिखाई भी देता है। इन दिनों किशोर बिना किसी रोक-टोक या लिहाज के खुलेआम पोर्न देखते रहते हैं। वे पास से गुजरती बड़ी उम्र तक की महिलाओं को जिन नजरों से देखते हैं, उनसे डर लगता है। बहुत से दुष्कर्म के मामलों में परिवार की औरतें भी अपने घर वालों का साथ देती हैं। खास तौर से तब जब बच्ची या लड़की किसी ऐसे परिवार से हो जिससे बदला चुकाना है। वैसे भी सदियों से औरतों लड़कियों पर जोर-जबर्दस्ती और बलात्कार अपनी ताकत दिखाने का हथियार रहा है।
अफसोस तो यह है कि जिन शेल्टर होम्स या अनाथालयों को सरकारों ने इसलिए खोला है कि वहां अनाथ बेसहारा और गरीब बच्चियों को शरण मिल सके वहां भी लड़कियों को इस तरह के भारी अपराधों का सामना करना पड़ता है। लड़कियों को तरह-तरह के अपराधों का सामना तो करना ही पड़ता है उन्हें देह व्यापार में भी धकेला जाता है। इसे पुलिस तथा अन्य सरकारी संस्थाओं की मदद से अंजाम दिया जाता है। जिन लोगों पर उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी है, वे लड़कियों के अपराधी साबित होते हैं।
घरों में भी इस तरह के अपराध किए जाते हैं। दुष्कर्म के बानवे प्रतिशत मामले घर के बहुत से पुरुष सदस्यों, मित्र, परिचितों और नाते, रिश्तेदारों के द्वारा किए जाते हैं। इनकी शिकार छोटी बच्चियां अधिक होती हैं। उन्हं डरा-धमका कर काबू कर लिया जाता है। एक तरफ बच्चियों के प्रति अपराध बढ़ रहे हैं तो दूसरी तरफ ऐसी घटनाएं भी सामने आती हैं जो समाज की संवेदनशीलता को बताती हैं। एक महिला डॉक्टर के क्लीनिक में एक मां अपनी जुड़वां बच्चियों को छोड़ कर भाग गई। उसने अपना नाम-पता भी गलत लिखवाया था। तब इस अविवाहित डॉक्टर ने इन बच्चियों को गोद ले लिया। एक दूसरी डॉक्टर अपने क्लीनिक में बच्ची के जन्म पर फीस नहीं लेती। अभिनेत्री सुष्मिता सेन और रवीना टंडन ने सालों पहले दो-दो अनाथ बच्चियों को गोद लिया था। चंबल के एक गांव में लड़की के पैदा होने पर ढोल-नगाड़ों से उत्सव मनाया जाता है।
हाल ही में राजस्थान में एक बच्ची को जन्मते ही नाल समेत तेज धूप में फेंक दिया गया था। चीखते हुए जब उसका वीडियो वायरल हुआ तो पत्रकार विनोद कापड़ी ने उसे गोद लेने की इच्छा प्रकट की। कहा कि अब ये चीखें और नहीं सुनी जा सकतीं। इससे पहले किसी दयालु ने उस बच्ची को अस्पताल पहुंचा दिया था। जहां उसका इलाज किया गया और अब वह स्वस्थ है। एक कुत्ते ने भी कूड़े के ढेर से बच्ची को बचाया था। लगता है कि कभी जानवर भी उस नृशंस मनुष्य से ज्यादा समझदार मालूम देते हैं जो कभी इज्जत जाने के नाम पर तो कभी सिर्फ बेटी होने के कारण से ही बच्चियों को मरने के लिए फेंक देते हैं। ये घटनाएं भी अपराध की श्रेणी में आती हैं, मगर बच्चियों और बच्चों का फेंका जाना नहीं रुकता। एक तरफ बच्चियों को देवी मानना, शक्ति की उपासना करना, दूसरी तरफ उन्हें कूड़े के ढेर में फेंकना, तरह-तरह से सताना कौन-सा धर्म, कौन-सा लोकतंत्र सिखाता है।
2012 में एनसीआरबी के मुताबिक सत्रह साल और उससे कम उम्र की बच्चियों के साथ जोर-जबर्दस्ती और छेड़खानी के 8541 मामले दर्ज हुए थे, जो 2016 में बढ़ कर 19,765 तक पहुंच गए। सीएमआईई और लोकनीति के सर्वे के मुताबिक 2001 में बच्चों के प्रति यौन अपराध 36.6 प्रतिशत थे, जो 2016 में बढ़ कर 43.2 प्रतिशत हो गए। 2002 में ये बीस प्रतिशत से कम रिकार्ड किए गए। बच्चों के प्रति अपराधों में सिर्फ लड़कियां नहीं, छोटे बच्चे भी शिकार बनते हैं। देश में प्रतिदिन 106 दुष्कर्म के मामले दर्ज किए जाते हैं। इनमें चालीस प्रतिशत तक छोटी बच्चियां होती हैं। स्कॉटलैंड में हाल ही में ग्यारह महीनों के दौरान सोलह सौ ऐसे लोग पकड़े गए, जो आनलाइन यौन अपराध करते थे। बच्चों को उकसाते थे और उनसे मिलने का आग्रह करते थे। इनमें से अधिकांश को भरोसा था कि वे कभी पकड़े नहीं जाएंगे। ल्लमिशिगन, अमेरिका में भी बाइस लोगों को आनलाइन यौन अपराध के मामले में गिरफ्तार किया गया।

