पिछले कुछ सालों में अबोध बच्चियों के साथ दुष्कर्म की घटनाएं लगातार बढ़ी हैं। हालांकि इसके खिलाफ कड़े कानून हैं, कठोर सजा का प्रावधान है, पर उसका भय लोगों में दीख नहीं रहा। विचित्र है कि कुछ लोग ऐसी घटनाओं पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने; उन्हें जाति, धर्म के खांचे में बांटने से भी गुरेज नहीं करते। बच्चियों के साथ बढ़ते दुष्कर्म के पीछे कई वजहें बताई जाती हैं। पर यह दरअसल, एक आपराधिक मानसिकता है, जिसे कानून का पालन कराने वालों की शिथिलता, सजा की दर कम होने, इंटरनेट पर उपलब्ध आपत्तिजनक सामग्री से बल मिलता है। बच्चियों के साथ होने वाली ऐसी घटनाओं का विश्लेषण कर रही हैं क्षमा शर्मा।
बच्चियों के प्रति यौन अपराध बढ़ते ही जा रहे हैं। मानवता की दुहाई देते हम कहां आ पहुंचे हैं कि हमें एक छोटी बच्ची भी अपराध करने के लिए उकसाती है। उसकी मासूमियत नहीं दिखती, हम उसे लड़की के रूप में देखते हैं। निर्भया आंदोलन के समय मांग की जा रही थी कि बलात्कार के खिलाफ ऐसा कठोर कानून बनाया जाए, जिससे अपराधियों में इतना खौफ बैठ जाए कि वे ऐसा करने की हिम्मत न जुटा सकें। नया कानून भी बना, जहां अन्य बातों के अलावा किसी को चौदह सेकंड देखना भी अपराध बना दिया गया, लेकिन दुष्कर्म रुके नहीं, बल्कि बढ़ते गए।
कठुआ में जब एक नन्ही बच्ची से बलात्कार हुआ था और उसे मार डाला गया था, तब पूरे भारत में बहुत रोष प्रकट किया गया था। उस समय जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने देश के लोगों का शुक्रिया भी अदा किया था। हालांकि उसी दौरान थोड़े से दिनों में बहुत-सी बच्चियां इस तरह के अपराधों का शिकार हुर्इं, लेकिन उनके लिए कोई आवाज नहीं उठी। एक बहुत बड़ी स्त्रीवादी बोलीं कि हम किस-किस के लिए आवाज उठाते रहें। दूसरे उठाएं। सच तो यह है कि जिस कांड से प्रसिद्धि मिलती है वही मीडिया और सोशल मीडिया में जगह पाता है। वरना तो कोई भी हादसा सिर्फ खबर भर रहता है, पढ़ो और भूल जाओ। बढ़-चढ़ कर बयान देने वाले भी यही देख कर बयान देते हैं कि उन्हें किस तरह का कवरेज मिलेगा।
दुष्कर्म पीड़िता की पहचान बताना कानूनी अपराध है, मगर इन दिनों तो उसकी जाति, गांव, भाषा परिवार सब बता दिया जाता है। यहां तक कि कठुआ मामले में तो लोगों ने बड़ी संख्या में उस बच्ची के चित्र लगा दिए और न्याय की मांग करने लगे। इस मामले में यह भी हुआ कि लोग कहने लगे कि इस बच्ची के साथ दुष्कर्म जैसा अपराध हुआ ही नहीं है। पूरे प्रसंग को हिंदू बरक्स मुसलिम भी बना दिया गया। इसमें बच्ची के प्रति हुआ अपराध पृष्ठभूमि में चला गया। पिछले दिनों न्यायालय ने कठुआ के दोषियों को सजा सुनाई है। इस पर कई लोग उन लोगों से सवाल पूछ रहे हैं कि अब वे जवाब दें जो कह रहे थे कि दुष्कर्म हुआ ही नहीं था।
हाल ही में टप्पल में एक ढाई साल की बच्ची को इतनी बेदर्दी से मारा गया कि रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उसके अंग-प्रत्यंग तक अलग-अलग कर दिए गए। लेकिन इस मसले पर भी तरह-तरह के धार्मिक और जातिवादी चश्मे लगा लिए गए। कोई कहने लगा कि कठुआ के मामले पर जिनका खून खौल रहा था वे अब किस बिल में घुस गए। किसी ने लिखा कि टप्पल वाली लड़की चूंकि सवर्ण थी, दलित या मुसलमान नहीं इसलिए न मीडिया में उसे ज्यादा जगह मिली न सेकुलर लोगों में। किसी ने लिखा कि चूंकि वह हिंदू थी इसलिए उसके परिवार वालों के यहां न नेताओं की भीड़ लगी न किसी भारी-भरकम मुआवजे का एलान किया गया। न मोमबत्ती वालों की भीड़ नजर आई। एक दलित महिला ने फेसबुक पर लिखा कि उसे ब्राह्मण लड़की के साथ जो कुछ हुआ उससे कोई दुख नहीं है।
टप्पल की घटना के बाद निर्भया के मामले की तरह ही फेसबुक पर ऐसे लोगों की बाढ़ आ गई, जो बताने लगे कि इस तरह के अपराधियों को किस-किस तरह से सजा दी जा सकती है। किसी ने एक ऐसी तस्वीर पोस्ट की, जिसमें एक आदमी ऊंचे मंच पर खड़ा है। उसके हाथ-पांव बंधे हैं। और पांवों के नीचे तेज आग जल रही है। वह आदमी चिल्ला रहा है। आसपास खड़े सैकड़ों लोग उसे देख रहे हैं। इस फोटो पर कैप्शन दिया गया कि अपराधियों को ऐसी सजा दी जाए, तभी दुष्कर्म रुक सकते हैं। इसे देख कर लगा कि अपराधी के लिए सजा की नहीं, जैसे किसी आनंद के लिए कोई मांग की जा रही हो। हिंसा भी एक तरह का आनंद देती है, तभी तो जितनी हिंसक फिल्म और धारावाहिक हैं वे हिट हो जाते हैं। हिंसा से भरी किताबें भी खूब हिट होती हैं।
इसी तरह का दूसरा फोटो था, जिसमें सरेआम आदमी की गरदन उतारी जा रही है। किसी को पत्थर मार कर मारा जा रहा है। एक आदमी को सरेआम गोली मारी जा रही है और हजारों की भीड़ तमाशा देख रही है। एक पोस्ट में मनुस्मृति से उदाहरण देकर लिखा गया कि लोहे के पलंग को आग में तपा कर लाल किया जाए, फिर उस पर इस तरह के अपराधी (दुष्कर्म) को डाल कर आग लगा दी जाए। किसी ने लिखा कि मोमबत्ती जलाने की जगह किसी बलात्कारी को जला कर देखो। ऐसी खबरें भी बड़ी संख्या में साझा की गर्इं, जहां बलात्कारियों को भीड़ ने मार डाला। असम में भी कुछ साल पहले ऐसा हुआ था। जहां हजारों की भीड़ ने मारे जाते बलात्कारी के वीडियो बनाए थे। इसी दौरान मिस्र के एक विश्वविद्यालय की एक प्रोफेसर का बयान आया कि इस्लाम गैर-मुसलिमों से बलात्कार की इजाजत देता है।
