इस संग्रह में वे पांच व्याख्यान मुद्रित हैं, जो पंडित मोतीलालजी शास्त्री ने राष्ट्रपति भवन, नई दिल्ली में दिए थे। पंडित मोतीलालजी शास्त्री ने वैदिक सृष्टि-विद्या के अन्वेषम का जो कार्य किया है, उसका राष्ट्रीय महत्त्व है। वैदिक परिभाषाओं की ऐसी व्याख्या अपने देश में तो अन्यत्र कहीं भी देखने में नहीं आती और विदेश में भी नहीं है। भारतीय चिंतन और दृष्टि अनेकमुखी और बहुल रही है और उसके अध्ययन-अन्वेषण में नए मुकाम आते रहे हैं।

आज यह सोचना लगभग असंभव है कि एक पारंपरिक विद्वान को पांच लंबे व्याख्यान देने के लिए राष्ट्रपति भवन ने आमंत्रित किया था। शास्त्री जी, जो उस समय भारतीय विद्या और विद्वत्ता की एक विभूति थे, इन व्याख्यानों के लिए एक अन्य बहुश्रुत विद्वान वासुदेशवरण अग्रवाल ने तैयार किया था। व्याख्यान महामहिम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में हुए और राजधानी के अन्य कितने ही विद्वान भी इनमें उपस्थित थे। सभी ने मुक्तकंठ से व्याख्याता और व्याख्यानों की प्रशंसा की। महामहिम राष्ट्रपति जी ने अंत में कहा- ‘मैंने जितना अनुमान किया था, उससे कहीं अधिक मौलिक और मूल्यवान वेदों की यह व्याख्या मुझे विदित हुई। समस्त भारतीय संस्कृति और साहित्य की इसमें कुंजी है एवं यह निधि रक्षा के योग्य है।’

उसी समय यह निश्चय हुआ कि भाषणों को लिखित रूप में परिवर्तित करके मुद्रित कराया जाय, जिससे देश के अन्य विद्वान जिन्हें इस विषय में रुचि है, इनके महत्त्व को समझें और अपने राष्ट्र की प्रज्ञा को सांस्कृतिक चिंतन की नई दिशा प्राप्त हो। उसी की फलश्रुति यह पुस्तक है।
व्याख्यान-पंचक : मोतीलाल शास्त्री; नयी किताब प्रकाशन, 1/11829, ग्राउंड फ्लोर, पंचशील गार्डन, नवीन शाहदरा, दिल्ली; 275 रुपए।

इस समय तक
इस समय तक’ की अठहत्तर कविताएं अनेक भावों, संवेदनाओं, प्रसंगों और परिवेशों की कविताएं हैं। कवि जीवन को देखता है- मां को देखता है, प्रकृति के आंगन में घूमता है, गांव की जिंदगी और शहर-गांव के सम्मिलन पर अंतर्मन से बोलता है, अकृत्रिम प्रेम करता है, बेटी हो या पिता अथवा चिड़िया सबको याद करता है, प्रजातंत्र-जनता-संविधान-नेता आदि का मूल्यांकन करता है, मानवीय रिश्तों के महत्त्व को समझता है, कवि-कविता-भाषा को शब्द-रूप देता है, आदमी के गिरते रूप तथा युद्ध की भयानकता को याद करता है।

कवि की चिंताएं व्यापक हैं, पर उसका प्रकृति-सौंदर्य और मानवीय संबंधों की मधुरता भी उतनी ही व्यापक है। कवि, परिवार, रिश्ते, प्रकृति, गांव, प्रेम, कविता आदि सभी के प्रति संवेदनशील है और यह इस कविता-संग्रह का महत्त्वपूर्ण पक्ष है। कवि प्रजातंत्र की दुर्दशा और मनुष्यता के क्षय तथा व्यापक विध्वंस के प्रति चिंतित है जो निश्चय ही पहले पक्ष की रक्षा एवं निरंतरता के लिए आवश्यक है। अत: कवि मुख्यत: मानव संस्कृति एवं प्रकृतिदत्त जीवन का कवि है और वह विकृति तथा विध्वंस के चित्रण से भी इसी भाव को जाग्रत करता है और यही उसके सशक्त कवि होने की पहचान है। कवि अपने पहले कविता-संग्रह में ही जिस ऊंचाई तक पहुंचता है वह हमें उसकी रचनात्मकता तथा काव्य-चेतना के प्रति आश्वस्त करता है।
इस समय तक : धर्मपाल महेंद्र जैन; शिवना प्रकाशन, पीसी लैब, सम्राट कॉम्प्लैक्स बेसमेंट, बस स्टैंड, सीहोर; 250 रुपए।

कृष्ण
कृष्ण का जीवन चरित्र लेखक रजनीश को बचपन से ही आकर्षित करता रहा है और उनकी लीलाओं में जो जीवन के संदेश अंतर्निहित हैं वे विशेष रहे हैं। बकौल लेखक- ‘कृष्ण मेरे सर्वस्व हैं। मेरी श्वास, मन, मस्तिष्क, आगम निगम, शुभ अशुभ, राग द्वेष सब कुछ कृष्ण है। कान्हा ने ब्रज की जमीन से मुझको जोड़ कर स्वयं को मुझमें ऐसे निहित कर दिया कि अब कान्हा मुझसे पृथक नहीं हैं। अंतर्मन में जो भाव उठे, उन्हीं प्राणों के खामोश संगीत को शब्दों के भावों में बांधना ही मेरा इष्ट है।’ इस कृति ‘कृष्ण’ में द्वापर युग के महानायक कृष्ण के जीवन चरित्र और असीमित लीलाओं को मात्र चालीस दोहों में सचेतन किया गया है।

आज की विषम सामाजिक परिस्थितियों में जहां मानवीय संवेदनाएं और जीवन मूल्य निरंतर शून्य हो रहे हैं वहां श्रीकृष्ण की लीलाओं का रागात्मक रूप में पुन: बोध कराना आवश्यक जान पड़ता है। अपने इस सृजन में लेखक ने हिंदी एवं अंग्रेजी दोनों माध्यमों का काव्यरूप में प्रयोग किया है जिसका उद्देश्य समस्त वर्ग और आयु के पाठकों का संसार में ह्रास होते हुए मूल्यों और हमारी लुप्त होती सांस्कृतिक विरासत की दिशा में ध्यान दिलाना है।
कृष्ण : रजनीश अग्रवाल ‘राज’; दी बुक लाईन, 106, 4787/23 प्रथम तल, अंसारी रोड, दरिया गंज, नई दिल्ली; 995 रुपए।

भक्तिकाव्य में स्त्री चिंतन
हिंदी साहित्य में स्त्री-चिंतन का उद्भव चौदहवीं शताब्दी में भक्ति आंदोलन के साथ होता है। भक्ति आंदोलन की शुरुआत दक्षिण में आलवारों से हुई, जिसमें एक महिला आंडाल भी हैं। रामानंद के शिष्यों में पद्मावती के साथ सुरसुरानंद के घरवाली का भी उल्लेख मिलता है। इस काल में बड़ी संख्या में संत-भक्त कवयित्रियों का आगमन होता है। इनमें से अनेक का संबंध समाज की निम्न वर्गीय जातियों से है। ‘चौरासी वैष्णवों की वार्ता’ और ‘दो सौ बावन वैष्णवों की वार्ता’ ग्रंथों के उपशीर्षक कुछ इस प्रकार हैं- ‘एक कूंजरी की वार्ता’, ‘एक वेश्या की वार्ता’, ‘सावक की बेटी की वार्ता’, ‘एक वेश्या की बेटी की वार्ता’। ‘भक्तमाल’ में ‘कलियुग युवतीजन भक्त’ की सूची दी गई है। इस तरह भक्ति काव्य से शुरू हुई स्त्री रचनाकारों और उनके चिंतन की परंपरा आज तक समृद्ध होती हुई आगे बढ़ रही है।

प्रस्तुत पुस्तक में भक्तिकाव्य में स्त्री संतों-भक्तों के योगदान का विश्लेषण करते हुए उनकी चिंतन दृष्टि का बहुत ही सुंदर विश्लेषण है।
भक्तिकाव्य में स्त्री चिंतन : चंद्रभान सिंह यादव; ओमेगा पब्लिकेशन्स, 4378/4 बी, जी 4 जेएमडी हाउस, गली मुरारीलाल, अंसारी रोड,, दरियागंज, नई दिल्ली; 500।