युद्ध साम्राज्य विस्तार के लिए मंडियों पर एकाधिकार की इच्छा से या शक्ति प्रदर्शन के लिए हो, मानव जाति के लिए भयानक, विनाशक और हिंसक होता है। पहला विश्वयुद्ध 28 जुलाई 1914 को आरंभ हुआ। इस भीषण युद्ध ने डेढ़ करोड़ लोगों की जान ली। दूसरा विश्वयुद्ध पहले विश्वयुद्ध से भयानक था। छह करोड़ लोग मारे गए। एक अनुमान के अनुसार 1940 की विश्व जनसंख्या का लगभग तीन प्रतिशत हिस्सा काल का ग्रास बना।

सत्तर साल पहले परमाणु आक्रमण में हिरोशिमा तबाह कर दिया गया। इस पाशविक हमले ने दुनिया के सामने बहुत से हिला देने वाले सवाल रख दिए। हिरोशिमा और नागासाकी की तबाही के मंजर ने लेखकों, पत्रकारों, दार्शनिकों के सामने जीवन-मृत्यु का प्रश्न बहुत तीखे ढंग से उपस्थित हुआ। युद्ध, फासीवाद, तबाही, प्रेम, स्त्री उपेक्षा, प्रेम का दुख जैसे अनेक मानवीय अनुभवों पर अनेक सुंदर कहानियां विश्व-भर में रची गई। ‘हरि अनंत हरि कथा अनंता’ की तरह विश्व कथा विस्तृत और बहुरंगी है। उसमें से कुछ हीरे-मोती इस किताब के लिए चुने गए हैं।
तीन दुनियाओं की इक्कीस और कहानियां : तरसेम गुजराल; अमन प्रकाशन, 104 ए/ 80 सी, रागबाग, कानपुर; 250 रुपए।

श्रीमद्भगवद् गीता
श्रीमद्भगवद् गीता महाभारत का अंश है। लेकिन यह स्वयं में एक पूर्ण आध्यात्मिक ग्रंथ है। कई विद्वानों ने इसे ज्ञान योग का, कई ने भक्ति योग का, तो कई ने इसे कर्मयोग का ग्रंथ माना है। लेखक की दृष्टि में यह सहज योग का ग्रंथ है। पतंजलि इसे क्रियायोग कहते हैं। संतों की परंपरा इसे संतमत कहती है। गुरुसिक्ख परंपरा इसे गुरमत कहती है।
गौतम बुद्ध की परंपरा में आगे चल कर इसे सहजयान कहा गया। नाथ परंपरा के अग्रणी संत गुरु गोरखनाथ और सिद्धों की परंपरा के अग्रणी संत सरहपा ने इसे सहजयोग कहा। संत मत के संस्थापक कबीर और गुरमत के प्रवर्तक गुरु नानक ने भी गीता के इसी मत का प्रचार-प्रसार किया।

सहज योग के पांच उपदान हैं, जिसे गीता में स्थापित किया गया है- सहज जीवन, ओंकार, ज्ञानयोग, भक्तियोग और कर्मयोग। इस प्रकार साधना के लिए आज के मनुष्य के लिए सहज योग को सर्वाधिक संगत ठहराया गया है। यही गीता मत है। यही संतमत है। यही गुरमत है। यही ओशोमत अर्थात ओशोधारा का मार्ग है। भगवद्गीता का यह भावानुवाद उन सभी को समर्पित है, जो कृष्ण को प्रेम करते हैं तथा गीता में प्रतिपादित सहजयोग के मार्ग पर चलना चाहते हैं।
श्रीमद्भगवद् गीता : ओशो सिद्धार्थ औलिया; ओशो नानक ध्यान मंदिर (बुक डिविजन), मुरथल, सोनीपत; 150 रुपए।

हवा जोश में है
बीते कुछ सालों में हिंदी गजल का काफी तेजी से विस्तार हुआ है। हालांकि अब भी इसके स्वरूप को लेकर बहसें होती रहती हैं। कई लोगों का आरोप है कि हिंदी गजल ने गजल विधा के पैमाने को तोड़ा है, यह वह नहीं है, जो उर्दू गजल है। मगर कई ऐसे लोग भी हैं, जो उर्दू के साथ-साथ हिंदी में भी गजल लिख रहे हैं और खूब लिख रहे हैं। अजीज अंसारी भी उनमें एक हैं। अजीज अंसारी के कई गजल संग्रह उर्दू और देवनागरी दोनों में साया हैं, तो कुछ संग्रह सिर्फ हिंदी गजलों के हैं। उनका यह नया संग्रह भी उनमें एक है।

अजीज अंसारी की गजलों का मिजाज अपने समकालीन गजलकारों से बिल्कुल जुदा है। वे शब्दों से खेलना जानते हैं। विषय को नए अंदाज में पेश करने का प्रयास करते हैं। यों उनकी गजलों में भी अपने समाज, देश के मसले हैं, तो इश्क-ओ-नाज की नाजुकी है। देशभक्ति का जज्बा है, तो जम्हूरियत से जुड़े सवालात हैं, पर वे तल्ख बातों को भी गजल की नाजुकी के साथ पेश करते हैं और बड़े हौले से कई चुभते सवाल छोड़ जाते हैं।
हवा जोश में है : अजीज अंसारी; यश पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, 1/10753, सुभाष पार्क, नवीन शाहदरा, दिल्ली; 250 रुपए।