प्रेम ऐसी शक्ति है, जो मनुष्य को उदात्त भाव से भर देती है। हमारे जीने का नजरिया, सोच का ढंग और दूसरे के प्रति व्यवहार पर प्रेम का गहरा और व्यापक प्रभाव पड़ता है। प्रेम अपार सुखदायक है, पर साथ ही वह हमें जीवन के दुखों को सहने का सामर्थ्य और क्षमता देता है। इसकी दूसरों के कष्टों के निवारण करने में भी महती भूमिका है। इसलिए शायद ही कोई इस संवेदना से अछूता है।

प्रेम जैसी सर्वव्यापी और शाश्वत अनुभूति को महसूस करना जितना सहज और सरल है, उस पर लिखना शायद उतना ही कठिन। यह प्राय: स्वीकार्य है कि आज प्रेम कहानियों और कविताओं का नितांत अभाव है। और जो लिखी जा रही हैं, वे स्तरीय नहीं हैं और प्रेम के उदात्त तथा बहुस्तरीय स्वरूप को उद्घाटित नहीं करतीं। उसमें उस संवेदना का अभाव है, जो पाठकों को अंदर तक झकझोरने में सफल हो। वे मर्म को नहीं छू पातीं जैसा प्रभाव गुलेरी की ‘उसने कहा था’ का आज भी जन मानस पर दिखलाई पड़ता है।
इस संग्रह की कहानियों में प्रेम के उत्तर आधुनिक स्वरूप के विभिन्न पक्षों और आयामों को रेखांकित करने का प्रयास किया गया है, जिनसे गुजरते हुए पाठक प्रेम के आधुनिक स्वरूप और स्वभाव से रूबरू हो सकेंगे।
उत्तर समय की प्रेम कहानियां : संपादन- शैलेंद्र सागर; नमन प्रकाशन, 4231/1, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली; 450 रुपए।

तुम्हारी रोशनी में

संस्मरणों के माध्यम से रचनाकार न सिर्फ अपनी स्मृतियों को ताजा करता, पुराने दिनों को नए सिरे से जीने का प्रयास करता, बल्कि उसमें बहुत सारे लोगों के जीवन की तहें भी खोलने-दिखाने, उसे समझने-समझाने का प्रयास करता है। संस्मरण नितांत वैयक्तिक दृष्टिकोण होता है, उसमें रचनाकार के देखने-परखने, अनुभव करने के अपने ढंग होते हैं। किसी व्यक्ति से जुड़े एक व्यक्ति के संस्मरण दूसरे कई लोगों के संस्मरणों से इसी अर्थ में भिन्न हो जाते हैं। उसमें विरोधाभास या वैचारिक विरोध भी नजर आ सकता है, पर यह सही है कि किसी एक ही व्यक्ति को लेकर लिखे गए हर संस्मरण से उसके अलग-अलग रंग उभरते हैं। कमल कुमार की इस किताब में संकलित विभिन्न रचनाकारों से जुड़े उनके संस्मरण इसीलिए अलग और अपने ढंग के हैं।
इस किताब में कमल कुमार के इकतीस रचनाकारों-कलाकारों से जुड़े संस्मरण संकलित हैं। इनमें आलोचक-अध्यापक भी हैं, कवि भी, कथाकार, नाटककार और नृत्य से जुड़े कलाकार भी। इन सभी रचनाकारों से कमल कुमार का लगातार मिलना-जुलना रहा। उनके साक्षात्कार लिए। पर एक रचनाकार अपनी रचनाओं से बाहर निजी जिंदगी में कैसा होता है, उसके जीवन के रंग कैसे होते हैं, वह सब कमल कुमार के इन संस्मरणों में बहुत सुंदर तरीके से दिखाई देता है।
तुम्हारी रोश्नी में : कमल कुमार; इंद्रप्रस्थ प्रकाशन, के-71, कृष्णानगर, दिल्ली; 450 रुपए।

व्यंग्य समय

व्यंग्य समय में शरद जोशी की कुछ चयनित रचनाएं दी गई हैं। विसंगति के स्रोत, विस्तार और परिणाम की जैसी अचूक परख उनको है, वह उनके समकालीन व्यंग्यकारों तक में दुर्लभ है। हास्य और व्यंग्य का सहजात संबंध उनकी रचनाओं में मौजूद है। बतरस और ललित निबंध के साथ कहावतों और लोक प्रसंगों से विकसित व्यंग्य को शरद जोशी ने हिंदी गद्य का अनिवार्य अंग बनाया। उनके लेखन में विषय-वैविध्य किसी को भी चकित करता है। वे विचार और राजनीति को लेकर बेहद स्पष्ट, पक्षधर, प्रखर और सतर्क लेखक हैं। यही कारण है कि पत्र-पत्रिकाओं में उनके स्तंभों ने एक इतिहास रचा। साहित्य के सैद्धांतिक और व्यावहारिक अंतर्विरोधों पर उन्होंने अद्वितीय लिखा है। वे जीवन के अपार और अबूझ से छोटे-छोटे पल लेकर रचनाएं बुनते हैं। यही विरल यथार्थबोध है, जो परिहास, वक्रोक्ति, आनंद आदि से आगे बढ़ कर रचना को किसी दूसरे ही स्तर पर ले जाता है।
व्यंग्य समय : शरद जोशी; किताबघर प्रकाशन, 4855-56/24, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली; 380 रुपए।

बेखुदी में खोया शहर

इस किताब में संकलित लेखों में निजीपन, व्यक्ति विशेष, लोक-शहर के प्रति अनुराग एकाधिक बार है। लंदन, पेरिस, वियना, शंघाई, कोलंबो, दिल्ली, बंगलुरू, पुणे, श्रीनगर के साथ-साथ मैकलोडगंज, मगध, मिथिला और बेलारही, तिलोनिया, तरौनी जैसे गांव भी है। जेएनयू और जिगन विश्वविद्यालय भी है। ‘ग्लोबल’ और ‘लोकल’ की इस घुमक्कड़ी में जहां कुछ पहचाने चेहरे हैं, वहीं कुछ अनजाने राही। समंदर की आवाज के साथ-साथ डबरा, चहबच्चा की अनुगूंज भी है। होटल-रेस्तरां के साथ-साथ ढाबा भी।
इन पन्नों में समंदर पार से लहराती आती रेडियो की आवाज है। उदारीकरण के बाद अखबार के पन्नों पर फैली ‘खुश खबर’ है। ‘न्यूजरूम नेशनलिज्म’ की आहट भी। बॉलीवुड का स्थानीय रंग है, हिंदुस्तानी और लोक संगीत की मधुर धुन है, साथ ही नौटंकी का शोकगीत भी। मिट्टी पर बने कोहबर की खुशबू एक तरफ है, हवेलियों में बिखरते भित्तिचित्र दूसरी तरफ।
बेखुदी में खोया शहर- एक पत्रकार के नोट्स : अरविंद दास; अनुज्ञा बुक्स, 1/10206, लेन नं. 1 ई, वेस्ट गोरख पार्क, शाहदरा, दिल्ली; 375 रुपए।