कैंपस में घुसते ही गार्ड ने सैल्यूट मारी थी। गाड़ी नंबर देखा और फिर कार्डलेस पर अगले गार्ड को सूचना दी कि साहब आ गए हैं। कॉलेज में एक के बाद एक तीन गेट थे। हरेक पर गार्ड मुस्तैदी से ड्यूटी बजाते दिखे। हर गेट पर सैल्यूट का रिवाज था। मैं देख कर दंग था। मन प्रसन्न हुआ।  खैर, तीसरा गेट पार करने के बाद वह आॅफिस दिखा, जहां मेरी ड्यूटी लगाई गई थी। आॅफिस में घुसा ही था कि वहां बैठे कर्मचारियों ने खड़े होकर मेरा स्वागत किया। परीक्षा नियंत्रक अपनी कुर्सी छोड़ कर उठ खड़ा हुआ। आगे बढ़ा और बोला- ‘आइए सर बैठिए!’ मैंने कहा- ‘नहीं, यह कुर्सी आपकी है।’ उसने सामने की तरफ इशारा किया, ‘सर, आपके लिए अलग से व्यवस्था की है।’ मैंने देखा एक साफ-सुथरी टेबिल-कुर्सी लगी थी। बगल में कूलर चल रहा था। खाकी यूनिफार्म में सावधान की मुद्रा में प्यून खड़ा था। वह अलग से पहचान में आ रहा था। नियंत्रक ने उसे इशारा किया। बोतल खोल कर गिलास में पानी भरते हुए वह बोला- ‘सरजी, नाश्ते में क्या लेंगे?’ मुझे अटपटा-सा लग रहा था। मैं कुछ देर सोचने लगा। लेकिन वह मुस्तैदी से खड़ा था, जवाब के इंतजार में। मैंने पूछा- ‘तुम्हारा नाम क्या है?’ वह उत्साहित होकर बोला, ‘जीवनलाल!’ मैंने कहा- ‘भाई जीवनलाल, मैं घर से खाना खाकर चला हूं। चाहो तो चाय और बिस्कुट ला सकते हो।’ उसे भाई संबोधित करने से शायद नियंत्रक को अच्छा नहीं लगा। उसने प्यून को घूर कर देखा और बोला- ‘मुंह क्या देख रहे हो, जाओ जल्दी!’ वह खुद परीक्षा के पेपर खुलवाने के लिए एक पेन और कैंची ले आया। मेरी टेबल पर रख कर अपने असिस्टेंट को आदेश दिया- ‘शर्मा, पेपरों का बंडल ले आओ।’ बंडलों पर पहले मेरे हस्ताक्षर होने थे। उसके बाद कैंची से वह खाकी पैकेट को काटता।

असिस्टेंट शर्मा ने एक-एक कर पैकेट मेरे सामने रखे। हस्ताक्षर का स्थान बताया और पैकेट काटने लगा। इस दौरान वह नजरें झुकाए हुए था। जब सारे पैकेट खुल चुके तो पेपर की गिनती कर वह पीले लिफाफों में भरने लगा, जिन पर कक्ष क्रमांक और पेपरों की संख्या का ब्योरा लिखा हुआ था। तभी जीवनलाल चाय और बिस्किट के साथ कुछ नमकीन भी ले आया था। टेबिल पर रखते हुए बोला- ‘सर, नमकीन लेंगे?’ मैंने कहा- ‘हां, थोड़ा-सा।’  वह ट्रे रख कर जाने लगा कि तभी एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति सामने आ खड़ा हुआ। नियंत्रक अपनी कुर्सी से उठ कर आ गया। उसका परिचय करवाने लगा- ‘सर, दुबजी से मिलिए। आप हमारी संस्था के प्रिंसिपल कम डायरेक्टर हैं।’ मैंने हाथ आगे बढ़ाया- ‘प्लीज, हैव ए सीट!’ वह दुविधा में दिखा। शायद सोच रहा था कि बैठना उचित है या नहीं। मैंने जोर दिया- ‘बैठिए न सर!’ ‘सर’ शब्द मानो पूरे आॅफिस में गूंज गया। सभी एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे और मुझे लगा कि शायद मैंने गलत संबोधित तो नहीं कर दिया।  डायरेक्टर खुशामदी लहजे में बोला- ‘आपको यहां आने में किसी प्रकार की तकलीफ तो नहीं हुई?’  ‘नहीं, पहले कभी ऐसी चाक-चैबंद व्यवस्था मैंने कहीं नहीं देखी।’

वह संतुष्ट हुआ। बोला- ‘चलिए मैं आपको वे कमरे दिखाए देता हूं, जहां परीक्षा होनी है।’ मैं उठ खड़ा हुआ। पहले कक्ष में पहुंचा और कलाई घड़ी पर नजर डाली। ठीक ग्यारह बज रहे थे। परीक्षा शुरू हो चुकी थी। परीक्षक मुस्तैदी से अपने काम में लगे हुए थे। चारों तरफ नजर घुमाई। वहां कैमरों की व्यक्स्था थी। वह बोला- ‘सर मॉनीटर पर भी देख सकते हैं आप। आपकी कुर्सी के ठीक सामने मॉनीटर लगा हुआ है।’ मेरे लिए आश्चर्य का विषय था। एक-एक करके सारे कक्षों का निरीक्षण करवा दिया उसने। लौटते वक्त बोला- ‘संस्था की ओर से जीवनलाल आपकी सेवा में रहेगा। जो भी जरूरत हो आप निसंकोच उससे कह सकते हैं।’ धीरे-धीरे हम वापस लौट रहे थे। कुछ देर की चुप्पी के बाद वह फिर बोला- ‘सर आपको चेयरमैन से मिलवा देता हूं।’ उसने घड़ी देखते हुए कहा।  जरूरत है इसकी?’ मैंने उसके चेहरे की तरफ देखा।  ‘आपकी मर्जी! हम आप पर जोर नहीं डाल सकते। लेकिन मैम मिलना चाहती हैं आपसे।’  ‘अच्छा ठीक है। चलिए!’ मैं उसके पीछे हो लिया। उसने फिर चुप्पी साध ली। चुपचाप चलता रहा। एक बड़े-से कक्ष के दरवाजे पर आते ही रुका। दरवाजा खोलते हुए बोला- जाइए सर!’  आप नहीं चलेंगे?’ मैंने उससे आग्रह किया।  ‘नहीं सर, मैम के आदेश के बिना हम अंदर नहीं जा सकते।’  ‘मगर आप तो इस संस्था के डायरेक्टर हैं, संस्था प्रमुख हैं।’  उसने बुरा-सा मुंह बनाते हुए कहा, नाम के…!’ वहां रखी बेंच पर बैठते हुए उसने कहा- ‘मैं यहीं आपका इंतजार कर रहा हूं।’

अंदर जाते ही मैंने देखा, एक थुलथुल किस्म की महिला बड़ी-सी कुर्सी पर विराजमान थी। टेबल पर पेपरवेट नचाते हुए कुछ सोच रही थी। मुझे देखते ही अचानक उसके हाथ रुक गए। पेपरवेट एक जगह थम गया। उसके चेहरे पर बनावटी मुस्कान तैरने लगी- ‘आइए सर, बैठिए!’ कुर्सी सरका कर मैं उसके ठीक सामने बैठ गया। ‘कैसे हंै?’ उसने उड़ती हुई नजरों से मेरी तरफ देखा और उत्तर का इंतजार किए बगैर घंटी बजाई। बाहर खड़ा प्यून अंदर आया। उसके सामने नतमस्तक हुआ। घीरे से बुदबुदाया- ‘जी मैम!’  ‘जाओ, चाय-नाश्ता वगैरह ले आओ साहब के लिए।’  मैंने तुंरत उन्हें रोका- ‘रहने दीजिए मैम, में अभी-अभी चाय नाश्ता लेकर आ रहा हूं।’  ‘सच कह रहे हैं आप?’ पल्लू ठीक करते हुए वह बोली।  ‘हां, बिलकुल सच! मेरे आने के पहले ही आपकी ओर से व्यवस्था थी।’ उसने दोबारा पेपरवेट पकड़ लिया। प्यून को वापस जाने को कहा और विषय बदलते हुए बोली- ‘आपकी उम्र को देखते हुए लगता है कि रिटायरमेंट में ज्यादा वक्त नहीं है।’  ‘जी हां, अगले वर्ष इसी महीने…।’  ‘तो फिर आप हमें ज्वाइन कर सकते हैं।’  ‘सोचंूगा, समय दीजिए…।’  ‘मगर इसमें सोचने की क्या बात है? आप डाक्ट्रेट हैं। यह जो बाहर बैठा है, दुबे, साइंस में पीजी है। नार्म्स के हिसाब से हम चाहते हंै कि डाक्ट्रेट होना चाहिए। वैसे आप कितना पैकेज चाहते हैं?’

‘अभी कुछ भी सोचा नहीं मैम! रिटायरमेंट के बाद की कोई प्लानिंग नहीं है…। इस विषय में बाद में बात कर सकते हैं। इस समय मुझे जाने की इजाजत दीजिए।’ मैंने कुर्सी से उठते हुए कहा। डायरेक्टर के प्रति उसकी सोच कहीं मुझे चुभ गई थी। उसके कहे शब्द मेरे कानों में गूंजने लगे थे।  इसके बाद लगभग रोज आना-जाना होता था, इंसपेक्शन का रूटीन बन गया था। दिन में एक-दो दफे सभी कक्षों का मुआयना करना, परीक्षकों को छोटे-मोटे निर्देश देना और फिर अपनी कुर्सी पर आकर बैठ जाना। इस दौरान नियंत्रक और उसका असिस्टेंट काम में लगे रहते। हम लोगों के बीच कोई संवाद नहीं होता। शायद वे लोग मुझे समझने की कोशिश में लगे थे। परीक्षा खत्म होते ही बड़े-बड़े बंडल हस्ताक्षर के लिए मेरी टेबल पर ले आते। सामने हाथ बांधे खड़े रहते और आते-जाते अपनी सीट से खड़े होकर सम्मान प्रकट करते।

मैं रोज देखता था, नियंत्रक का असिस्टेंट लंच के समय भी काम में जुटा रहता था। अकेले लंच लेना मुझे गवारा नहीं था। लेकिन मैंने महसूस किया था कि उनका अपना अलिखित प्रोटोकॉल है। उसके अनुसार स्टाफ का मेरे साथ मेल-मिलाप वर्जित था। मैं भी नहीं चाहता था कि मेरे कारण किसी का नुकसान हो। इसलिए बहुत कम बोलता था। हमेशा की तरह लंच के समय जीवनलाल एक प्लेट में इडली रख गया था। मैंने असिस्टेंट को आवाज दी- ‘उमेश इधर आओ! थोड़ा-सा तुम भी ले लो। आज खाने का मन नहीं है।’ उसने इंकार करते हुए कहा- ‘सर, कोई देख लेगा तो मेमो मिलेगा।’ मैंने कहा- ‘यहां कोई नहीं है।’ उसने कैमरे की तरफ इशारा किया, चेयरमैन मॉनीटर पर देखती रहती हैं।’  ‘तो फिर आड़ में आ जाओ।’ उसने एक बाउल में एक पीस इडली रखी और आड़ में खड़े होकर जल्दी-जल्दी खाने लगा। खाते-खाते न जाने क्या हुआ, वह खुलने लगा। बोला- ‘सर, आपके आने से परीक्षक तो खुश हैं, पर नियंत्रक और डायरेक्टर कह रहे थे कि पिछले साल आए आर्ब्जवर स्ट्रिक्ट थे। लगता था परीक्षाएं हो रही हैं। पर अब खानापूर्ति है। अच्छा होता कि कोई आब्जर्वर ही न होता। ये तो न लीपने के हैं और न पोतने के…। मगर सर, यह बात किसी से न कहिएगा।’

तभी नियंत्रक आ टपका। उसे मेरे साथ लंच लेते देख ठगा-सा खड़ा देखता रहा और फिर तमतमाते हुआ उल्टे पांव लौट गया। असिस्टेंट पसीने-पसीने था। बोला- ‘सर, अब गई मेरी नौकरी।’ मैंने कहा- ‘तुम चिंता मत करो ऐसा कुछ नहीं होने वाला।’ परीक्षा का आखिरी दिन था। उस दिन परीक्षार्थी कम थे। मैं रिलैक्स मूड में था। जीवनलाल अखबार रख गया था। नियंत्रक मेरे सामने रजिस्टर लिए मौन खड़ा था। साथ में पेपरों का लेखा था। मैंने कहा- ‘बैठ जाइए।’ उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। कैमरे की तरफ देखा और ना में सिर हिला दिया। मैंने फिर कहा- ‘बैठो भाई, मैं कोई तीसरी दुनिया से आया इंसान नहीं हूं। तुम्हारी तरह ही हाड़-मांस का बना हूं।’ दोबारा उसने कैमरे की तरफ देखा। तभी जीवनलाल आ खड़ा हुआ। नियंत्रक ने उसे घूर कर देखा। वहां से हट जाने का इशारा किया, लेकिन वह अविचिलित खड़ा रहा। मेरी ओर मुखातिब होकर बोला- ‘सर मन में एक बात कई दिनों से उठ रही है, लेकिन पूछने की हिम्मत नहीं कर पर रहा था। आज परीक्षा का आखरी दिन है, इसलिए पूछ सकता हूं।’

मैंने मुस्कुराते हुए कहा- ‘डरने की बात नहीं है जीवनलाल, जो भी तुम्हारे मन में है खुल कर कह सकते हो।’ उसने लंबी लांस ली। नियंत्रक की ओर देखा और बोला- ‘पिछले साल जो सर आए थे वे स्ट्रिक्ट थे।’  मैंने कहा- ‘तुम्हें मैं अच्छा नहीं लगा?’  नियंत्रक के चेहरे पर व्यंग्यपूर्ण मुस्कान थी। उसे उम्मीद नहीं थी कि एक प्यून भी ऐसा सवाल पूछ सकता है। उसने प्रशंसाभरी नजरों से जीवनलाल की तरफ देखा। बोला- ‘सर, उस समय लगता था कि परीक्षाएं हो रही हैं। सारे परीक्षक यहां-वहां भागते-फिरते थे। एक डर था।’  मैंने कलाई घड़ी पर नजर डाली। ठीक चार बज रहे थे। कुर्सी से उठते हुए बोला- ‘क्या अभी परीक्षाएं अव्यवस्थित थीं? क्या डराने-धमकाने से ही परीक्षाएं सुचारु और चाक-चैबंद होती हैं। अभी तक छात्र अनुशासन में परीक्षाएं दे रहे थे। मुझे और क्या चाहिए? तुम्हें भी खुश होना चाहिए। दरअसल, दोष तुम्हारा नहीं, सिस्टम का है। तुम्हें गुलामों की तरह जीने की आदत पड़ गई है। जब तक कोई डांटे-दुत्कारे नहीं, तुम्हारा मन नहीं भरता। एक मानसिकता बन गई है। गेट के अंदर घुसते ही तुम लोग जानवर बन जाते हो। जब तक कोई लाठी न बजाए, तुम्हें अच्छा नहीं लगता।’ वे सब मौन खडे थे। सन्नाटा पसर गया था और मैं आॅफिस से बाहर निकल आया था।  बाहर दुबेजी तेजी से चले आ रहे थे। मुझे देख कर रुक गए। ‘सर मैं आपके पास ही आ रहा था। मैम ने यह लिफाफा भेजा है।’ ‘क्या लिखा है?’ ‘यह तो तुझे नहीं मालूम, पर आपके लिए खुशखबरी है।’  ‘कैसी?’

‘प्रपोजल है सर! सत्तर हजार की सेलेरी का आॅफर है।’ मुझे हंसी आ गई। मैंने कहा- ‘रखिए इसे अपने पास। मैडम को धन्यवाद कहिए और कहिए कि मैं औरों की तरह पिंजरे में तोते की तरह नहीं रह सकता…। लेकिन आपकी क्या मजबूरी है? दिन भर खटते हैं। मुझसे अच्छी पोस्ट पर हैं, फिर भी…?’ डायरेक्टर की आंखें भर आर्इं। बोला- ‘मजबूरी है सर! उम्र हो गई है। इस वातावरण में रहते-रहते अब नहीं लगता कि बंधुआ जैसे हैं। पहले कभी सोचते थे जब नए-नए आए थे। अब देखिए…।’ उसने अपने कंधे उचकाए और आगे बोला- ‘कटे पंख के तोते जैसे हैं। पिंजरा न सही, मगर इस बाऊंड्री के बाहर उड़ान नहीं भर सकते।’ ०