मोहनदास नैमिशराय

घाटी में बर्फ पिघलने लगी थी। आंधी की तरह चुनाव आए और तूफान की तरह चले गए। राजनीति के युद्ध में जो जीते, वे सिकंदर हो गए थे। सत्ता की भूख उन पर हावी होने लगी थी। सुबह स्टडी रूम में नत्थू ने मेज पर पानी का गिलास रखा तो वासुदेव ने राज्य में सरकार बदलने की जानकारी दी। सुन कर नत्थू ने सिर्फ इतना ही कहा कि उसे रात में ही जानकारी हो गई थी।
‘द पालिटिकल मूवमेंट अमंग दलित इन इस्टर्न यूपी’ विषय पर शोध कर रहे वासुदेव को नत्थू की चुनावी जानकारी से थोड़ा आश्चर्य हुआ था। अभी-अभी उन्होंने खबर पढ़ी थी, जिसमें हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव के परिणाम थे। हो सकता है नत्थू ने अखबार घर पर पढ़ लिया हो।… तभी उनकी विचार तंद्रा टूटी। नत्थू ने सवाल किया, ‘साब आज सूरज पूरब से ही उगा है न।’
‘हां भई, वह तो पूरब से ही उगेगा।’ जवाब दिया था वासुदेव ने
नत्थू का स्वर पुन: उभरा, ‘और अस्त भी पश्चिम में ही होगा।’

इससे पहले कि वासुदेव कुछ कहते, नत्थू चला गया। वासुदेव अकेले रह गए थे। वे सोचने लगे कि नत्थू ने ऐसा क्यों कहा? फिर धीरे-धीरे उनकी समझ में आने लगा। आदमी की जब उम्र अधिक हो जाती है तो वह सांकेतिक रूप में ही बातें किया करता है। नत्थू भी उनमें से एक है। चुनाव विश्लेषण का तरीका भी बड़े-बूढ़ों का अलग हुआ करता है। नई पीढ़ी के लोग गिनती में विश्वास करते हैं, लेकिन पुराने लोग समूह या जाति की नब्ज को पहचान कर अपनी बात कहते हैं। वे नतीजे आने से पहले समाज की धड़कन को महसूस कर लेते हैं।
लगभग आधा घंटे बाद नत्थू केतली में चाय ले आया। यह उसका रोज का नियम था। पहले नीचे चौकीदार से चाभी लाकर स्टडी रूम के दरवाजे का ताला खोलता, फिर भीतर जाकर सफाई में लग जाता। उससे निबट कर जग में पानी ले आता और गिलास में पानी डाल कर उसे ढंक कर टेबल पर रख देता।

अब तक वह केतली से प्याले में चाय उंड़ेल चुका था। पहले उसने वासुदेव की ओर चाय से भरा प्याला बढ़ाया फिर केतली में बची चाय को अपने प्याले में डाला। चाय पीते हुए उसने कहा, ‘साब, चुनाव भी अब मौसम की तरह हो गए हैं। किसी को सुख दें तो किसी को दुख। चुनाव आते हैं तो घाटी में तकलीफें बढ़ जाती हैं।’
वासुदेव बोले, ‘पर चुनाव होना तो अच्छी बात है। प्रजातंत्र में चुनाव तो होने ही चाहिए।’
सुन कर नत्थू का व्यंग्यात्मक स्वर उभरा, ‘प्रजातंत्र!’ कहते हुए नत्थू जेब से बीड़ी निकाल कर बालकानी में चला गया था। यह भी उसका रोजाना का नियम था। चाय पीने के बाद वह बीड़ी जरूर पीता था। और बीड़ी पीने के बाद नीचे चला जाता। नीचे जाने के लिए हर बार वह बताता नहीं था। एक बार कह दिया था, ‘साब अगर कोई काम हो तो रिशेप्सन पर बता देना। मैं आ जाऊंगा।’

रिशेप्सन पर ही फोर्थ क्लास कर्मचारियों की पंचायत बैठती थी। नत्थू चला गया था। अपने स्टडी रूम में अकेले रह गए थे वासुदेव। उनके कान में अब भी उसके व्यंग्य से कहे शब्द खासकर प्रजातंत्र गूंज रहा था। जैसे नत्थू ने कहना चाहा था- ‘साब प्रजातंत्र किस चिड़िया का नाम है?’
उनके भीतर बेचैनी भरने लगी थी। कुर्सी से उठ कर उन्होंने खिड़की से झांक कर देखा। बारिश शुरू हो गई थी। मौसम सर्द होने लगा था। उन्होंने हीटर चला दिया और ताप से शरीर को गर्मी पहुंचाने का प्रयास करने लगे। शरीर को गरमाहट मिली तो अच्छा लगा। फिर उन्होंने अपने दोनों पांव फैला लिए थे। बारिश अभी थमी नहीं थी। थोड़ी देर तक वे गिरते हुए पानी को देखते रहे। घाटी में होती बारिश में भीगते पहाड़। सचमुच एक आकर्षण होता है।
संस्थान में नए डायरेक्टर आए। उनके साथ था एक अदद कुत्ता। हाथ में ब्रीफकेस, आंखों पर घूप का चश्मा। उम्र होगी करीब पचास-पचपन वर्ष। शरीर पर गरम कपड़े। मोबाइल पर बात करते हुए कार की पिछली सीट से बाहर आए तो स्वागत के लिए ड्राइवर के साथ उनका व्यक्तिगत सहायक रधुनाथ पांडे और उसके पीछे माली, रसोइया, चौकीदार हाथ बंधे खड़े थे। सभी ने झुक कर नमस्ते की। डायरेक्टर ने बारी-बारी से नमस्ते का जवाब दिया और मुख्य दरवाजे से प्रवेश किया। सबसे आगे डायरेक्टर, उनके एक तरफ चलने वालों में पांडे, दूसरी ओर उनका कुत्ता और इन तीनों के पीछे अन्य सब।

डायरेक्टर का कमरा पहले से सजा दिया गया था। दो माली और दो चपरासियों की ड्यूटी लगा दी गई थी। नए मेजपोश पर सुंदर और चटकदार रंगों के फूलों के गुलदस्ते देख कर सहसा डायरेक्टर के मुंह से निकला था, ‘गुड।’जैसे मालियों को उनकी मेहनत का ईनाम मिल गया था। वे प्रफुल्लित थे। चपरासी भी फूले नहीं समा रहे थे। रधुनाथ के होंठो पर हल्की मुस्कान उभर आई थी। तुरता-फुरती में चाय के साथ बिस्किट और नमकीन की प्लेट टेबल पर सजा दी गई थी। अति उत्साही स्वर में रधुनाथ पांडे बोला, ‘सर टामी के लिए बिस्किट।’
‘ओह।’  चाय का पहला घंूट भरते हुए डायरेक्टर ने ब्रीफकेस से कुत्ते के लिए स्पेशल बिस्किट निकाल कर संकेत से खाने को कहा था। टामी के बैठने के लिए एक अलग कुर्सी रख दी गई थी। टामी मालिक का संकेत पाकर उछलते हुए कुर्सी पर बैठ गया था। कुत्ते को कुर्सी पर बैठा देख सभी के मन में अजीब-सा अहसास हुआ। कुछ के होंठो पर मुस्कान थिरक उठी, तो कुछ ने मुंह बनाते हुए अपने होंठों को सिकोड़ा। संस्थान में पहली बार ऐसा हुआ कि डायरेक्टर के साथ कोई कुत्ता कुर्सी पर बैठा था। हालांकि उनका कुत्ता बन कर तो बहुत-से बैठे थे, लेकिन सचमुच का कुत्ता, निश्चित ही आज का दिन इतिहास से जुड़ गया था। डायरेक्टर यानी मि. डेविड ने बहुत बड़ी क्रांति कर दी थी। कुत्तों और इंसानों के बीच का भेद ही खत्म कर दिया था। उन ब्रिटिश गवर्नर से भी दस कदम आगे निकल गए थे, जिन्होंने इसी शिमला के माल रोड के बारे में फरमान जारी किया था कि ‘डाग्स ऐंड इंडियंस आर नाट अलाउड।’ मि. डेविड ने तो कुत्ते को कुर्सी देकर उसका सम्मान बढ़ाया था।

डायरेक्टर चेंबर में कुत्ते के कुर्सी पर बैठने की चर्चा सारे दिन होती रही। शाम को कर्मचारी घर जाते हुए आपस में खूब मजाक करते रहे। कुछ ने तो घर पहुंचते ही अपनी बीवी-बच्चों को भी इस ऐतिहासिक घटना के बारे में बताया। उन सबने अपने पड़ोसियों को और पड़ोसियों ने अपने रिश्तेदारों को। चौबीस घंटे में समूचे शिमला में यह खबर अफवाह बन कर फैल गई। संस्थान का नाम तो पहले से ही था, इस अनोखी घटना से और नाम हो गया।
सुबह की चाय नत्थू लाया तो वासुदेव पूछ बैठे, ‘कैसे हो नत्थू?’
केतली से चाय प्याले में उंडेलते हुए नत्थू ने जवाब में कहा, ‘ठीक हूं साब।’
‘तुमने सुना, डायरेक्टर ने अपने कुत्ते को बराबर की कुर्सी पर बैठाया।’
‘साब, मैंने ही नहीं सुना, सारे शिमला में चर्चा है।’
‘अच्छा!’
‘साब एक बात कहूं।’
‘हां, कहो न।’
‘साब मुझे तो लगता है कि डायरेक्टर के कुत्ते को अभी तो कुर्सी ही मिली है। आगे-आगे देखना क्या होगा।’
वासुदेव उत्सुकता में पूछ बैठे, ‘आगे-आगे क्या होगा?’

धैर्य से जवाब दिया था नत्थू ने, ‘साब, अभी कुत्ते को बिस्तर भी चाहिए न, बिस्तर मिला तो अलग रूम चाहिए। उसके खाने-पीने के बर्तन अलग होने चाहिए। यही नहीं, उसकी देखभाल करने के लिए अलग से एक आदमी भी चाहिए। अलग डाक्ॅटर भी चाहिए। कुत्ते को नहलाने-धुलाने के लिए अलग नर्स भी चाहिए।’ कहते हुए नत्थू ने वासुदेव की तरफ देखा। वासुदेव सहजता से बोले, ‘नत्थूजी, कुत्ते की ही देखभाल में सब लग गए, तो इस इंस्टीट्यूट का क्या होगा?’
‘इंस्टीट्यूट का तो अब ऊपर वाला ही जाने। जोरों से बरसात आने दीजिए। नीचे लाइब्रेरी में पानी भर जाता है। हो सकता है कुत्ते के लिए स्विमिंगपूल ही बन जाए।’
‘वह क्यों?’
‘हर बरस मरम्मत के नाम पर लाखों रुपए अफसरों के पेट में जो चले जाते हैं।’
‘कब से ऐसा चल रहा है?’
‘लगभग दस बरस से।’
आश्चर्य से वासुदेव के मुंह से निकला, ‘क्या?’
नत्थू जब खुलता है तो खुलता चला जाता है। बिना बताए उसके पेट की रोटी हजम नहीं होती। इंस्टीट्यूट में डेली वेजेज से लेकर कान्ट्रेक्ट बेसिस पर कार्यरत कर्मचारियों के बारे में वह बताता है। सफाईकर्मी महिलाओं की दिक्कतों के बारे में बताना भी नहीं भूलता। यह सब सुन कर वासुदेव कह उठते हैं, ‘पर बजट की तो इंस्टीट्यूट में कमी नहीं है। कहां जाता है आखिर करोड़ों का बजट?’
‘अफसरों के पेट में।’

डायरेक्टर के इंस्टीट्यूट में ज्वाइन करने के दो-तीन दिनों में ही फरमान जारी हो गए। कर्मचारियों को सुबह आॅफिस में समय पर आने की ताकीद की गई। आदेश में यह भी जोड़ा गया कि सफाई कर्मचारी सफाई ठीक से करें। मालियों को हिदायत दी गई कि वे हेड गार्डनर को रोज काम की रिपोर्ट दें। अंत में लिखा था- इस ऐतिहासिक इमारत को दो माह पहले ‘हेरिटेज’ में शामिल कर लिया गया था। यह संस्थान के सभी कर्मचारियों के लिए गर्व की बात है।  रिसेप्शन के पास तृतीय और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की पंचायत में आज बहस का विषय था डायरेक्टर द्वारा जारी किया गया फरमान। दोपहर के बारह बजे थे। सबने अपने-अपने काम लगभग पूरे कर लिए थे। चाय का आर्डर दिया हुआ था। उनके भीतर चाय की तलब जोर मार रही थी। तभी कोई बोला, ‘चाय अभी तक आई नहीं।’
दूसरे ने तपाक से कहा, ‘अभी ठहरना पड़ेगा।’
‘क्यों?’
‘डायरेक्टर का दूसरा फरमान आने वाला ही है।’
‘उसमें क्या लिखा होगा ?’
‘यही कि कर्मचारियों को चाय कम पीनी चाहिए।’

सुन कर सभी ने एक-दूसरे की तरफ देखा था। तभी नत्थू भी सीढ़ियां उतरते हुए आ गया। पंचायत के बीच चर्चा जारी थी। वह पूछ बैठा, ‘किस बात पर चर्चा हो रही है?’
किसी ने तत्काल जवाब दिया, ‘डायरेक्टर के फरमान पर।’ बड़ी ट्रे में मुखी चाय ले आया। सबने अपने-अपने प्याले संभाल लिए। आज कर्मचारियों की संख्या अधिक थी। ममदू ड्राइवर से लेकर आलम कंपाउंडर, चौकीदार नसीब सिंह, सफाई कर्मचारियों में भुलेराम के साथ घुमनी देवी, फूला माली। तभी डायरेक्टर का चपरासी आया और नत्थू से कहा कि उसे डायरेक्टर आॅफिस में बुलाया है। सुन कर नत्थू ने अजीब-सा मुंह बनाया। नत्थू ने प्याले की चाय खत्म कर कहा, ‘जाना तो पड़ेगा ही।’
वह चला गया था, पर जल्दी ही लौट आया। आलम पूछ बैठा, ‘क्यों बुलाया था डायरेक्टर आफिस में?’
‘मैंने मना कर दिया।’
सुन कर सभी को आश्चर्य हुआ। उनके भीतर से जिज्ञासा उभरे, उससे पहले ही नत्थू ने बताया, ‘कुत्ते की सेवा मैं नहीं करूंगा। साफ मना कर दिया।’
इस बीच कोई कुछ पूछता, वह फिर कह उठा, ‘न मेरी उम्र का लिहाज और न मेरी तीस साल की सेवा की शरम।… मैं बूढ़ा हो चला हूं। अगले बरस रिटायर भी होने वाला हूं। इसका यह मतलब नहीं कि कोई कुछ भी काम कराए।’
सफाईकर्मी भुलेराम ने कहा, ‘हमें यहां काम करते-करते दस बरस हो गए। आज तक परमानेंट नहीं किया और आते ही कुत्ते की फिकर हो गई।’
फुला माली ने भी हां में हां मिलाई, ‘देखो तो भइया, मेरे चार बच्चे हैं। पांच महीने से क्वाटर नहीं मिल सका। दूसरी ओर देखो एक अकेला डायरेक्टर, उसे दस कमरों का महल, तीन टायलेट, दो रसोई, चार बालकानी, कुत्ते के लिए अलग कमरा।’
‘और यहां एक कमरे में सब।’

नसीब सिंह चैकीदार बोला, ‘रिश्तेदार आ जाएं तो परेशानी।’
घुमनी देवी ने पीछे से कहा, ‘बरसात आती है तो हमारे लिए मुसीबत लेकर आती है।’
ममद ड्राइवर भी बोला। सबकी सुनने के बाद नत्थू का स्वर उभरा, ‘इस देव भूमि में हम सब परेशानी उठाने के लिए ही तो हैं।’
सुबह नाश्ता करने के बाद वासुदेव अपने स्टडी रूम की तरफ आए तो दरवाजे पर ताला लगा देख उन्हें आश्चर्य हुआ। उन्होंने डायरेक्टर आफिस में फोन किया तो रघुनाथ पांडे ने बताया कि नत्थू के बारे में कोई सूचना नहीं है। उन्होंने तत्काल पूछा, ‘सूचना नहीं है माने…।’
पांडे ने कहा, ‘मेरे कहने का मतलब यह कि उनकी ओर से छुट्टी की अर्जी नहीं आई।’
‘ओह।’ वासुदेव के मुंह से निकला। तभी पांडे ने बताया कि अभी वे किसी को भेज रहे हैं। जल्दी ही तेईस-चौबीस वर्षीय एक लड़का चाबियों का गुच्छा लिए भागता आया। जल्दी से ताला खोला। स्टडी रूम की साफ-सफाई कर चाय लेने के लिए थर्मस लेकर चला गया। इस बीच वासुदेव अखबार पढ़ने लगे। थोड़ी देर में लड़का चाय ले आया। पूछा तो पता चला कि लड़के का नाम रूनकू है। एक वर्ष पहले उसके पिता की दुर्घटना में मौत हो गई थी। उसे क्षतिपूर्ति आधार पर चपरासी की नौकरी डेली वेज पर दी गई। उन्होंने रूनकू से पूछा कि उसे स्थायी नौकरी क्यों नहीं दी गई, तो रूनकू ने कहा, मालूम नहीं। रूनकू बीए पास था। चाय का थर्मस लेकर वह वापस चला गया।
वासुदेव का मन उद्विग्न हो गया। वे सोचने लगे, यहां सारे कर्मचारी अस्थायी हैं। कोई डेली वेज पर तो कोई कांट्रेक्ट पर। उनके मुंह से निकला, ‘संस्थान हेरिटेज की सूची में आ गया। लेकिन…।’
दोपहर को भोजन के समय उन्होंने एक-दो कर्मचारियों से नत्थू के बारे में पूछा, पर संतोषजनक जानकारी नहीं मिल सकी। वे पेरशान हो उठे। शाम को संस्थान में गोष्ठी थी। उनका मन नहीं हुआ जाने का। वे लाइब्रेरी चले गए और देर रात तक वहीं पढ़ते रहे।
अगले दिन चाय पीते हुए उन्हें फिर नत्थू की याद आई। वे सीढ़ियां उतर कर नीचे आ गए। गैलरी में घुमनी देवी झाडू लगा रही थी। उससे पूछा, ‘तुम्हें पता है नत्थूजी का?’
उसने कहा, ‘भौत बीमार है वो।’
‘क्या हुआ?’

‘इतनी हमदर्दी है तो घर क्यों नहीं जाते उनके। वहीं जाकर पूछना क्या हुआ?’
सुन कर उन्हें अजीब-सा लगा। जैसे उनके भीतर से आवाज आई थी। घर क्यों नहीं चले जाते नत्थू के। वहीं पूछ लेना।
शाम को घुमनी के साथ वे नत्थू के घर गए। छोटा-सा घर, जिसमें बिखरा हुआ घर-गृहस्थी का सामान। बैठने के लिए एक टूटी कुर्सी, उसी पर वे धीरे से बैठ गए। डाक्टर अभी दवाई देकर गए थे। नत्थू बोल नहीं पा रहा था। सिर्फ देखता था। दुखी मन से लौटे थे वे।
एक सप्ताह बीत गया। नत्थू अभी आफिस नहीं आया था। वे हर रोज उसके बारे में पूछते। अलग-अलग लोगों से अलग-अलग जवाब मिलते। उनका मन दुबारा उसके घर जाने का हुआ, कम से कम नत्थू से बात तो हो जाएगी। अब तक तो वह बोलने लगा होगा। अचानक एक दिन सुबह-सुबह नत्थू आ गया। चाय पीते हुए उन्होंने सुना। नत्थू के भीतर से जैसे पीड़ा का लावा निकल रहा हो।
‘मेरी बेटी भाग गई किसी के साथ।’
‘क्या!’ अनायास उनके मुंह से निकला था,
‘हां साबजी।’
‘पर क्यों?’
‘उसका ब्याह नहीं हो सका था।’
‘पर क्यों?
‘गरीब हूं न। दहेज कहां से जुटाता?’
‘पर आफिस से कुछ मदद मिल सकती थी।’
‘मिल सकती थी, पर मिली नहीं।’
‘ऐसा क्यों?’
अफसर ने रिश्वत में एक रात के लिए मेरी बेटी मांगी थी।’
‘क्या!’
‘हां साबजी।’
इस बार लंबी चुप्पी उनके बीच रही। वासुदेव भीतर से आहत हुआ था। तभी चुप्पी तोड़ी थी नत्थू ने, ‘यहां तो एक-एक कर्मचारी के साथ अनगिनत दुख भरी कथाएं जुड़ी हुई हैं। आप कहां तक सुनेंगे?
‘पर यह तो गलत है।’
‘सरासर गलत है। लेकिन…।’
उसके बाद न नत्थू कुछ बोला, न उन्होंने आगे पूछा। स्टडी रूम में वेदना भरी चुप्पी ठहर गई थी। ०