रश्मिस्वरूप जौहरी
आजकल श्रवण दादी के पास गांव आया हुआ है। उसके आने से दादी बहुत खुश हैं। असल में गांव में वे अकेली रहती हैं। श्रवण के मम्मी-पापा शहर में रहते हैं और वह हॉस्टल में। डॉक्टरी का चौथा साल है उसका। गरमी की छुट्टियों में वह दादी से मिलने आ गया।
दादी रोज नए-नए पकवान बना कर श्रवण को खिलातीं।
‘दादी, ऐसे ही अच्छी-अच्छी चीजें खिलाओगी तो मैं वापस नहीं जाऊंगा।’
दादी हंसतीं, ‘अरे मैं तो चाहूं कि तुम यहीं रहो। पर मैं तुझे वापस जरूर भेजूंगी। वरना तेरी डॉक्टरी पूरी कैसे होगी। और फिर गांव वालों का इलाज कौन करेगा? तू यहां दवाखाना खोलेगा न?’
‘हां दादी, बिल्कुल। जरा कुंवर को फोन कर लूं।’
‘हां-हां। पूछ लो कब आ रहा है वो? बहुत अच्छा लड़का है।’
‘दादी, कुंवर के अलावा शायद और दोस्त भी आएं। आप उन्हें नहीं जानतीं। वे भी गांव देखना चाहते हैं।’
‘कोई बात नहीं। मैं सबकी खातिर कर दूंगी।’
श्रवण कुंवर को फोन करने लगा। दादी कान लगा कर सुनने लगीं, तो श्रवण ने फोन लाउडस्पीकर पर कर दिया।
‘गरमी का क्या हाल है वहां?’ कुंवर ने पूछा।
‘गरमी तो बहुत पड़ रही है।’ श्रवण ने कहा।
‘ओह! यह बताओ मानसून कब तक आएगा?’
‘केरल तो आ गया है। तीस जून को उसके यहां आने की उम्मीद है।’
‘अच्छा। मानसून के आने के बाद ही आऊंगा।’ कुंवर ने कहा।
‘हां। उसके आने के बाद ही आना। तब मौसम भी ठंडा हो जाएगा। पास वाली झील में पानी भी भर जाएगा। अभी तो सूखी पड़ी है।’
‘ठीक है।’
‘आने की तारीख बता देना। दादी तो बहुत खुश हैं कि तुम आ रहे हो। पर मानसून के आने के बाद ही आना। उसके आने के बाद ही घूमने में मजा आएगा।’ और उसने फोन बंद कर दिया।
‘मानसून 30 जून को आएगा। अभी तो हफ्ता भर है।’ दादी ने कहा और चली गर्इं।
कुछ दिन बाद श्रवण सुबह जगा, तो देखा कि बादल छाए हुए थे। झमाझम पानी बरस रहा था। श्रवण को ध्यान आया कि उस दिन तो तीस जून थी। यानी मानसून समय से आ गया था। मौसम देख कर वह खुश हो गया। ‘दादी से कहता हंू कि पकौड़ी बनाओ।’ हाथ-मुहं धोकर वह दादी के पास चल दिया।
दादी रसोई में ही थीं। रसोइन से कह रही थीं, ‘ हलुआ बन जाए तो पकौड़ी का इंतजाम कर लो।’
श्रवण ने देखा कि एक कड़ाही में हलवा बन रहा था और पकौड़ी का सामान भी रखा हुआ था।
श्रवण ने खुश होकर कहा, ‘वाह यहां तो हलवा-पकौड़ियां बनने भी लगीं। दादी, मैं तो आपसे कहने आया था कि आज यही सब खाने का मौसम है। लगता है बारिश के मारे आपका भी हलवा और पकौड़ी खाने का मन हो गया है।’
‘लो मेरा क्यों मन हो रहा है। मेहमान आने को है, तो यह सब तो बनेगा ही!’
‘कौन मेहमान आ रहा है दादी?’
‘कौन आ रहा है? तुम भूल गए?’
‘मुझे सच में ध्यान नहीं है कि कौन आ रहा है। बुआ आ रही हैं क्या?
‘अच्छा। बुड्ढी होकर मुझे याद है और तू लड़का होकर भूल गया?’
‘अब बताओ न दादी। पहेली मत बुझाओ।’
‘कल रात तुम सो गए तब याद आया कि आज तो तुम्हारा कोई दोस्त आने को है। सोचा, अब तुम्हें क्यों जगाऊं।’
‘मेरा दोस्त? मेरा तो कोई दोस्त आज आने को नहीं है।’
‘तुम वाकई भूल गए? मैं बताती हंू। उस दिन तुम कुंवर से फोन पर बात कर रहे थे, तो मैं सुुन रही थी। तुमने उससे कहा था कि तीस जून को तुम्हारा कोई दोस्त आएगा। आज तीस जून है या नहीं?
‘मुझे तो याद नहीं। क्या नाम था दोस्त का?’
‘कुछ अजीब-सा नाम था। पहली बार सुना था। क्या नाम था?’ दादी सोचने लगीं। फिर बोलीं, ‘तुमने कुंवर से कहा था कि उसके आने के बाद ही आना। तब मौसम भी अच्छा हो जाएगा। झील में पानी भर जाएगा। कहा था न। लो याद आ गया। मानसून नाम था। मानसून।’
‘क्या कहा दादी? फिर से नाम बताना।’
‘मानसून।’
इतना सुनना था कि श्रवण की हंसी छूट गई।
‘मानसून? हां मानसून तो तीस जून को आने को था और आ भी गया।’ श्रवण बोला।
‘आ गया? कहां है? हंसते ही रहोगे या कुछ बताओगे भी?
‘अरे दादी आपने गलत समझ लिया। ‘मानसून’ मेरा दोस्त नहीं है। मानसून तो उन हवाओं को कहते हैं, जो बारिश लेकर आती हैं।’ और वह फिर हंसने लगा।
‘इन हवाओं के आने के बाद ही बारिश होती है। मैं कुंवर से कह रहा था कि जब मानसून आ जाए, मतलब बरसात आ जाए, तभी आना। बारिश से झील भर जाएगी और गरमी भी कम हो जाएगी। आपने ‘मानसून’ को मेरा देस्त समझ लिया।’
ओह! अरे हम लोग तो इन हवाओं को ‘पुरवइया’ कहते हैं, जो बारिश लेके आती है। मैं समझी कि तुम्हारे किसी दोस्त का नाम है मानसून। बुद्धू बन गई मैं तो।’ और वे भी हंसने लगीं।
‘चलो दादी। अब हलवा तो खिलाओ।’

