शिखर चंद्र जैन

ब बलू पढ़ने-लिखने में बड़ा होशियार था और हाजिरजवाब भी। लेकिन माता-पिता की इकलौती संतान होने की वजह से वह लाड़-प्यार में पला। शायद इसलिए जरा अनुशासनहीन हो गया थो। तीज-त्योहारों पर तो उसकी उद्दंडता से पूरे मोहल्ले वालों की नाक में दम आ जाता था। दिवाली आती तो वह इतने तेज धमाके और जबरदस्त प्रदूषण के पटाखे छोड़ता कि लोगों का सांस लेना भी मुश्किल हो जाता था। होली का रंग तो उस पर महीने भर पहले से ही चढ़ जाता था। किसी गरीब ने खाना पकाने के लिए चूल्हा जलाया हो तो वह जाकर उसमें पानी डाल देता, हवा में इतना अबीर उड़ाता कि लोगों को नाक पर रुमाल रख कर सड़क पर चलना पड़ता। और तो और मोहल्ले के तालाब और कॉम्प्लेक्स के स्विमिंग पूल को भी वह प्रदूषित कर डालता। कलक्टर साहब का बेटा होने की वजह से लोग उसे ज्यादा कुछ कह नहीं पाते थे। उसके मम्मी-पापा को भी उसकी हरकतें नागवार लगती थीं। वे भी उसे प्रदूषण न फैलाने और लोगों को बेवजह तंग न करने के लिए कई बार समझा चुके थे, मगर वह किसी की नहीं सुनता।

इस साल भी होली में कुछ ही दिन रह गए थे। बबलू होली पर कुछ खास धमाल करने की योजना बनाते-बनाते सो गया। उसने सपना देखा कि वह रंगों की थैली लेकर इधर-उधर खूब रंग उड़ा रहा है और मोहल्ले के लोग उससे बचने की कोशिश कर रहे हैं। तभी एक विशालकाय दैत्य ने उसे पीछे से दबोच लिया। दैत्य ने भयंकर अट्टहास करते हुए कहा, ‘हा! हा! अब मैं तुम्हें खाऊंगा।’ बबलू बुरी तरह घबरा गया, लेकिन कुछ ही पलों में उसने खुद को संभाल लिया और बोला, ‘दैत्यराज! तुम्हारा भोजन बनने में मुझे आपत्ति नहीं, लेकिन एक बार मेरी सृष्टि करने वालों से तुम्हें अनुमति जरूर लेनी चाहिए।’ दैत्य ने कहा,‘तो बुलाओ अपने माता-पिता को…मैं उन्हें भी खा लूंगा।’ बबलू ने कहा, ‘अरे मेरे असली सृजनकर्ता तो पंचतत्व हैं-पृथ्वी, आकाश, अग्नि, जल और वायु। उनसे पूछो।’
दैत्य ने कहा,‘ठीक है। जैसी तुम्हारी मर्जी। फिर उसने आवाज लगाकर पूछा, ‘हे पृथ्वी! मैं तुम्हारी सृष्टि के इस बालक को खा लूं?’ पृथ्वी ने तुरंत कहा,‘बेशक! इसने तो मुझे कूड़ेदान बना रखा है। जगह-जगह गंदगी फैलाता फिरता है।’ अब दैत्य ने आकाश को आवाज लगाई। उसने कहा,‘बिल्कुल! तुरंत खा डालो। मैंने इसे बरसात, सूर्य की धूप और छांव का सुख दिया, लेकिन यह नालायक लड़का ऊटपटांग आतिशबाजियां छोड़कर मेरे ही कलेजे में छेद करने की कोशिश करता है।’ बबलू का मुंह उतर गया। दैत्य का हौसला बुलंद हो गया। उसने अग्नि से पूछा। अग्निदेव बोले, ‘जरूर…भोजन पकाने के लिए कोई गरीब चूल्हा जलाता है तो यह पानी डालकर मुझे बुझा देता है और मेरा उपयोग प्रदूषण फैलाने के लिए करता है। ऐसे इंसान को बचाने से क्या फायदा।’ जल ने कहा,‘दैत्यराज, देरी मत करना। यह लड़का नदी या तालाब का जरा भी सम्मान नहीं करता जबकि हम इसे पीने का पानी उपलब्ध करवाते हैं। देखो न! इसने केमिकलयुक्त खतरनाक रंगों से हमारी क्या दशा की है।’ हवा भी बबलू से बुरी तरह खफा थी।

उसने कहा, ‘यही ठीक रहेगा। क्योंकि यह जीवित रहा तो हमारा सत्यानाश कर देगा। कभी केमिकल वाले रंग उड़ा कर तो कभी आतिशबाजी छोड़कर।’ बबलू ने सबकी प्रतिक्रिया सुनी तो डर और शर्म से उसकी हालत पतली हो गई। वह समझ गया कि दैत्यराज उसे छोड़ने वाला नहीं क्योंकि पांचों में से किसी को उससे हमदर्दी नहीं। स्नेह तो दूर की बात…उनके मन में तो उसके लिए नफरत भरी है। उसने रुआंसे स्वर में कहा- दैत्यराज! आप मुझे खा लें। क्योंकि मेरी शैतानी भरी हरकतों के कारण सभी मुझसे नफरत करने लगे हैं। सचमुच, जिस वातावरण में हम रहते हैं, उसे प्रदूषित करने का हमें कोई अधिकार नहीं और तीज-त्योहारों के नाम पर खतरनाक रसायनों का उपयोग करना या किसी को सताना भी ठीक नहीं। इसका दोषी सचमुच मैं ही हूं। मुझे जिंदा रहने का कोई हक नहीं।’दैत्य ने उसे मुट्ठी में पकड़ लिया और मुंह में डालने ही वाला था कि तभी पांचों तत्व एक साथ बोल उठे-दैत्यराज! उसे छोड़ दो। पश्चात्ताप से बड़ी कोई सजा नहीं। यह तो अपनी ही नजर में गिर गया है, यह तो मृत्यु से भी बढ़कर है।

दैत्यराज ने पंचतत्त्वों की बात सुन कर बबलू को मुट्ठी से छोड़ दिया। बबलू खुशी के मारे चिल्ला पड़ा-थैंक्यू दैत्यराज! थैंक्यू पंचतत्त्वों। तभी उसकी मम्मी ने आ कर उसे हिलाया-अरे बबलू उठो। नींद में किसको थैंक्यू बोल रहे हो? बबलू आंखें मसल कर बिस्तर से उठ खड़ा हुआ और बोला-मम्मीए सॉरी! आज से मैं किसी पर न तो हानिकारक केमिकल वाले रंग डालूंगा और न ही वातावरण को प्रदूषित करूंगा।
मम्मी ने उसे गले लगाकर कहा-ठीक है बेटा! देर आयद दुरुस्त आयद। तुम्हें अपनी गलती समझ में आ गई यही बहुत है। अब तैयार हो जाओ। आज होली है। मैंने तुम्हारे लिए स्वादिष्ट पकवान बनाए हैं। १