शोभा सिंह
क्रमश: इस घर की सभी घड़ियां बंद हो गर्इं। उसे झुंझलाहट के साथ हैरानी भी हुई। एक साथ, यानी कि हद है! समय में सलवटें कहां, वह तो अपनी गति में ही रहता है। बेहद अनुशासित। यहां हमारे लिए समय ठहरा हुआ है। जैसे भ्रम के चंदोवे-तले हम चलते जा रहे हों। सूरज के उगने और डूब जाने तक समय की आंख मिचौली के अदना से खिलाड़ी बन कर हम अपना-अपना किरदार निभा रहे हों। ठीक वैसे ही स्मृति में सीखचों के पीछे के कैदी की छवि उतरती है, जिसकी दिन की शुरुआत रोशनी की दस्तक के बाद बैरक खुलने के इंतजार में होती है। जेल की अदृश्य-सी घड़ी के अनुसार ही यंत्रवत काम की हलचल शुरू होती थी। जेल प्रशासन अगर सख्त हो तो कड़क चुस्ती बनी रहती है। लेकिन अधिक देर तक अघोषित तनाव बनाए रखना संभव नहीं हो पाता। पैनी निगाहोें के नीचे रोजमर्रा के काम, कैदियों की गिनती, नाश्ता-पानी-सफाई आदि। कर्मचारियों को सख्त हिदायत रहती- बातें सिर्फ काम भर की। कैदियों से दूरी बनाए रखें। हालांकि वहां काम करने वाली ज्यादातर औरतें लंबी सजा पाई कैदी होतीं थीं। उसी में किसी दबंग को मेट का दर्जा मिल जाता, जिसकी ठसकदार आवाज परिसर में गूंजती रहती थी। आराम-तलब वार्डन की बंद आंखों के नीचे से ही तमाम काम हो जाते थे। किसी को तंबाकू, बीड़ी या बढ़िया बिस्कुट, किसी को कुछ और- बस पैसा देने पर सब मिल जाता। बाकी भारी आसामी की खास मांग पर मेट की आंखें खुल जातीं और उसे अपने हिस्से की दरकार बराबर रहती। यों आमतौर पर एक आपसी सौहार्द का रिश्ता, सुख-दुख की घरेलू बातें किसी किस्म के अंकुश को नहीं मानतीं। यहां जीवन-सरस अनायास ही बन जाता। तमाम जटिलताओं के बावजूद।
वह लौटती अपने में। घर में घड़ी का बंद होना अजब मनहूसियत फैलाता है। खैर, इधर उसकी सांस भी अक्सर उखड़-सी जाती है। हृदय को सम करने में समय की दरकार होती है। सुख-दुख का काल्पनिक झूला यह बात दिगर है कि जिसमें पांव यथार्थ की जमीन से टकराते हैं जो वेग भी देते हैं और वेग को धीमा भी कर देते हैं। घड़ी का पेंडुलम जो अपनी उपस्थिति का अहसास कराता ही रहता है। हालांकि किसके पास आज इतनी फुरसत है कि उसे देखने के लिए ठहर जाए! भागमभाग, एक के बाद दूसरे काम का पीछा करता दिन। ऐसे में भावुक हो घड़ी की टिक-टिक कौन सुने। उनींदी रातों में घड़ी की टिक-टिक वैसे भी अप्रिय लगती है।… परेशान करने वाले एकांत के एकाकी सवाल घेरते हैं। जीवन के लिए अच्छा क्या है? एक शांत मृत्यु की कल्पना जीवन के उत्तरार्ध में करती है वह। क्यों? फिर सारी जद्दोजहद तो
जीवन के लिए होती है। घड़ी में घंटे मिनट सेकेंड। किस खाने में फिट है वह? संपूर्णता में आज तक कोई चीज नहीं मिली। टुकड़ों को ही समेटा है उसने! जीवन संघर्ष करते कई चेहरों की छवियां अपनी पूरी धज के साथ नमूदार होती हैं। स्मृति के गलियारे रोशन हो उठते। जेल का वह बड़ा-सा लंबाई लिए हुए कमरा, आदमी के सोने के लिए बीच में थोड़ी जगह छोड़ कर मिट्टी के चबूतरे, मूर्त रूप लगने लगता। क्यों वह कमसिन-सी लड़की जेल में है। क्या अपराध किया होगा उसने। फुलझड़ी की तरह खिल खिल उजली हंसी हंसती मासूम। बैरक में अपनी मां के साथ आती थी। मां की छाया बन कर। जेल के कच्चे फर्श पर पानी का हल्का छिड़काव कर देती, ताकि धूल न उड़े। फिर झाड़ू लगाती। मिट्टी के घड़े में ताजा पानी भरती। उसकी मां टिन के डिब्बे में, जिसका मुंह ऊपर से कटा होता, मिट्टी और गोबर का घोल तैयार कर ले आती। पोंछे को उसमें भिगो कर जमीन लीपती और दूसरे बैरक में चली जाती। काम उसका सफाई और सलीके से होता। यहां की सफाई के लिए शायद जाति आधारित भेदभाव के चौखटे पर कैदी महिलाओं का जम कर दोहन होता। वे आतीं तो मुंह कपड़े से ढका रहता, खामोशी से वे नामहीन औरतें काम कर के चली जातीं। न जाने क्यों संवाद की गुंजाइश नहीं छोड़तीं। लगता मेट की आंखें घृणा भरी उन पर रहती थीं। जाति का दंश हर जगह एक समान है।
हम कुछ औरतें आंदोलन के दौरान गिरफ्तार कर जेल भेज दी गई थीं। सुविधा के नाम पर हमें यहां काम नहीं करना पड़ता था। अपने पास कागज, कलम, पेंसिल, किताब रखने की सुविधा हमें बाद में मिल गई थी। एक दिन मुझे कॉपी में कुछ लिखता देख उसने पूछा -‘दीदी, आप तो पढ़ी-लिखी हैं, जेल में कैसे आ गर्इं?’ मैंने उसे अपने बारे में बताया, अपने साथ की औरतों और आंदोलन के बारे में बताया। उसे हैरानी हुई। अच्छा, सरकार नारा लगाने वालों से भी डरती है! बातों के दौरान मैंने उससे पूछा- ‘देवंती तुम कैसे जेल में आ गर्इं और तुम्हारे साथ तुम्हारी यह खिलंदड़ी बेटी? देख कर लगता नहीं, इसने कोई जुर्म किया है।’ ‘हां, सच कह रही हैं दीदी। एक ही जुर्म में हम तीन जनी इस जेल में सजा काट रही हैं।’ ‘तीसरी कौन?’ ‘अरे मेरी छोटी बहन! अच्छा, आपने उसे देखा नहीं। आ जाएगी किसी दिन। पांच नंबर बैरक में उसकी ड्यूटी है। हमारी मेट उससे कुछ नाराज है, उसकी डबल ड्यूटी लगा दी है। हालांकि वह तो बेचारी बहुत सीधी है। पता नहीं क्यों, क्यों…’ और वह बुदबुदाते हुए चली गई।
दूसरे या तीसरे दिन देवंती से भेंट हुई। बेटी तो अपना काम करके जल्दी भाग गई। आम के पेड़ की अमिया उसे ललचा रही थीं। देवंती पूछने लगी- ‘कल आप कहां थीं और यह क्या पढ़ रही हैं?’ ‘कहानी की किताब है।’ ‘अच्छा…।’ कुछ देर चुप रहने के बाद बोली- ‘मेरी बेटी और बहन किसी तरह जेल से बाहर हो जातीं तो अच्छा था। इन दोनों की चिंता रात-दिन मुझे जलाए रखती है। क्या करूं कैसे करूं। आप एक दरखास्त सरकार के नाम लिख देतीं तोे बड़ी मेहरबानी होती। घर का कोई रिश्तेदार तो कुछ करेगा नहीं। उनके लिए अच्छा है हम जेल में बंद रहें।’ ‘क्यों?’ ‘यह तो लंबी कथा है। क्या कहूं…।’ देवंती कुछ कहते-कहते रुक गई। शायद बेटी और बहन का असुरक्षा का सवाल परेशान कर रहा था। मेट से टकराव अकारण तो नहीं था। वह पास आकर दीवार की आड़ में बैठ गई। साड़ी के पल्लू से अपना मुंह पोंछते हुए जैसे अपनी थकान पोंछ रही हो। फिर बताने लगी- ‘कानपुर देहात क्षेत्र में उन्नाव के पास, हमारा गांव था। घर में थोड़ी-बहुत जमीन थी। खेती-बाड़ी, घर गिरस्थी के काम से फुर्सत ही नहीं मिलती। जब मैं पेट से हुई और मेरे लिए घर का भारी काम करना मुश्किल हो गया तो मेरे बापू ने मेरी छोटी बहन ‘लाजो’ को मेरे पास भेज दिया, मेरी मदद के लिए। मेरा मरद, जो पीने-पिलाने का शौकीन था, कब मेरी बहन पर लट््टू हो गया, पता ही नहीं चला। वह बेचारी उसे जीजा का प्यार-दुलार ही समझती रही। मेरी यह बेटी, जिसका हमने नाम बिंदिया दिया, पैदा हुई। घर में सब खुश तो नहीं थे। उनको लड़के की चाह थी। लेकिन चलो पहली बेटी लक्ष्मी होती है, यह कह कर ससुराल वालों ने कुछ संतोष कर लिया। पर मेरे पति का तो तेवर ही बदल गया। जापे के बाद भी वह मेरी बहन को बापू के घर भेजने को राजी न होता। मेरे हर काम में नुक्स निकालता। एक दिन उसने बहन को दबोच लिया। बहुत रोई थी वह। मैं सदमें में। फिर मैंने अपने बाप को बुलाया। उसने सारी बात सुनी। मेरे पति ने कहा, ठीक है मैं इससे शादी कर लूंगा। घर की बात घर में ही रह जाएगी। इज्जत भी बनी रहेगी। अरे वाह रे लुटेरे की इज्जत! और दीदी, इस तरह मेरी सगी छोटी बहन मेरी बेटी की दूसरी मां बना दी गई।
हम दोनों बहनों का प्यार बना रहा। देखने वालों को ताज्जुब होता। हमारा पति धीरे-धीरे पक्का शराबी-जुआरी हो गया। अब खेतीबाड़ी का सारा काम हम दोनों बहनें करतीं। सास खटिया तोड़ती। सच्च, हम उसकी गालियां खाकर भी उसकी सेवा करतीं। क्यों? इसे हम अपना धरम समझतीं। एक बेटी ही हमारे जीने का आधार थी। गांव से थोड़ी दूर पर सरकारी स्कूल में उसका नाम भी लिखवा दिया। अभी तो पढ़ने की शुरुआत थी। स्कूल जाना बिंदो को अच्छा लगता था। बोलते-बोलते देवंती जैसे कहीं खो गई।… पर उसकी आंखों में सपनों की झिलमिलाहट जैसे जल कर बुझ गई। कैसा काला दिन था वह। पति ने बताया, बिंदिया का ब्याह तय कर दिया है। फलां तारीख को उसके ससुराल वाले आकर ले जाएंगे। मैंने उसी समय कहा- अभी तो मेरी बच्ची बहुत छोटी है। उसके पढ़ने-लिखने, खेलने-कूदने के दिन हैं। अभी ब्याह नहीं होगा। पति बहुत लाल-पीला हुआ। हम दोनों बहनों की मरम्मत भी खूब की कसाई ने। हमने तब भी उसकी बात नहीं मानी। उस समय तो वह पैर पटकता बाहर चला गया। दुबारा आकर चीखने लगा- मैं मर्द हूं, मैं कुछ भी कर सकता हूं। तू कौन है मुझे रोकने वाली। अपने को संभाल कर शांति से कहा, ऐसी कैसी शादी कि आकर उठा ले जाएंगे। क्या लड़की नहीं कोई गाय-बकरी है- दाम लगाया और पगहा उठा हांक लिया। मैं यह शादी तो अपनी जान रहते होने नहीं दूंगी। सच पहली बार मैं इतना बोल पाई। पति गुस्से और नशे में धुत था। मुझे गंदी गाली देकर बोला, तू मर। हां, मैंने तेरी बेटी को बेच दिया है। कल तेरी बहन को भी बेच दूंगा। क्या करेगी बोल। सबका सौदा कर आया हूं। दाम मिलेंगे चोखे। तू मुझे रोकेगी? तुझे जान से मार दूंगा। दूजी ले आऊंगा। खबसूरत बोलने वाली औरत मुझे पसंद नहीं।
पहले तो मैं जैसे काठ हो गई। फिर गुस्से की आग मेरे अंदर भक्क से जल उठी। बस… अब और नहीं, बस। उसने जैसे ही लाठी मुझे मारने के लिए उठाई। मैंने पूरी ताकत से लाठी उसके हाथ से छीन उसके ही सिर पर दे मारी। पता नहीं चोट कैसी लगी। वह एकदम से गिर गया। एक लाठी मैंने और जमाई। इस बार जोर कम था। लाठी वहीं फेंक दी। वह वहीं शांत हो गया। मेरी बेटी और बहन रोने लगीं। लड़ाई-झगड़े की आवाज सुन कर भी जो सास अंदर नहीं आई थी, दोनों के रोने की आवाज सुन कर अंदर आई और बेटे को जमीन पर गिरा देखते ही चिल्लाती हुई बाहर भागी। थोड़ी देर में भीड़ जमा हो गई। पुलिस थाना। जहां पति मरा पड़ा था वहां हम तीनों मौजूद थीं। सास चीख रही थी- तीनों ने मिल कर मार डाला मेरे लाल को। हाय मेरा बेटा गऊ सा सीधा। उस भीड़ में वे शैतान भी आए थे, जिनसे मेरे पति ने मेरी बहन और बेटी का सौदा किया था। मैंने सुना कि वे कह रहे थे, चलो अब तो मुफ्त का माल मिल ही जाएगा। साला जुआ में भी तो हारा था। तभी हमने तय किया हम साथ रहेंगी। पुलिस-अदालत के अपने फैसले। सास की गवाही उनके काम आई, और हम तीनों जेल में हैं। बाहर की दुनिया में खतरा तो है, लेकिन बाहर की दुनिया में जाना ही है। बहन अब समझदार हो गई है। बेटी को संभाल लेगी। उनकी बेगुनाही साबित होनी चाहिए। कुछ भी करो सिर्फ इनके लिए। ये दोनों सजा की हकदार नहीं हैं। मैं भुगतूंगी सजा। गुनाह किया है, जुर्म किया है तो सजा भी काटूंगी। जेल की औरतें मुझ पर थू-थू करती हैं। पति की हत्यारिन। कैसी मां है, बेटी को भी दलदल में बोर दिया हत्यारिन ने। बेशर्म।
उसके सुंदर चेहरे पर विषाद की छाया गहरी हो गई। आंखों में आंसू हृदय की उमड़न से उबल बाहर आने को आतुर। अंत मे जैसे धैर्य और दुख का बांध टूट गया। उसे सान्त्वना कैसे दूं, समझ में नहीं आ रहा था। मैंने उसे पानी पिलाया। पीठ पर स्नेह से हाथ रखा। हर रोज माटी पानी करते उसके हाथ जैसे माटी के रंग के ही हो गए थे। उन हाथों को पकड़ स्नेह से दबाया। ‘कल लिख दूंगी तुम्हारी अर्जी।’ मैंने उसकी ओर से दरखास्त तैयार की, फिर उसके अंगूठे की छाप और उसकी बहन और बेटी के हस्ताक्षर लेकर उसे जेल अधिकारी को दिया। उससे पूछा कि इस संदर्भ में और क्या किया जा सकता है। उसने बड़े ठंडेपन से कहा- ‘कहां मैडम आप इन अपराधी महिलाओं के चक्कर में पड़ी हैं। ये औरतें जितनी अंदर हैं उतनी ही बाहर! ‘क्या मतलब?’ ‘मतलब जो भी हो, आप इन्हें इनके हाल पर छोड़ दीजिए। सजा है, कोई मजाक नहीं।’मुझे लग गया कि मेरा आवेदन इस जेल के डस्टबिन में जाएगा। खैर, मैंने जेल में उस लड़की से मुलाकात की, जो कैदियों के केस पर काम कर रही थी। मैंने विस्तार से उसे देवंती का केस बताया। एक ही जुर्म के लिए कैसे तीन लोग सजा काट रहे हैं। इस पूरे मसले पर हम क्या कर सकती हैं। कागज केस का डिटेल कैसे हासिल होगा। मीना टंडन नाम की उस लड़की ने कहा- ‘मानवाधिकार वाले या कोई वकील केस को री-ओपेन यानी फिर से चालू कर सकता है। तभी कुछ हो सकता है। हम लोग लिख कर अपनी रिपोर्ट देंगे। वैसे जेल अधिकारी अगर अच्छे आचरण का सर्टिफिकेट दे दें, तो सजा की अवधि कुछ कम हो सकती है। बाकी तो कानून की कछुआ चाल प्रक्रिया है।
मीना टंडन ने बताया, आपको शायद मालूम नहीं। इस जेल में बहुत-सी बेगुनाह औरतें हैं, जिनकी संपत्ति हड़पने के लिए, उनसे छुटकारा पाने के लिए साजिश कर उन्हें जेल के सींखचों के पीछे पहुंचा दिया गया है। किसी झूठे दहेज केस में फंसा बूढ़ी सास से छुटकारा पा जाते हैं। अक्सर मर्द बीवी को तलाक देने के कानूनी दांव-पेंच से बचने के लिए भी पत्नी पर अपने माता-पिता-भाई को सताने, मारने-पीटने का आरोप लगा कर छुटकारा पा जाते हैं। एक केस तो गजब का था- अपने भूखे बच्चे लिए बे्रड चुराती औरत पकड़ी गई। दुकानदार ने चोरी की गई चीजों की लंबी लिस्ट पुलिस को लिखवा दी। हर्जाना भरा नहीं, वह जेल में है। तमाम चौंकाने वाले केस मेरी फाइल में आप पढ़ें, तो दंग रह जाएंगी। सालों साल इन पर तो मुकदमा भी नहीं चलता। पुख्ता इल्जाम और घोषित सजा का इंतजार करते जिंदगी के कई साल जेल में गुजर जाते हैं। इस जेल में ऐसी औरतें बंद हैं जिन पर पुलिस लॉकअप में बहुत जुल्म हुए हैं। इतना सब जानने-सुनने के बाद सहज ही हमारी इच्छा उनसे मिलने की हुई। अब रास्ता इतना आसान नहीं था। देवंती की अर्जी देने के बाद से ही जेल अधिकारी सतर्क हो गए थे। माहौल में एक अघोषित तनाव की झनझनाहट सुनाई पड़ती थी। देवंती और उसकी बहन, बेटी की ड्यूटी भी हमारे बैरक से हटा दी गई।
खैर, इतनी जल्दी हम हार मानने वाले नहीं थे। कोशिश जारी रही। तंग आकर एक दिन मेट ने हमसे आकर कहा- आप लोग हमारे लिए मुश्किल न खड़ा करें।जेल में खाने में हमें रोटियां अक्सर कच्ची मिलतीं थीं। राख से लिपटी किरकिराती हुई। उसे रोज खाना मुश्किल था। हम सबने तय किया कि हम रोटियां नहीं खाएंगी। तमाम रोटियों को एक जगह इकट्ठा करना शुरू कर दिया। थालियां बजा कर विरोध करना शुरू कर दिया। हमें लगा कि कुछ कैदी महिलाओं ने भी मूक रह कर और रोटियों के ढेर में अपनी रोटियां डाल कर हमारा साथ दिया। हमारे विरोध की आवाज वे फिलहाल छीन नहीं सकते थे। क्योंकि हम राजनीतिक कैदी थे। इससे जेल प्रशासन में कुछ हलचल हुई और खाना कुछ बेहतर मिलने लगा। महिला कैदियों पर इसका अच्छा असर पड़ा। उनका भरोसा हम पर बढ़ा। लेकिन वे अपनी सीमा अच्छी तरह जानती थीं और शायद हम भी इसे समझते थे। हम सब कुछ दिनों बाद बिना जमानत रिहा हुए। ढेर सारी यादें वहां से अपने साथ ले आए, खट्टी-मीठी, कभी चुभती हुई। उन कामगार महिला कैदियों की आत्मीयता मन को छू जाती। आम के टिकोरे छील कर, नमक-मिर्च लगा कर या खाने की कोई जो उनकी नजर में अच्छी होती हमसे बांटने चली आतीं। हमारी फरमाइश पर गीत गातीं। लोकगीतों का मार्धुय और उसका दर्द सीधे दिल में उतर जाता। फुरसत में होतीं तो बस जरा-सा कुरेदने पर जैसे राख से ढकी आग लहक उठती। अपनी आपबीती बिना किसी अपराधग्रंथि के सुना जातीं।
हम सब के रिहा होने पर डांट खाकर भी सब मिलने आर्इं। अपनी सीमा रेखा तक आकर विदा दी। रूंधे कंठ… हमें भूलना नहीं दीदी, मिलने जरूर आना… जरूर…इन सबके लिए हम क्या कर सकते थे। बहुत चाहते हुए भी क्या? अजब खलिश सी है। वे चेहरे अपनी आवाजों के साथ हमारी दुनिया में अक्सर आ जाते हैं। न जाने कितनों को बेगुनाही की सजा। औरत होने की सजा मिलती रहेगी। बहुत से सवाल हल नहीं होते। उनका निजी जो भी था, खो गया। अपने घर-समाज-सुख से वंचित की गर्इं औरतें बंद घड़ी जैसी ही तो हैं। आभासी समय से संचालित। उम्मीद और सपनों का दामन मजबूती से पकड़े, हार नहीं मानतीं। विषम परिस्थितियों में भी रास्ते के कांटे चुनती उन औरतों की छवियां मुझे आज भी ऊर्जा से भर देती हैं।
हां, बहुत सालों बाद देवंती अंतत: जीत गई। ०

