मीरा सीकरी
उसने बैग में हाथ डाला, इधर-उधर हर कोने में टटोला, पर चाभी कहीं नहींं थी। बाहर की खुली जेब में तो वह चाभी कभी रखती नहीं, पर सोचा, बेध्यानी में कहीं रख न दी हो। सोचते हुए वहां भी तलाश लिया। नहीं मिली। इसका मतलब कि वह अपने बेडरूम से चाभी लाई ही नहीं।… नहीं, वह ऊपर जाकर चाभी नहीं लाएगी, मां से ही कह देती है कि वे दरवाजा बंद कर लें। वे खुश ही होंगी कि मैं गुड मॉर्निंग के अलावा उनसे कुछ बोल रही हूं। किचन में देखा, वे वहां नहींं थीं। उनके बेडरूम के बाहर आई, उढ़का हुआ दरवाजा हाथ लगाते ही खुल गया। पापा तो साढ़े सात-आठ बजे तक सैर के लिए निकल जाते हैं, पर मां को अभी तक सोया हुआ देख वह चौंकी! कहीं मां की तबियत तो खराब नहीं?
वह उन्हें जगाए या नहीं! धीरे से उनके पैर को छूते हुए उसने ‘मां मां’ पुकारा, पर उनकी तरफ से उसे कोई जवाब नहीं मिला। उसने फिर थोड़ा जोर से ‘मां मां’ पुकारा, फिर भी कोई हरकत नहीं हुई। वह उनके सिरहाने की तरफ आई, उनके कान के पास मुंंह ले जाकर बोली- ‘मां मां…।’ उसे लगा कि उन्होंने आंख खोली है और मुस्कराई हैं। वह पैरों की तरफ आकर कुर्सी पर बैठ गई। मां एकटक उसे देख रही थीं। वह उनसे कुछ कहती कि एक लंबी-सी सांस उन्होंने ली और उनकी गर्दन एक तरफ को झूल गई।… यह उसकी कल्पना है या सचमुच उसने ऐसा देखा है? वह घबरा गई। घबराहट में उसने बैग से मोबाइल निकाला और तन्मय के नाम पर अंगुली छुआ दी। ‘जल्दी उठाओ तन्मय’… वह बुदबुदा रही थी। ‘क्या बात है’, निंदियाई और खीजी-सी आवाज में तन्मय ने पूछा था। ‘जल्दी नीचे आओ, मां अजीब-सी हरकत कर रही हैं।’
‘यार तुम कॉलेज जाओ, मैं बाद में नीचे आकर देख लूंगा।’
‘ऐसे कैसे, इस स्थिति में मैं मां को छोड़ कर कॉलेज जा सकती हूं?’ वह वहीं बैठ गई, मां के चेहरे को एकटक देखती हुई।…
डेढ़ेक साल पहले ही तो ब्याह कर लाई थीं मां उसे। पूरी सीढ़ियों पर फूलों के साथ जालीदार दीपक रखे हुए थे। उसके हाथ में एक प्रज्वलित मोमबत्ती पकड़ा कर उससे कहा था, ‘हर सीढ़ी के दीपक को प्रज्वलित करते हुए ऊपर चढ़ो।… तुम्हारे साथ उज्ज्वल प्रकाश हमारे घर को प्रकाशित करे।’
वह उनके सौंदर्यबोध से प्रभावित हुई थी, पर दिन भर की थकान से मन ही मन खीझ भी रही थी कि जल्दी यह नौटंकी खत्म हो। साथ में यह महसूस भी कर रही थी कि वे भी तो थकी हुई होंगी, फिर भी पूरे उल्लास के साथ उसका स्वागत कर रही हैं। ऊपर ड्रांइंगरूम में पहुंचने के बाद उन्होंने कहा था, ‘तुम लोग यहां बैठो, कुछ शगुन और रस्म तो अभी करनी है।’
फिर उसके गले में सोने की लंबी सुंदर चेन पहनाई थी। ‘मीठे से मन तो भरा होगा, पर जरा-जरा-सा मुंह मीठा तो सबको करना होगा।’ उन्होंने कहा था।
फिर दूध की लस्सी से भरी परात को मां ने मेज पर रख दिया था। उसमें गुलाब की पंखुड़ियों को डालते हुए सबसे कहा था- अब इसमें अंगूठी डाल रही हूं, देखते हैं तन्मय और दिव्या में से कौन जीतता है?’
तन्मय का हाथ और मेरा हाथ लस्सी में मिले, अंगूठी और मेरे हाथ को परात से बाहर करते हुए, हाथ ऊपर उठा दिया। मन पुलकित हो गया था। यह कैसा खेल था, जिसे तन्मय ने हार-जीत से ऊपर उठा दिया। मन चाहता था कि तन्मय हाथ को पकड़े रखे। पर तभी मां की आवाज कान में पड़ी थी, ‘सुबह ग्यारह बजे की फ्लाईट है न तुम्हारी? चार तो बज रहे हैं, जाओ अपने कमरे में थोड़ी देर आराम कर लो।’ कमरा रजनीगंधा की कलियों से महक रहा था। हम दोनों का प्रेम विवाह तो नहीं था, पर विवाहपूर्व की कुछ ही मुलाकातों में हम एक-दूसरे को भा गए थे। बहुत खयाल रखने वाला तन्मय, अपने मामा-मासी से मिलवाने मुझे ले गया था। उन्हें ताकीद कर दी थी कि बार-बार इसको खाने-वाने के लिए नहीं कहिएगा। एक कप फिल्टर कॉफी पिला दीजिए इसे।… हर जगह मेरा रक्षा कवच बना हुआ। मुझे लगा था कि विवाह के बाद कॉलेज के पास घर लेने में उसे कोई आपत्ति नहीं होगी। पर परिचयात्मक मुलाकातों में एक-दूसरे की सुख-सुविधा का ध्यान रखने में संपूर्ण व्यक्तित्व प्रकट नहीं हो जाता। एक-दूसरे को समझने के लिए एक लंबे साथ की जरूरत होती है। कमरे में पहुंचते ही लगा था कि अपनी इस नौटंकी वाली पोशाक को उतारूं और दिव्या हो जाऊं। कफ्तान उठा कर बाथरूम में जा रही थी कि तन्मय ने रोक लिया, ‘ऐ, यही पहने रहो न, तुम्हारी यह छवि फिर कब देख पाऊंगा- कुछ रोमांस को तो जिंदा रहने दो।’ और उसने मुझे पकड़ कर पलंग पर बिठा लिया था। मैं पलंग पर बैठी मुस्करा रही थी और वह कह रहा था, ‘थोड़ा दुल्हन होने का नाटक ही कर लो।’ पर नाटक करना मेरे वश की बात ही नहीं थी।
तैंतीस-चौंतीस की उम्र में शादी के नाम पर सात फेरे का नाटक भले कर लिया जाए, दुल्हन होने का नाटक संभव नहीं हो पाता। इस उम्र मेंआप साथी चाहते हैं, पति नहीं। खासकर जब आप पूरे व्यक्ति बन चुके होते हैं। अपनी तरह से जीने के आदी। ऐसे मेंं प्रबंधित विवाह में एकाएक हां नहीं हो पाती, कुछ नजर आए तभी हां निकलती है। तन्मय में कोई कमी या बुराई नहीं, मनोविज्ञान की जानकार हूं, क्या जानूंगी नहीं। तन्मय को भरा-पूरा परिवार चाहिए, जबकि मां-बाप से दूर हॉस्टल में रहने के कारण मैं अपने साथ रहने की अभ्यस्त हो गई हूं। विवाह के बाद जीवन की परिकल्पना में भी केवल अपने और तन्मय के ताने-बाने में संपूर्णता चाही। ऐसे में परिवार बड़ा न भी हो, मां-बाप भी भले लोग हों, एकल परिवार की आकांक्षा से तो वंचित हो ही गए, यानी ‘अपने घर’ के स्वप्न का पूरा न होना। मेरी इच्छा के प्रतिकूल ‘अलग घर’ लेने के नाम पर ही तन्मय भड़क उठा था, ‘मुझे अपने मां-पापा, अपने कुत्ते, सबकी जरूरत है- ऐसा मुझसे फिर कभी न कहना।’ जबान बंद हो सकती है, आकांक्षा नहीं- उसे बंद करने से तो वह और बेबाक हो उठी थी। दूसरों की नजर में मैं शांत स्वभाव की हूं- ओवर रिएक्ट नहीं करती। पर चुप्पी शांति नहीं होती।
यों तन्मय मुझे अच्छी तरह समझता है, वह जानता है कि मैं जब कॉलेज से लौटती हूं, तो मुझे जोर से भूख लगी होती है। रिलैक्स्ड हुई, दोपहर, रात का खाना मैं उसी वक्त खा लेती हूं। फिर कुछ आराम कर पढ़ने-लिखने के बाद रात के ग्यारह-बारह के आसपास कुछ खाने-पीने का मन हुआ तो खा लिया। मगर यहां नियमित रूप से रात का खाना पूरी तामझाम के साथ मेज पर इकट्ठे खाया जाता है। मैंने समय से मेज पर खाना लगवाने में मदद करने की कोशिश की तो तन्मय ने तुनक कर कहा, ‘अगर खाना नहीं खाना, तो यहां बैठने की भी मजबूरी नहीं।’ मां हाऊस वाइफ रहीं, तो घर को व्यवस्थित रखने की जिम्मेदारी भी उनकी ही रही।… अपने पढ़ने-लिखने में ही व्यस्त रहने से मैंने भी अपने आप को बेडरूम तक ही सीमित रखा। मां की नजर में मैं परिवार में घुलमिल नहीं रही और अलग-थलग-सी अपने को कुछ खास चीज ही समझती हूं। जबकि उनकी व्यंग्यभरी आंखों से बचने के लिए मैं नीचे जाने से भी कतराती। पापा का जरूरत से ज्यादा पुचकारना मुझे अटपटा लगता। कुत्ते से मुझे वैसे ही घबराहट होती। आपस में सब सहज हो ही नहीं पा रहे थे। इसी असहजता से खीजता तन्मय मुझसे कहता- ‘मां से तुम्हारा संबंध केवल गुड मॉर्निंग, गुड इवनिंग का है- कम से कम कुछ कामचलाऊ संबंध तो डेवलप करो।’ तन्मय से मैं क्या कहती? मां के पास बुत बनी मैं कब तक बैठती? बिना बात की बात में क्या हिस्सेदारी होती?
एक दिन मां ने मुझसे कहा- ‘बच्चा चाहती हो तो जल्दी पैदा कर लो, दोनों ही छोटे नहीं हो तुम। बड़ी उम्र की डिलीवरीज बहुत कष्टकर होती हैं, मेरी बहन तो मरते-मरते बची थी।’
मुझे उनकी बात ठीक लगी थी। मैंने तन्मय तक बात पहुंचाई थी। बिगड़े हुए से मूड में जवाब नहीं, पत्थर-सा मारा था उसने- ‘बच्चा पैदा होते ही मैं उसे ‘नवाब’ के आगे रख दूंगा, वह उसे सूंघेगा, उसे चाटेगा, हजम कर सकोगी यह सब? वह हम सबके बीच रहने वाला होगा। पहले अपने को इस योग्य बनाओ, बच्चा पैदा करना इतना मुश्किल नहीं।’
उस दिन मैंने जाना कि साथ रहते हुए भी हम कितनी दूर हो रहे हैं। इकट्ठे बैठ कर नाटक या फिल्म देख आना, एक बिस्तर पर सो लेना काफी नहीं। एक-दूसरे को आंतरिक धरातल पर जानना, समझना और आपस में विश्वास होना बहुत जरूरी है। दरअसल, एक अलग परिवार से आया हुआ प्राणी अपनी आदतों और संस्कारों से भिन्न परिवेश में कैसे एकमेक हो सकता है? मां को शायद मेरे चुप्पा व्यवहार में इंडिफरेंस की गंध आती है। मैं उनकी सुव्यवस्था में कैसे घुसपैठ कर सकती हूं। मेरा वाचाल न होना उन्हें मेरा जानबूझ कर लिया कदम लग सकता है। जबकि मैं चाहती हूं कि मां मुझे घर की कुछ जिम्मेदारी सौंपें, जिससे आपस में अपनापन महसूस हो। यों यहां उस पर कोई रोक-टोक या प्रतिबंध नहीं, पर कहीं कुछ ऐसा है कि वह अपने को बाहरी ही समझती है।
तभी घड़ी के तेज बजते अलार्म से वह सजग हुई और उसने देखा कि मां ने अलार्म को बंद किया और उससे पूछा, ‘तुम यहां कैसे?’ एकाएक उसे विश्वास नहीं हुआ कि यह मां की आवाज है? वह सपना तो नहीं देख रही? मां की आवाज उसे वास्तविकता दिखा रही थी- ‘पूरी रात नींद नहींं आई, सुबह उठने के टाइम, एलप्रेक्स खा ली। यह तो अच्छा हुआ कि साधना (घरेलू सहायिका) देर से आने के लिए कह गई थी और मैंने घड़ी पर अलार्म लगा दिया था।’ उसका मन हुआ कि वह मां को गले लगा ले- पर अपने स्वभाववश आंखों में आते आंसू को पीकर, मुक्त मन से यह कहते हुए उठी, ‘मेरा कॉलेज जाने का मन नहीं, मैं आपके लिए चाय और अपने लिए कॉफी बना कर लाती हूं।’ किचन में जाते हुए वह सोच रही थी कि वह तन्मय को किस तरह से समझाए कि सबके सहज आकर्षण और समीकरण के लिए ‘नवजात’ को आमंत्रित करने का समय आ गया है। ०

