चित्रकारी, संगीत, नृत्य की तरह जादू भी विशुद्ध रूप से कला है। हमें पता है कि रंग लगे ब्रश से लकीर खींचेंगे तो लकीर बन जाएगी, पर यह लकीर किस दिशा में और कैसे खींचें कि कोई आकृति बने- इसे अपने अभ्यास से साधना पड़ता है। वैसे ही संगीत को लेकर हमें पता है कि सुर सात ही होते हैं। पर गाने या बजाने के लिए इन सात सुरों को साधना पड़ता है। इसी तरह महज पांव, हाथ और देह हिला देना नृत्य नहीं होता। उसकी अपनी बारीकियां होती हैं, उसका अपना ताल होता है, उसकी अपनी लय होती है। जादू के बारे में भी हमारी सामान्य समझ यही कहती है कि यह महज ट्रिक (तरकीब) है। पर चूंकि हम उस तरकीब से अनभिज्ञ हैं, इसलिए वह हमारे लिए रोमांच का संसार बुन देती है। यही वजह है कि जादू की दुनिया आम इन्सान के लिए जितनी रहस्यमयी होती है उतनी ही रोमांचक भी। हां, इस रहस्य और रोमांच में इजाफा करती है जादूगरों की वह बयानबाजी, जिससे वे तरकीबों से भरी अपनी इस गोपनीय दुनिया को और गोपनीय बनाना चाहते हैं।
जादू का अस्तित्व तभी तक रहता है जब तक उसकी गोपनीयता बरकरार रहे। जैसे ही जादू का रहस्य आम आदमी के सामने आता है, इस दुनिया का रोमांच खत्म होता है। यानी, जादू की पहली और अनिवार्य शर्त है उसकी गोपनीयता। यही वजह है कि इस गोपनीयता को बनाए रखने के लिए ही छोटे-बड़े तमाम जादूगर इसे काला और सफेद जादू जैसे तमगे देकर भ्रमजाल रचते हैं। वाटर आॅफ इंडिया हो या लेडी कटिंग या फिर लड़की को हवा में झुलाने जैसा चर्चित आइटम- सबके सब महज ट्रिक हैं। जादू की इस दुनिया के बारे में आप कह सकते हैं कि यह हाथ की सफाई और विज्ञान का मिश्रण है। गौर करें कि जादू के शो में महज दो तरह के करतब होते हैं, या तो कोई चीज गायब की जाती है या कोई चीज पैदा की जाती है। और इन दोनों कामों के लिए ढंकना पहली शर्त है। इसे उदाहरण से समझें। कोई जादूगर अपनी हथेली से सिक्का गायब करता है। इसके लिए वह सबसे पहले सिक्के को अपने एक हाथ से दूसरे हाथ में डालता है और जिस हाथ में सिक्का रखता है उसकी मुट्ठी बंद कर लेता है। यानी, हथेली में रखे सिक्के को उसने अपनी मुट्ठी से ढंक लिया और उसके बाद ही सिक्का गायब हुआ। विश्व में अब तक कोई जादूगर ऐसा नहीं हुआ है कि वह खुली हथेली में सिक्का रखे और उस सिक्के को बगैर ढंके गायब कर दे।
मंच पर दिखाए जाने वाले अधिकतर जादू में लाइट, ड्रेस और म्यूजिक का खास महत्त्व होता है। इसके साथ-साथ जादू के विशेष उपकरण भी होते हैं। मसलन, लेडी कटिंग के आइटम में जिस आरा मशीन का इस्तेमाल किया जाता है, वह दिखने में सामान्य आरा मशीन की तरह होती है, जबकि सच्चाई है कि जादू के लिए बनी आरा मशीन के साथ जो टेबल लगा होता है वह खास तरीके से बनाया जाता है, जहां सारा जादू छिपा होता है। भारत में जादू का बाजार कमजोर पड़ा है, यह बात दिल्ली के जादूगर अशोक खरबंदा स्वीकार करते हैं। पर साथ ही वे जोड़ते हैं कि जादू का नया बाजार भी बना है। वह अपने दोनों बेटों का उदाहरण देते हैं, जो अब भी लगातार जादू का शो कर रहे हैं। अशोक खरबंदा बताते हैं कि उनके बेटों ने जादू की अपनी प्रस्तुति का अंदाज बदल दिया है। टैबलेट के इस युग में जादू को भी टैबलेट से जोड़ा है। हॉल बुक कर शो करने के बजाय अशोकजी के बच्चों ने कॉरपोरेट जगत को पकड़ा है। जहां कभी प्रोडक्ट लांच के लिए जादू का इस्तेमाल किया जाता है, तो कभी कर्मचारियों का तनाव दूर करने (स्ट्रेस मैनेजमेंट) के लिए।
जादू के परंपरागत शो को सबसे बड़ा झटका टीवी की दुनिया से लगा है। विभिन्न चैनलों पर विदेशी जादूगरों के कई शो आ रहे हैं। दुखद है कि कई शो में जादू के सारे राज वे बताते जा रहे हैं। जाहिर है, गोपनीयता के जग-जाहिर होने से जादू की दुनिया को नुकसान पहुंच रहा है। भारतीय बाजार से जादू के कटते जाने की एक बड़ी वजह खुद जादूगर रहे हैं। भारतीय जादूगर अब भी भारतीय जादू के स्वर्णिम इतिहास में ही जी रहे हैं। यानी, वह पुराने और चर्चित जादू का शो ही अब तक ढो रहे हैं। नए और बड़े आइटम इजाद करने के बजाय वे अब भी पुराने जादू पर टिके हैं। शो की शुरुआत करनी हो तो या तो ‘सिल्क टु स्टिक’ यानी रूमाल से जादू की छड़ी बनाने का प्रदर्शन करेंगे या ‘मैजिक बुक’ के भीतर से निकल कर दर्शकों को चौंकाएंगे। आखिर इस पुराने अंदाज से दर्शक कब तक बंधे रहेंगे? अब उनके पास टीवी में जादू के विभिन्न शो हैं। देखने जाने के लिए बाहर निकलने का झंझट नहीं है। तो भला क्यों न वे टीवी का स्वीच आॅन कर अपना मनोरंजन तलाशें और पुराने हो चुके जादू के अंदाज का स्वीच आॅफ करें। १..
पिछले तीन दशक के भीतर मनोरंजन की दुनिया में करिश्माई परिवर्तन हुआ है। परंपरागत मनोरंजन के साधन पीछे छूटते गए हैं, उनका बाजार मंदा पड़ा है। मनोरंजन के क्षेत्र में विकल्प बड़ा हुआ है। ग्राहकों को चुनने की आजादी मिली है। मनोरंजन के बाजार की पुरानी अवधारणा यह थी कि दर्शकों/ ग्राहकों को बाजार तक खींचो और अब इस बाजार की रणनीति है कि दर्शकों/ ग्राहकों तक पहुंचो। जाहिर है, जब बाजार ग्राहकों तक पहुंचने लगे तो ग्राहक अपनी सहूलियत चुनेगा, घर बैठे मिल रहा मनोरंजन उसकी प्राथमिकता होगी। बाजार तक जाने की मजबूरी से छुटकारा ढेर सारे परंपरागत मनोरंजन को हाशिए पर ठेल चुका है। उनमें जादू भी एक है। जादूगरी की दुनिया क्यों लगातार सिकुड़ती गई है, बता रहे हैं अनुराग अन्वेषी।
नौ की लकड़ी, नब्बे खर्च
कोलकाता के जादूगर हैं जूनियर बीएन सरकार। लोग इन्हें बच्चू दा के नाम से भी जानते हैं। देश भर में घूम-घूम कर जादू का शो कर चुके हैं। कभी इनके पास अस्सी-नब्बे लोगों की टीम हुआ करती थी। शहर के खुले मैदान में तंबू लगा कर शो किया करते थे। दिन भर में तीन-तीन शो। कम से कम महीने भर। पत्नी शिप्रा सरकार साथ होती थीं। बारिश, धूप, ठंड से मुकाबला करती पूरी टीम पूरे उत्साह से जुटी रहती थी शो की तैयारी में। यानी, कुल मिलाकर बच्चू दा और उनकी टीम की जिंदगी खानाबदोशों सरीखी थी। फिर भी खुश। पर्याप्त कमाई। पर उम्र के तिरसठवें वसंत में पहुंच कर अब बच्चू दा जादू के बारे में कोई बात नहीं करना चाहते। जादूगरी छूट चुकी है। जादू का नशा उतर चुका है। बात-बात पर देश की सरकारी मशीनरी पर गुस्सा फूट पड़ता है।
जादू का शो बंद क्यों कर दिया, पूछने पर कोई जवाब नहीं देते। बहुत कुरेदने पर पुरानी टीस बाहर आती है। बकौल बच्चू दा, ‘क्या करते भाई? शहरों में भीड़ ऐसी बढ़ी, रिहायशी इलाकों का विकास ऐसे बेतरतीब हुआ कि शहर के बीच बसे मैदान उजड़ गए। शहर के बाहर शो का आयोजन करो, तो दर्शकों का टोटा होता था। और इन सबके बीच किसी मैदान को किराए पर लेने जाओ तो प्रतिदिन का किराया बहुत महंगा हो गया। सरकारी अधिकारी घूस मांगते थे। पुलिस वाले सुरक्षा देने के एवज में पैसा और पास चाहते थे। अग्निशमन वालों से नो आॅब्जेक्शन सर्टिफिकेट लेने जाओ तो वहां भी वही घूसखोरी। गुंडे-मवालियों की परेशानी अलग से। कुल मिलाकर नौ की लकड़ी नब्बे खर्च होने लगा।’ तो आपने तंबू लगाकर शो करने के बजाय शहर के हॉल में शो करना क्यों नहीं चाहा? इस सवाल पर बच्चू दा कहते हैं कि हॉल में अगर शो करें तो हॉल का किराया बहुत ज्यादा होता है। इसके साथ मेरे अस्सी-नब्बे लोगों की टीम होती थी, उसे कहां रखता? होटलों में अगर उनके रहने की व्यवस्था करता तो उतना खर्च कहां से निकलता? दूसरी बात, दर्शकों की मानसिकता भी बदली है। वे अब पास लेकर शो देखना अपनी प्रतिष्ठा समझने लगे हैं। बाद के दिनों में ऐसा होने लगा था कि वीआइपी सीटें सिर्फ पास से भर जाती थीं, आखिरकार यह हमारे लिए घाटा ही था। यही सब देख कर मैंने शो करना बंद कर दिया। टीम के जो लोग थे उन्हें कहा कि तुम सब अब इस लायक हो कि छोटा-मोटा शो करके अपना गुजारा चला सको… सबको जादू के छोटे-छोटे आइटम बांट कर उन्हें विदा कर दिया।…
शो बंद होने का दर्द इस कदर बच्चू दा पर हावी हुआ कि वे दिल के मरीज हो गए। बाद के दिनों में उन्होंने जादूगर शंकर का मंच संभाला, पर वहां भी यही सारी दिक्कतें आर्इं। शंकर ने भी शो करना बंद कर दिया। तबसे बच्चू दा के परिवार का जीवन बस ऐसे ही चल रहा है। पत्नी शिप्रा सरकार को गाहे-बगाहे किसी कॉलेज या स्कूल से पर्यवेक्षक के तौर पर बुला लिया जाता है, तो कुछ पैसे आ जाते हैं। कुछ ट्यूशन पढ़ा कर घर का खर्च निकल जाता है। जादू की दुनिया की रौनक क्या खत्म हुई इस जादूगर का उत्साह भी जाता रहा। १
