दी सिनेमा के इतिहास में हुस्न और हुनर का जैसा मेल मधुबाला में नजर आया, वैसा फिर कभी दिखाई नहीं दिया। मधुबाला के बाद माधुरी दीक्षित और ऐश्वर्या राय बच्चन के रूप में फिल्मजगत को सौंदर्यसंपन्न अभिनेत्रियां मिलीं, मगर इन अभिनेत्रियों के करियर में उन्हें अमर बना देने वाली फिल्म का अकाल नजर आया। जैसे मधुबाला को ‘मुगले आजम’ ने, मीना कुमारी को ‘पाकीजा’ ने, नरगिस को ‘मदर इंडिया’ ने या वहीदा रहमान को ‘गाइड’ ने अमर कर दिया।हॉलीवुड की अभिनेत्री मरलिन मुनरो, राजकुमारी डायना और मधुबाला में एक समानता रही। तीनों ही अपनी सुंदरता के लिए याद की जाती हैं और तीनों ही मात्र 36 साल की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह गईं। बावजूद इसके इनके चाहने वालों की आज भी कमी नहीं है। हॉलीवुड भी मधुबाला की सुंदरता का कायल हुए बिना नहीं रहा था। आॅस्कर विजेता फिल्मकार फ्रैंक काप्रा मधुबाला को लेकर एक फिल्म बनाना चाहते थे, मगर मधुबाला के पिता ने उनका प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया था।
आज आॅनलाइन के जमाने में गूगल के सर्च इंजन पर लगभग आधा करोड़ पेज मधुबाला पर महज सवा मिनट में उपलब्ध हो जाते हैं। जाहिर है लोग उनके बारे में पढ़ते हैं तो उन पर सामग्री भी उसी हिसाब से मिलती है। लोग उस मधुबाला के बारे में जानना चाहते हैं जो अताउल्लाह खान की दस संतानों में पांचवें नंबर पर थी और बाल कलाकार के रूप में फिल्मों में काम कर चुकी थीं। दिल्ली में पिता की नौकरी छूटने और बॉम्बे टॉकीज की मालकिन देविका रानी के बुलावे के बाद मधुबाला परिवार समेत वापस मुंबई आ गई थीं। देविका रानी ने ही मुमताज जहां बेगम देहलवी को मधुबाला नाम दिया था, जैसे यूसुफ खान को दिलीप कुमार नाम दिया था। ‘नीलकमल’ (1947) में 14 साल की उम्र में 23 साल के राज कपूर की हीरोइन बनने के बाद मधुबाला फिल्मों में बतौर हीरोइन उतरीं, तो फिल्मजगत उनकी सुंदरता में डूब गया। सहकर्मी हीरो मधुबाला के करीब होने के लिए उतावले नजर आए। शम्मी कपूर से लेकर दिलीप कुमार तक उनके इश्क में गिरफ्तार होने से रोक नहीं पाए। यहां तक कि दिलीप के साथ तो उनका निकाह होते होते रह गया था।
दिलीप कुमार और मधुबाला का इश्क तो अदालत में सार्वजनिक हुआ था। बीआर चोपड़ा ने अनुंबध का उल्लंघन करने और ‘नया दौर’ छोड़ने के कारण मधुबाला को अदालत में खींच लिया था। दरअसल ‘नया दौर’ की मध्य प्रदेश में आउटडोर शूटिंग करने से मधुबाला पीछे हट गई थीं। उनके पिता नहीं चाहते थे कि मधुबाला-दिलीप कुमार एक साथ ज्यादा से ज्यादा समय तक रहें। चोपड़ा ने मधुबाला को फिल्म से हटाया, वैजयंतीमाला को लेकर फिल्म बनाई और मधुबाला को अनुबंध का उल्लंघन करने के लिए अदालत में खींच लिया। मधुबाला चाहती थीं कि दिलीप कुमार उनका साथ दे, मगर दिलीप कुमार ने चोपड़ा का साथ दिया। उन्होंने अपनी गवाही में स्वीकार किया था कि वे मधुबाला से प्यार करते हैं और जीवन भर करते रहेंगे। मधुबाला को बहुत ठेस लगी।
इसी तरह की ठेस मधुबाला को तब भी लगी थी जब शादी करने और लंदन में उनके दिल का इलाज करवाने के बाद पति किशोर कुमार ने मधुबाला को उनके पिता के घर यह कहकर छोड़ दिया था कि वे बहुत व्यस्त रहते हैं इसलिए मधुबाला की तीमारदारी नहीं कर पाएंगे। परिवार को अकेले अपने कंधों पर लेकर आगे बढ़ने वालीं मधुबाला निर्माता-निर्देशक भी बनना चाहती थीं। उन्होंने भारत भूषण को मुख्य भूमिका में लेकर एक फिल्म का निर्देशन करना तय किया था। फिल्म का नाम था ‘शाम-ए-अवध।’ मगर मधुबाला की निर्देशक बनने की चाह परवान नहीं चढ़ पाई। अंत में उन्होंने बतौर निर्माता 1956 में अभि भट्टाचार्य को लेकर फिल्म ‘नाता’ का निर्माण किया। इसके प्रोडक्शन का काम संभाला था मधुबाला की बड़ी बहन अल्ताफ ने। फिल्म की हीरोइन थी मधुबाला की छोटी बहन चंचल। मगर ‘नाता’ इतनी बुरी तरह से पिटी थी कि मधुबाला ने फिर कभी फिल्म निर्माण के बारे में नहीं सोचा।
हुस्न की मलिका
धुबाला की सुंदरता के कारण उन्हें भारतीय फिल्मों की ‘वीनस’ का खिताब दिया गया था। वैसे सौंदर्य की बाला मधुबाला अपनी जिद के लिए भी जानी जाती थीं। इसी के बल पर मधुबाला छह महीने में अंग्रेजी बोलना सीख गईं। इसी जिद के बल पर मधुबाला ने दिलीप कुमार से खुद को दूर किया और इसी जिद के कारण फिल्म निर्माण भी किया। मगर ‘शाम-ए-अवध’ के जरिये निर्देशक बनने की उनकी तमन्ना पूरी नहीं हो सकी। 1950 के दशक की इस अभिनेत्री के चाहने वाले आज भी कम नहीं है। गूगल पर उनकी लोकप्रियता बरकरार है। उनके चाहने वालों के लिए सर्च इंजन गूगल पर करीब 50 लाख पेज उपलब्ध हैं, जो उनके हुस्न, हुनर और अदाकारी के जलवे और जादू से भरे पड़े हैं।
जिद, जलवा और जादू
1955 का साल मधुबाला के लिए कमजोर रहा। इसकी वजह प्रतिस्पर्धा का बढ़ना था। ‘आजाद’ की सफलता के बाद मीना कुमारी, ‘नागिन’ की लोकप्रियता के बाद वैजयंतीमाला, ‘श्री 420’ के बाद नरगिस जैसी अभिनेत्रियां तेजी से आगे बढ़ रही थीं और उन्हें फिल्मों के खूब आॅफर भी मिल रहे थे। हालात इतने बिगड़ गए थे कि मधुबाला ने अभिनय छोड़ने का मन बना लिया था।
1944 मुमताज महल , 1947 नीलकमल, 1950हंसते आंसू , 1957 यहूदी की लड़की, 1958 हावड़ा ब्रिज, 1960 मुगल-ए-आजम

