नसीम साकेती

आज सहारा क्यों देते हो? कफन में बड़े सलीके से लपेट कर मुझे अपने कंधों पर उठाए, कलमा पढ़ते हुए खुर्रमनगर चैराहे की ढलान के बाद ‘नौशाद संगीत केंद्र’ के सामने वाले कब्रिस्तान में दफ्न करने क्यों ले जाते हो? इसीलिए न, कि अगर मैं न दफ्न किया गया, तो तुम्हारी नाक कट जाएगी?  अगर तुम्हें सहारा देना ही था तो उस वक्त कहां थे, जब मेरे हिस्से की जायदाद का जनाजा निकाला जा रहा था और शेरे मेरी पूरी जायदाद पर यह कह कर कब्जा कर रहा था- ‘जायदाद तो मेरे बाप के नाम है, इसमें इनका क्या हक? जायदाद उसके बाप के नाम थी, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। सन तीस में जब दादा इस दुनिया से कूच कर गए तब अंग्रेजी कानून के मुताबिक खानदान का बड़ा लड़का जायदाद का वारिस हुआ। शेरे के बाप मेरे बाप से बड़े थे, इसलिए उनके नाम पूरी जायदाद हो गई।

मैंने गांधी चबूतरे पर हिंदू-मुसलमान सबकी पंचायत बटोरी, लेकिन उस वक्त किसी के मुंह से यह नहीं निकला कि नाम से क्या होता है, जायदाद तो दादा की पैदा की हुई है, इसमें मेरा भी बराबर का हक होता है, क्या मुंह में दही जमी थी उस वक्त? या सात तालों के अंदर बंद थी जबान! नहीं, शेरे की गुंडागर्दी का आतंक जो छाया था गांव-भर पर, जिससे सभी की सिट्टी-पिट्टी गुम थी। मैंने अदालत की ओर मुंह किया, लेकिन बेसूद, क्योंकि बिना सबूत के मुकदमा लड़ा जाता है कहीं? तुमसे जब मैंने गवाही का सहारा लेना चाहा, तब तुमने बगलें झांकना शुरू किया, उस वक्त अगर तुम मुझे थोड़ा-सा भी सहारा दे देते तो शायद आज मेरे जनाजे को सहारा देने की नौबत न आती।  एक भी सबूत न मिलने की वजह से अदालत ने मेरे खिलाफ फैसला दे दिया। अब तक मैं बर्बाद हो चुका था। सब कुछ मुकदमे की भेंट चढ़ चुका था, लेकिन अभी और बर्बाद होना था, क्योंकि विपत्तियां अकेली नहीं आती हैं, शेरे कुर्की ले आया और घर की रही-सही चीजें भी कुर्क हो गर्इं। अब मैं दाने-दाने को मोहताज हो गया।

मेरा होनहार लड़का भूख से तड़प रहा था, ‘अम्मी, अब तो भूख के मारे जान निकल रही है।’
‘सब्र कर बेटा!’ उसकी मां दिल पर पत्थर रख कर कहती।
‘कहां तक सब्र करूं?’
और लगातार फाकों ने उसे सदा के लिए सब्र करा दिया।
‘डॉक्टर साहब, मेरी रूही बच जाएगी न?’
‘हां, घबराने की बात नहीं है, कुपोषण के कारण कमजोर बहुत हो गई है, कुछेक ताकत के इंजेक्शन लगेंगे।’ ध्यान रहे पेट कभी खाली न रहे।
रूही की मां तुम लोगों के दरवाजों पर, खुदा का वास्ता दे-देकर, दस्तकें देती रही-‘इस वक्त मेरी रूही की जान बचा लो, मैं अपनी चूड़ियां बेच कर तुम्हारे पैसे दे दूंगी’, लेकिन उसे तुम लोगों ने मायूसियों के सिवा कुछ न दिया।
सेठ चंदूमल के यहां जब रूही की मां चूड़ियां बेचने गई तब जैसे उसे मुंहमांगी मुराद मिल गई हो, उसने हंसते हुए कहा, ‘लो, रुपए ले जाओ, चूड़ियों की क्या जरूरत है, लेकिन…?’
‘शैतान, तुझे यह बात कहते शर्म नहीं आई?’
‘फाके पर फाके की यह हालत? रस्सी जल गई, लेकिन ऐंठन बाकी है।’
‘चुप, जहन्नुमी!’

वह रूही की मां की ओर भूखे शेर की तरह झपटा, लेकिन रूही की मां तब तक सीढ़ियां उतर कर नीचे आ गई थी, उस वहशी दरिंदे से उसने अपनी इज्जत तो बचा ली, लेकिन तब से चारपाई उसने छोड़ी नहीं, जैसे वह अपना वजूद खोकर जिंदा लाश बन गई हो, भूख हिरन हो गई हो और एक-दूसरी भूख ने आकर उसे दबोच लिया हो। वह एकाएक चारपाई से उठने का प्रयास करती हुई चिल्लाया करती, ‘देखो, चंदुआ शैतान मेरी ओर बढ़ा आ रहा है’ और धम से चारपाई पर गिर जाया करती। उसकी ऐसी हालत देख कर मेरा कलेजा मुंह को आ जाया करता। मैं अपना सिर पकड़ कर बैठ जाता और सोच के बे-लगाम घोड़े जाने कहां-कहां दौड़ाने लगता, आंखें भर आया करती। एक रोज ऐसे ही जोर से चिल्ला कर वह चारपाई से नीचे आ गई और उसकी जिंदगी का चिराग सदा के लिए गुल हो गया। मैं बेसहारा होकर अकेला हो गया।

मेरे लिए अब दुनिया अंधेरी हो गई थी। बदन में इतनी ताकत न थी कि चारपाई के नीचे रखा पानी तक पी सकूं। आंखों की रोशनी गायब हो गई थी। पीठ-पेट एक हो गया था, लेकिन जान नहीं निकल रही थी। उस वक्त तुम्हारे शब्द थे- ‘किसी बहुत बड़े गुनाह की सजा पा रहा है।’ और उस गुनाह के पुतले को आज तुम अपने कंधों पर रख कर ढो रहे हो, उसके गुनाहों की माफी के लिए कलमा पढ़ रहे हो। सहारा ही देना है तो रमजान को सहारा क्यों नहीं देते, जो मेरी तरह होने जा रहा है? मंगल को सहारा क्यों नहीं देते हो, जिसकी जवान बेटी को एक दंबंग नेता के बेटे ने उसके कॉलेज से आने के बाद दिन के उजाले में तुम लोगों के सामने अपने साथियों के साथ अगवा करके उसकी इज्जत को तार-तार करके उसकी जिंदगी को जहन्नुम बना दिया और तुम चुप शाह के रोजे यानी खामोशी की चादर लपेटे हो। मंगल न्यायालय की शरण में गया जरूर है, गवाही के लिए तुम लोगों के सामने हाथ फैला रहा है, लेकिन तुम्हारे कान पर जूं तक नहीं रेंग रही है। साक्ष्यों के अभाव में उसे वहां से मायूसी की सौगात ही मिलेगी, तुम लोग तो घटना के चश्मदीद गवाह हो, फिर जबान पर ताले क्यों?…

भुल्लुर को सहारा क्यों नहीं देते, जो दुबई में एड्स की बीमारी में मुब्तिला होकर आने के बाद उसके भाई उसे घर में घुसने नहीं दे रहे हैं। बचपन में ही मोहल्ले के अन्य लड़कों के साथ वह भी दुबई चला गया था। वहां वह जहन्नुम जैसी जिंदगी जीकर हर महीने अच्छी रकम भेजता रहा। उससे भाइयों ने अपनी हैसियत को दोबाला करके एक आलीशन मकान बना कर खुशहाल जिंदगी जी रहे हैं, और वह बूढ़े बरगद के पेड़ के नीचे रह कर भूख से मर रहा है? मुंह से आवाज न निकलने की वजह से आंखों की जबान से आवाज देता है तुमको और तुम बिना उसकी ओर देखे ही आगे बढ़ जाते हो।  सुनो, सामने अपंग विधवा नीमा के घर से उसके भूख से तड़पते बीमार बच्चे की आवाज आ रही है, क्या तुम नहीं सुनते हो? क्या तुम नहीं देखते हो? सुनते भी हो और देखते भी हो, लेकिन इस वक्त सहारा देने की जरूरत नहीं समझते, क्यों, है न यही बात? बोलो, खामोश क्यों हो?

रूही की मां ने तो फाके पर फाके किए, अपनी इज्जत अपने हाथों नहीं जाने दी। आज न जाने कितनी रूही की मांओं की इज्जत लुटते हुए तुम देखते हो और तुम पर खामोशी छाई रहती है, जबान होते हुए भी बे-जबान हो जाते हो। इसलिए कि तुम्हीं तो हो, तो जबान किस पर खोलो!फेंक दो मेरा जनाजा। लेकिन तुम नहीं फेंकोगे, क्योंकि कंधा बदल-बदल कर तुम्हें नेकियों से अपनी जेबें भरने की हवस है। इस वक्त की अपनी और समाज की इज्जत का सवाल है। कब्रिस्तान की पत्थर जैसी जमीन खोद कर बनाई गई मेरी कब्र के समाने मेरे जनाजे की चारपाई अपने कंधों से बहुत धीरे-धीरे अदब से उतारने का प्रयास कर रहे हो, इसीलिए न, कि कहीं मेरे मुर्दा जिस्म को तकलीफ न पहुंच जाए? कितना प्यार करते हो तुम मुझसे?… मेरे जनाजे की नमाज पढ़ने के लिए बड़ी खामोशी के साथ मौलाना साहब के पीछे सफ-ब-सफ खड़े हो रहे हो, जिंदगी में कभी मेरे इतने नजदीक आए थे तुम? मौलाना साहब, मरते वक्त तो मैं एक बहुत बड़ा गुनहगार था, आखिर आज उस गुनहगार की जनाजे की नमाज आप क्यों पढ़ाते हैं? नीयत न बांधिए, जवाब दीजिए मुझे?

जनाजे की नमाज खत्म करके मेरे जनाजे को फिर अपने कंधों पर उठा कर ‘लाइलाहइल्लल्लाह मोहम्मदुर्रसूलुल्लाह’ (यानी अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक नहीं और मोहम्मद स्वल्लल्लाह अलैह और सल्लम अल्लाह के रसूल हैं) कलम-ए-अव्वल पढ़ते हुए अभी कुछ देर पहले मेरे लिए कब्रिस्तान के कब्रखोदवा द्वारा खोदी गई कब्र की ओर धीरे-धीरे बढ़ रहे हो, अब मेरी कब्र के पास आ गए हो और मेरी कब्र की जमीन से खोद कर निकाली गई मिट्टी के ऊपर मेरे जनाजे को बड़े इत्मीनान और सावधानी से उतार कर रख रहे हो कि कोई मिट्टी का टुकड़ा मेरे मुर्दा जिस्म से पहले साफ-सुथरी कब्र में गिर न जाए, कितना ख्याल रख रहे आज मेरा।

कफन में लिपटे मेरे मुर्दा जिस्म को अपने हाथों में उठा कर मेरे ऊपर ओढ़ाई गई चादर के सहारे कब्र में रख रहे हो, और अब रख कर मेरे सिर और पैर की ओर बंधे कफन के बंधन को खोल रहे हो और कह रहे हो कि मेरे चेहरे का आखिरी दीदार कर लिया जाए, जबकि मेरी जिंदगी में, बीमारी की हालत में, मेरा चेहरा देखने को कौन कहे मेरा हालचाल पूछने क्या आए थे कभी? बोलते क्यों नहीं? क्या मैं झूठ बोल रहा हूं?
आखिरकार तुम लोगों ने मुझे दफ्न ही कर दिया, मेरी आवाज नहीं सुनी।
काश! मेरी आवाज सुन सकते…? ०