भारत छोड़ो आंदोलन का आह्वान करते ही अंग्रेजी शासन ने कू्ररता दिखानी शुरू कर दी। आंदोलन की घोषणा के कुछ ही घंटों बाद कांग्रेस के सभी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। बंबई के आसपास के क्षेत्र को सेना की छावनी के रूप में तब्दील कर दिया गया। लेकिन आंदोलन की चिनगारी को जनता तक पहुंचने में ज्यादा समय नहीं लगा। बल्कि कहें कि 14 जुलाई के कांग्रेस कार्यसमिति के फैसले को देखते हुए जनता पहले से ही आजादी के आंदोलन में बलिदान देने के लिए आतुर थी।
मैनपुरी (उत्तर प्रदेश)में आठ अगस्त को ही कमला प्रसाद विश्वकर्मा, भूरेलाल, दर्शन लाल हरिजन, दरोगा प्रसाद, जमुना प्रसाद त्रिपाठी ने सरकारी संस्थानों पर भारत का झंडा फहराने का प्रयास किया, जिसमें उनको अंग्रेजी उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा। वहीं जौनपुर (उत्तर प्रदेश) में विजय बहादुर तेली, श्यामलाल केशरवानी, गाजीपुर में खेदन अहीर, शिवपूजन राम, भिखारी राम आदि ने भी झंडा फहराने का प्रयास किया तो उनको अंग्रेजों की गोलियों का शिकार होना पड़ा। उत्तर प्रदेश में मेरठ की मवाना तहसील में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया और गोलियां चलार्इं, जिसमें कई कार्यकर्ता गंभीर रूप से घयाल हो गए।
यह आंदोलन और उग्र तब हुआ, जब लखनऊ में दस अगस्त को अंग्रेजी शासन के खिलाफ विश्वविद्यालय और विद्यालयों के छात्रों ने एक अहिंसात्मक जुलूस निकाला। लेकिन अंग्रेज पुलिस को यह गवारा नहीं था। पुलिस ने छात्रों की भीड़ पर डंडों की बरसात कर दी। सैकड़ों छात्र घायल हुए। 14 अगस्त को अंग्रेज पुलिस ने अलीगढ़ में दो क्रांतिकारियों को गोली मार दी।
सुमित सरकार जैसे इतिहासकार भारत छोड़ो आंदोलन को उत्तर भारत के मात्र तीन-चार प्रांतों तक सीमित मानते हैं। ऐसे में अगर देखा जाए तो यह आंदोलन एक जन-आंदोलन था। जहां यह उत्तर भारत में अपने प्रभाव को प्रदर्शित कर रहा था, वहीं दक्षिण भारत भी इससे अछूता नहीं था। मद्रास में 11 अगस्त, 1942 को अंग्रेजी कंपनियों में काम करने वाले मजदूरों ने काम करने से मना कर दिया। बकिंघम कार्नीटाइन मिल में काम कर रहे मजदूरों ने कामबंदी की घोषणा कर दी। आंदोलनकारियों के आह्वान पर स्कूल, दुकानें आदि बंद हो गई थीं। वहीं लोयोला कॉलेज पचियप्पा कॉलेज के छात्रों ने एक अहिंसात्मक जुलूस निकाला, जिस पर अंग्रेज पुलिस ने बर्बरता से लाठियां बरसार्इं। इसमें कई छात्र बुरी तरह जख्मी हो गए। फिर भी सभी ने आंदोलन में बढ़-चढ़ कर भाग लिया। रेल और सड़क परिवहन को बाधित करने के प्रयास में अरोकाईसामी दलित समाज के नेता जो आजादी की लड़ाई में काफी सक्रिय थे, को अंग्रेजों ने गोली मार दी।
भारत की आजादी के लिए गांधीजी ने पहली बार इतना साफ संदेश दिया था, जिसे ‘करो और मरो’ का नारा दिया गया। यह वही समय था जब बाबा साहब आंबेडकर ने कहा था कि ‘मैं प्रथम और अंतिम रूप से भारतीय हूं।’ इस आंदोलन की महत्ता इसलिए भी थी कि इसमें संपूर्ण समाज के लोग शामिल हुए। केवल देसी रियासतों के राजाओं और जमींदारों आदि को छोड़ दिया जाए, तो समाज के बड़े हिस्से जिसमें किसान, मजदूर, दलित, वंचित आदि की अधिकाधिक सहभागिता इसमें देखने को मिली।
